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जिला जांजगीर के पर्यटक स्थल [Tourist places of District Janjgir]

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जांजगीर नगर एक परिचय

विलासपुर चांपा रेल मार्ग पर 45 किमी पर स्थित है, जाजल्लदेव द्वितीय के रतनपुर शिलालेख से पता चलता है कि उसने अपने नाम एक नगर बसाया था. जहाँ मंदिर एवं तालाब भी बनवाये थे, उसका नाम था जाजल्लपुर. वर्तमान में जांजगीर को ही उस स्थान के नाम से जाना गया है. यहाँ मंदिर एवं मूर्तियाँ कल्चुरीकालीन उत्कृष्ट कला का प्रदर्शन करती हैं. यह पूर्वाभिमुख है तथा सप्तरथ योजना का है. मंदिर में बराह, नृसिंह, वामन, बुद्ध और त्रिबिक्रम विष्णु अवतारों तथा बायाँ हिस्सा शिव का एवं दाहिना हिस्सा विष्णु का बताने वाली हरिहर प्रतिमा और अपने घोड़ों एवं रथ के साथ सूर्य प्रतिमा का भी अंकन है. राम एवं कृष्ण से सम्बन्धित फलक भी इस विष्णु मंदिर में लगे हैं. कृष्णलीला से सम्बन्धित अंकन भी हैं. इस तरह मंदिर एवं यहाँ की सभी प्रतिमाओं में कल्चुरी कला अपने उत्कर्ष में दिखाई देती है.

यह विष्णु मंदिर पूर्ण नहीं है अधूरा है अर्थात् इसका शिखर पूरा नहीं बन सका है तथा गर्भगृह में मूर्ति का अभाव है फिर भी यह छत्तीसगढ़ के कल्चुरीकालीन शिल्प सौंदर्य का उत्कृष्टतम उदाहरण है इसके अलावा यहाँ शिव मंदिर, बरमबाबा चौरा भी प्रमुख दर्शनीय स्थलों में से हैं.

[Tourist places of District Janjgir]
जिला जांजगीर के पर्यटक स्थल

चांपा (ऐतिहासिक, धार्मिक, गढ़-मदनपुर)

‘चांपा’, हावड़ा मुम्बई रेल मार्ग पर बिलासपुर से रेलमार्ग द्वारा 53 किमी तथा सड़क मार्ग द्वारा 78 किमी दूरी पर समुद्र तल से 500 मी की ऊँचाई पर हसदो नदी के तट पर बसा यह नगर अपने कांस, कोसा (टसर) तथा कंचन (सोना) से निर्मित वस्तुओं के लिये विश्व प्रसिद्ध है. छत्तीसगढ़ों में रतनपुर के अंतर्गत आने वाले 18 गढ़ों में मदनपुर (चांपा) भी एक महत्वपूर्ण गढ़ था.

दर्शनीय स्थल

यहाँ सम्लेश्वरी देवी का मंदिर, श्री जगन्नाथ मंदिर, श्री मुरली मनोहर का शिव मंदिर, श्रीकृष्ण गौशाला मंदिर, राजमहल एवं रामबाँधा तालाब, मदनपुर गढ़, मड़वा रानी मंदिर आदि प्रमुख हैं.

अड़भार (अष्टद्वार-पुरातात्विक, धार्मिक :

कलचुरि शिल्प का श्रेष्ठतम् उदाहरण) मुम्बई हावड़ा रेलमार्ग पर ‘सक्ती’ स्टेशन से 11 किमी की दूरी पर स्थित ‘अड़भार’ का प्राचीन इतिहास में उल्लेख अष्टद्वार के नाम से मिलता है.

दर्शनीय स्थल-

‘अड़भार’ में स्थित ‘अष्टभुजी माता का प्राचीन मंदिर दर्शनीय है. कल्चुरीकालीन यह मंदिर छत्तीसगढ़ की तत्कालीन शिल्पकला का श्रेष्ठ नमूना है.

ऋषभ तीर्थ (दमऊदहरा-ऐतिहासिक, धार्मिक, पुरातात्विक)-

बिलासपुर से लगभग 113 किमी मुम्बई-हावड़ा रेलमार्ग पर ‘सक्ती’ से मात्र 15 किमी की दूरी पर ‘दमऊदहरा’ स्थित है, जोकि ‘ऋषभ तीर्थ’ या ‘गूंजी’ नाम से भी जाना जाता है. ‘दमऊ दहरा’ प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर पहाड़ों के बीच स्थित जल का एक गहरा ‘कुण्ड’ है, जिसमें पहाड़ से लगातार पानी गिरता रहता है. इसके पास पहाड़ में एक प्राचीन प्रस्तर शिलालेख प्राप्त हुआ है, जिसके आधार पर यही प्राचीन ऋषभ तीर्थ है. ऋषभ तीर्थ का वर्णन ‘महाभारत में वन पर्व’ के अवसर पर तथा ‘श्री भागवत के पाँचवें स्कंध के तीसरे अध्याय में मिलता है. इन उल्लेखों से ‘ऋषभ तीर्थ’ की प्रामाणिकता सिद्ध होती है. यहाँ भगवान् श्री ऋषभदेव की प्राचीन मूर्ति स्थापित है. किंवदंति है कि प्राचीनकाल में यहाँ भगवान् ऋषभ देव निवास करते थे. इसके समीप तीन किमी पर पंचवटी (काल वराहकलप राम आश्रम), 8 किमी पर गिद्ध पर्वत (जटायु आश्रम) तथा रेनखोल (रावण खोल अर्थात् रावण की गुफा) है. जनश्रुतियों के अनुसार रेनखोल ‘भगवान् श्री रामचन्द्र’ के वनवास काल की स्मृतियों को लिये अपने आप में महत्वपूर्ण स्थल है. ऐसी मान्यता है कि ‘रावण’ ने ‘सीता’ का अपहरण इसी स्थान से किया था.

खरौद (प्राचीन इंद्रपुर)-

खरौद ‘चित्रोत्पला गंगा (महानदी) के किनारे बिलासपुर से 63 किमी की दूरी पर दक्षिण पूर्व में प्रसिद्ध तीर्थ शिवरीनारायण से मात्र 3 किमी की दूरी पर बसा एक नगर है. शैव परम्परा यहाँ स्थित लक्ष्मणेश्वर (लखनेश्वर) शिवलिंग से स्पष्ट परिलक्षित होती है. शिव मठ भी इस का द्योतक है, जबकि शिवरीनारायण वैष्णव परम्परा का उदाहरण माना जाता है. शायद यही कारण है कि शिवरीनारायण और खरौद को क्रमशः ‘विष्णुकांक्षी’ और ‘शिवाकांक्षी’ कहा जाता है और इनकी तुलना ओडिशा के जगन्नारथ के भगवान जगन्नाथ’ और ‘भुवनेश्वर के लिंगराज’ से की जाती है. प्राचीनकाल में जगन्नाथपुरी जाने का रास्ता खरौद और शिवरीनारायण से होकर जाता था. यहाँ लक्ष्मणेश्वर, शबरी मंदिर, इंदल देव मंदिर आदि प्रमुख दर्शनीय स्थल हैं.

शिवरीनारायण (जहाँ नारायण आज भी आते हैं-ऐतिहासिक, पुरातात्विक, धार्मिक)

बिलासपुर से दक्षिण पूर्व दिशा में लगभग 64 किमी दूर प्राचीन धार्मिक स्थल शिवरीनारायण स्थित है. यहाँ छत्तीसगढ़ की तीन प्रसिद्ध नदियों-महानदी (चित्रोत्पला गंगा), शिवनाथ नदी एवं जोक का संगम प्रयाग के त्रिवेणी संगम के सदृश्य है. इस स्थल का नाम शिवरीनारायण क्यों पड़ा ? इस पर कुछ किंवदंतियाँ हैं, जिनके अनुसार यह स्थान रामायणकालीन रामभक्त शबरी की तपोभूमि था, यहाँ शबरी ने राम को जूठे बेर खिलाये थे. अतः शबरी के नाम पर यह शबरीनारायण हो गया. यहाँ एक शबरी का ईटों का प्राचीन मंदिर भी है, जो तर्क के पक्ष में जाता है. कुछ विद्वान् शबरी या शिवरी ओडिशा से सम्बन्धित मानते हैं जिसमें इसे विष्णु रूप माना गया है. नवीं शताब्दी की मूर्तियों को समेटे हुए बारहवीं शताब्दी में निर्मित ‘शिवरीनारायण का मंदिर’ अंचल का एक प्रसिद्ध मंदिर है. यह बड़ा मंदिर’ एवं ‘नर-नारायण मंदिर के नाम से भी जाना जाता है. इसके अलावा केशवनारायण मंदिर (12वीं श.), चन्द्रचूड़ महादेव का मंदिर (निर्माणकर्ता कुमारपाल नामक एक कवि), राम-लक्ष्मण-जानकी मंदिर, दूधाधारी मठ, केवट मंदिर, सिंदुरगिरि, संगम घाट आदि प्रमुख दर्शनीय स्थलों में हैं,

मेला

प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा के पावन पर्व के अवसर पर शिवरीनारायण में विशाल मेला लगता है, जो लगभग एक पखवाड़े तक चलता है. जनश्रुति के अनुसार माधपूर्णिमा को जगन्नाथपुरी से भगवान् आकर शिवरीनारायण में विराजते हैं और जगन्नाथपुरी में किवाड़ बंद रखे जाते हैं, अतः उस दिन यहाँ जगन्नाथजी के दर्शनों का महत्व ‘पुरी’ के दर्शन के तुल्य माना जाता है.

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