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छत्तीसगढ़ का वैदिक काल [Vedic period of Chhattisgarh]

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छत्तीसगढ़ का वैदिक काल एवं अनुश्रुत इतिहास

प्रारम्भिक वैदिक अथवा पूर्व वैदिक सभ्यता की जानकारी देने वाले ग्रन्थ ‘ऋग्वेद’ में छत्तीसगढ़ से सम्बन्धित कोई जानकारी नहीं मिलती. इसमें विन्ध्य पर्वत एवं नर्मदा नदी का उल्लेख भी नहीं है. उत्तर वैदिक काल में देश के दक्षिण भाग से सम्बन्धित विवरण मिलने लगते हैं, ‘शतपथ ब्राह्मण’ में पूर्व एवं पश्चिम में स्थित समुद्रों का उल्लेख मिलता है, ‘कौशीतिक उपनिषद्’ में विन्ध्य पर्वत का नामोल्लेख है. परवर्ती वैदिक साहित्य में नर्मदा का उल्लेख रेवा के रूप में मिलता है. महाकाव्यों में इस क्षेत्र का पर्याप्त उल्लेख मिलता है.

का प्राचीन इतिहास Ancient History of Chhattisgarh छत्तीसगढ़ का वैदिक काल [Vedic period of Chhattisgarh]
छत्तीसगढ़ का प्राचीन इतिहास

रामायण काल

‘रामायण’ से ज्ञात होता है कि राम की माता कौशल्या राजा भानुमन्त की पुत्री थीं. ‘कोसल खण्ड’ नामक एक अप्रकाशित ग्रन्थ से जानकारी मिलती है कि बिन्ध्य पर्वत के दक्षिण में नागपत्तन के पास कोसल नामक एक शक्तिशाली राजा था. इनके नाम ही पर इस क्षेत्र का नाम ‘कोसल’ पड़ा. राजा कोसल के वंश में भानुमन्त नामक राजा हुआ, जिसकी पुत्री का विवाह अयोध्या के राजा दशरथ से हुआ था. भानुमन्त का कोई पुत्र नहीं था, अतः कोसल (छत्तीसगढ़) का राज्य राजा दशरथ को प्राप्त हुआ. इस प्रकार राजा दशरथ के पूर्व ही इस क्षेत्र का नाम ‘कोसल’ होना ज्ञात होता है.

ऐसा माना जाता है कि वनवास के समय सम्भवतः राम ने अधिकांश समय छत्तीसगढ़ के आस-पास व्यतीत किया था. स्थानीय परम्परा के अनुसार ‘शिवरीनारायण’, ‘खरौद’ आदि स्थानों को रामकथा से सम्बद्ध माना जाता है. लोक विश्वास के अनुसार श्री राम द्वारा सीता का त्याग कर देने पर तुरतुरिया (सिरपुर के समीप) में स्थित महर्षि वाल्मीकि ने अपने आश्रम में शरण दी थी और यहीं लव और कुश का जन्म हुआ माना जाता है. श्री राम के पश्चात् ‘उत्तर कोसल’ के राजा उनके ज्येष्ठ पुत्र लव हुए, जिनकी राजधानी श्रावस्ती थी और अनुज कुश को ‘दक्षिण कोसल’ मिला, जिसकी राजधानी कुशस्थली थी.

महाभारत काल

महाभारत में भी इस क्षेत्र का उल्लेख सहदेव द्वारा जीते गए राज्यों में प्राक्कोसल के रूप में मिलता है. बस्तर के अरण्य क्षेत्र को ‘कान्तार’ कहा गया है. कर्ण द्वारा की गई दिग्विजय में भी कोसल जनपद का नाम मिलता है. राजा नल ने दक्षिण दिशा का मार्ग बनाते हुए भी विन्च्य के दक्षिण में कोसल राज्य का उल्लेख किया था. महाभारतकालीन ऋषभतीर्थ भी बिलासपुर जिले में सक्ती के निकट ‘गुंजी’ नामक स्थान से समीकृत किया जाता है. स्थानीय परम्परा के अनुसार भी मोरध्वज और ताम्रध्वज की राजधानी ‘मणिपुर’ का तादात्म्य वर्तमान ‘रतनपुर’ से किया जाता है. इसी प्रकार यह माना जाता है कि अर्जुन के पुत्र बभ्रुवाहन’ की राजधानी ‘सिरपुर’ थी.

पौराणिक साहित्य से भी इस क्षेत्र के इतिहास पर विस्तृत प्रकाश पड़ता इस क्षेत्र के पर्वत एवं नदियों का उल्लेख अनेक पुराणों में उपलब्ध है. इस क्षेत्र में राज्य करते हुए इक्ष्वाकुवंशियों का वर्णन मिलता है. इसके साथ ही यह भी माना जाता है कि वैवस्वत मनु के पौत्र तथा सुद्युम्न के पुत्र विवस्वान को यह क्षेत्र प्राप्त हुआ था.

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