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छत्तीसगढ़ की महिला सत्याग्रही डॉ. राधाबाई

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बीसवीं शताब्दी में, देश की स्वाधीनता के लिए बहुत-से आंदोलन हुए, जिनका पूरे देश में असर हुआ और ब्रिटिश सरकार के पांव उखड़ने लगे। महात्मा गाँधी ने इन आंदोलनों को ज़मीनी स्तर पर ले जाने का श्रेय देश की महिलाओं जैसे डॉ. राधाबाई को दिया क्योंकि गाँधी जी के असहयोग आंदोलन ने हर तबके, हर उम्र और हर एक प्रांत की महिला को अपने घर की दहलीज से बाहर निकालकर अंग्रजों के समक्ष खड़ा कर दिया था।

छत्तीसगढ़-के सत्याग्रही
छत्तीसगढ़-के सत्याग्रही

छत्तीसगढ़ की महिला सत्याग्रही डॉ. राधाबाई


डॉ. राधाबाई का जन्म नागपुर में हुआ था. बाल्यकाल में ही उनका विवाह हुआ तथा नौ वर्ष की अल्पायु में ही वे विधवा हो गई. पिता, भाई एवं पति के न होने वे अनाथ सी हो गई. मराठी तो वह जानती ही थीं, हिन्दी घर में सीखी. अपने जीवन में उन्होंने सेवाकार्य को चुना. उन्हें नागपुर में दाई का कार्य मिला.

नागपुर नगरपालिका में उन्होंने अपना सेवा कार्य आरम्भ किया. कामठी, रामटेक, अकोला, बिलासपुर रेलवे में कार्य करने बाद 1918 में रायपुर नगरपालिका में उन्हें मिडवाइफ (दाई) का कार्य मिला. भले ही वह एक दाई थी, किन्तु रायपुर के नागरिकों के लिए वह एक कुशल डॉक्टर थी, इसीलिए उनके नाम के साथ लोगों ने डॉक्टर जोड़ दिया और वह डॉ. राधाबाई बन गई.

सत्याग्रह में हिस्सा


स्वराज्य आंदोलन में गांधीजी के आह्वान पर आंदोलन में भाग लिया. रायपुर में डॉ. राधाबाई ने सत्याग्रही महिलाओं का एक जत्था तैयार किया. डॉ. राधाबाई नगरपालिका में कर्मचारी रहते हुवे भी स्वराज्य आंदोलन में सक्रिय भाग लेती रहीं.

1932 में पिकेटिंग करते हुए वह गिरफ्तार की गई. प्रथम सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान रायपुर कांग्रेस द्वारा नियुक्त आठ डिटेक्टरों में वे एक थीं. डॉ. राधाबाई 1930 से 1942 तक सत्याग्रह में भाग लेती रहीं. वे जेल में भी सत्याग्रही व साधारण महिला कैदियों को आध्यात्मिक उन्नति और सत्याग्रह की प्रेरणा देती रहीं, जेल से बाहर छूटते ही वे सेवा में रत हो जाती.


छत्तीसगढ़ में उन्होंने अनेक महिलाओं को सेवा का मार्ग दिखाया. छोटे बच्चों का लालन-पालन, अनाथ बालक-बालिकाओं की शिक्षा आदि कार्यों में वे सदा सहयोग करती थीं.

1942 के आंदोलन तक वे बूढ़ी हो गई थीं, फिर भी पीछे नहीं रहीं. वे मानव मात्र को एक मानती थी. उनकी सेवा की प्रसिद्धि पूरे छत्तीसगढ़ में थी. वैराग्य और सेवा ही उनके जीवन का आदर्श था. स्वराज्य प्राप्ति के लक्ष्य को पूरा कर डॉ. राधाबाई 2 जनवरी, 1950 को लगभग 85 वर्ष की अवस्था में पंचतत्व में विलीन हो गई.

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