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जिला सरगुजा के पर्यटक स्थल [Tourist places in District Surguja]

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जिला सरगुजा के पर्यटक स्थल

जिला सरगुजा सरगुजा वनों से आच्छादित छत्तीसगढ़ का उत्तरी पहाड़ी क्षेत्र है. यह नाम ‘स्वर्गजा’ का भ्रंश है. स्वर्गजा अर्थात् स्वर्ग की तनजा स्वर्ग की ऐश्वर्य गाथा. रामायणकालीन संस्कृति से प्रभावित सरगुजा में श्री राम ने सीता और लक्ष्मण सहित निवास किया था. जिले में उपलब्ध पुरातात्विक साक्ष्य ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी से लेकर (मौर्यकाल से) परवर्ती काल तक के हैं जिनमें गुफाएं गुफा लेख, मूर्तियाँ एवं भग्न मंदिर अवशेष आदि हैं.

अम्बिकापुर नगर एक परिचय

अम्बिकापुर पूर्वी सरगुजा जिले का मुख्यालय है. बिलासपुर से सड़क मार्ग द्वारा इसकी दूरी 240 किलोमीटर है. वर्ष मई, 1998 में कोरिया (पश्चिम सरगुजा) नामक जिले का गठन इसके विभाजन के पश्चात् हुआ, अम्बिकापुर छत्तीसगढ़ के उत्तरी पहाड़ी क्षेत्र का महत्त्वपूर्ण नगर है. अम्बिका देवी के नाम पर इसका नाम अम्बिकापुर पड़ा. जिला ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है. यह क्षेत्र राम की कर्मभूमि के रूप में जाना जाता है जहाँ राम ने सीता एवं लक्ष्मण के साथ अपने वनवास का संक्रांति काल बिताया था जिनके प्रमाण हमें यहाँ गुफाओं यथा जोगीमारा, रामगढ़, लक्ष्मण बंगरा, सीता बंगरा आदि गुफाओं एवं विभिन्न स्थलों यथा सीतापुर, लखनपुर, रामपुर आदि से मिलते हैं. यह नगर झारखण्ड राज्य द्वारा व्यावसायिक रूप से जुड़ा हुआ है.

जिला सरगुजा के पर्यटक स्थल
जिला सरगुजा के पर्यटक स्थल

रामगढ़ (ऐतिहासिक)-

संभागीय मुख्यालय बिलासपुर से 205 किलोमीटर की दूरी तथा जिला मुख्यालय अम्बिकापुर से 45 किलोमीटर की दूरी पर यह ऐतिहासिक स्थल स्थित है. [आगे पढ़ें ]

हाथी पोर-

इन गुफाओं पर पहुँचने के लिए 180 फीट लम्बी एक विशाल प्राकृतिक सुरंग को पार करना पड़ता है. इस प्राकृतिक सुरंग का प्रवेश मार्ग 55 फीट और अंतिम स्थान 90 फीट चौड़ा है. इसके अंदर अविरल बहने वाला एक बड़ा नाला है जिसके पानी के बहने के कारण सुरंग के अंदर छोटे-छोटे अनेक जलाशय भी बन गये हैं. प्रमुख जलाशय सीताकुण्ड के नाम से प्रसिद्ध है. जहाँ माता सीता स्नान किया करती थीं. यह सुरंग इतनी ऊँची है कि हाथी भी बड़ी सरलता से प्रवेश कर सकता है. इसी कारण सुरंग का नाम हाथी खोह या हाथी पोर पड़ा. पहाड़ी पर जाते समय मार्ग में हनुमान, गणेश और सुत्यरत्न बालाओं की सुंदर मूर्तियाँ हैं. सुरंग के ऊपर सीता बंगरा और जोगीमारा पहाड़ी के ऊपरी भाग में पश्चिमी ढाल से दक्षिण तक फैली हुई है. उत्तरी गुफा सीता बंगरा और दक्षिण गुफा जोगीमारा कहलाती है.

सीता बंगरा (नाट्यशाला, ई.पू. 3-2 शताब्दी)-

गुफा के शिलालेखों के अनुसार यह विश्व की सबसे प्राचीन नाट्यशाला मानी गई है, जहाँ तत्कालीन सांस्कृतिक और सामाजिक जीवन का प्रतिबिम्ब दिखता है. यहाँ ईसा पूर्व तीसरी दूसरी सदी की एक नाट्यशाला पहाड़ी से काटकर बनायी गई थी, जिसे सन् 1848 में कर्नल आउस्ले प्रकाश में लाया था. 1903-04 में डॉ. जे. ब्लाश ने इसे आर्केलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में प्रकाशित किया जिनके अनुसार इसकी लम्बाई 44-5 फीट और चौड़ाई 15 फीट है. प्रवेश द्वार गोलाकार और लगभग 6 फीट ऊँचा तथा दीवारें लम्बबत् है. इस गुफा का नाम सीता बंगरा है, जिसकी छत पर पॉलिश है. यहाँ 30 लोग बैठ सकते हैं. इसके प्रवेश द्वार पर बायीं और ब्राह्मी लिपि तथा माघी भाषा में दो पंक्तियाँ उत्कीर्ण हैं. प्रत्येक पंक्ति 3 फीट 8 इंच की है तथा अक्षरों का आकार 2.5 इंच है. इसके कतिपय अक्षर यद्यपि मिट गए हैं, तथापि शेष से पता चलता है कि यहाँ रात्रि में काव्य, संगीत और नृत्य का आयोजन होता था. यहाँ महान् कविगण रात्रि में एकत्र होते थे. गुफा ग्रीक थियेटर के आकार की है. नाट्यकला की प्राचीनता के अनुसंधानों से ज्ञात होता है कि प्रायः दो हजार वर्ष पहले नाट्य मण्डप बनाया जाता था, जहाँ नाटक अभिनय होते थे.

जोगीमारा (ऐतिहासिक, पुरातात्विक-विश्व के सबसे प्राचीन भित्तिचित्र)-

जोगीमारा की गुफा को भारतीय चित्रकला में ‘वरुण का मंदिर’ कहा जाता है. यहाँ सुतनुका देवदासी रहती थी, जो वरुण देव को समर्पित थी. ऐसा माना जाता है कि सुतनुका ने सीता बंगरा नृत्यशाला वाली सखियों के विश्राम के लिए इसे बनवाया था. इस गुफा में भित्तिचित्रों के सबसे प्राचीन नमूने अंकित हैं. इन चित्रों की पृष्ठभूमि धार्मिक कैप्टन टी. ब्लाश ने सन् 1904 में इन चित्रों का अवलोकन कर इन्हें दो हजार साल से भी अधिक पुराना एवं सम्भवतः भारत के प्राचीनतम भित्तिचित्र का प्रमाण माना है. लेखक आर.ए. अग्रवाल ने ‘भारतीय चित्रकला का विकास’ में इन्हें ई. पूर्व 300 ईस्वी में निर्मित बताया है. शिलाखण्डों को काटकर जिस तरह चैत्य विहार मंदिर बनाने की प्रथा थे और भित्तियों पर प्लास्टर लगाकर चूने जैसे पदार्थ से चिकना कर जो चित्र बनाये जाते थे उसी के अनुरूप यह गुफा है, जो ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी की मानी जाती है.

गुफा की छत पर अंकित आकर्षक रंग-बिरंगे चित्रों में तोरण, पत्र-पुष्प, पशु-पक्षी, नर-नारी, देव-दानव, योद्धा, वृक्ष तथा हाथी के चित्र हैं. इस गुफा में चतुर्दिक चित्रकारी के मध्य में कुछ युवतियों के चित्र हैं, जो बैठी हुई मुद्रा में हैं. इनके सामने वृक्ष के नीचे शांत मुद्रा में उपदेश देता हुआ एक पुरुष बैठा है, जो तपस्वी होने का संकेत देता है, इस गुफा में ब्राह्मी लिपि एवं पाली भाषा का एक उत्कीर्ण लेख ज्ञात हुआ है, जो सुतनुका नामक देवदासी एवं रूपदक्ष देवहीन के प्रेम का वर्णन करता है. सम्भवतः देवहीन ने अपने प्रेम को स्थायित्व देने हेतु अपनी भावनाओं को दीवार पर उत्कीर्ण किया है.

उक्त अभिलेख छत्तीसगढ़ में मौर्यकालीन व पालीभाषा का मात्र एक गुहा लेख है. सम्भवतः छत्तीसगढ़ में प्राप्त यह प्राचीनतम अभिलेख है. यह गुफा महाकवि कालिदास से भी सम्बन्धित कही गई है. उनके ‘मेघदूत’ का यक्ष इसी गुफा में निर्वासित था जहाँ से उसने अपनी प्रेमिका को संदेश भेजा था, मेघदूत में वर्णित प्राकृतिक सौंदर्य एवं जलकुण्ड की यहाँ उपलब्धता एवं उत्कीर्ण लेख में मेघदूत के कथानक से पर्याप्त सादृश्यता है, किंतु उक्त लेख कालिदास के पूर्व का स्वीकार किया गया है, अतः सम्भव है कवि ने अपने कथानक की प्रेरणा इस स्थल एवं लेख से ली हो. इसकी पुष्टि में यह कहा जा सकता है कि कालिदास महान् नाट्यकार थे एवं रामगढ़ में प्रसिद्ध प्राचीन नाट्यशाला थी, जो कालिदास के समय अर्थात् चौथी शताब्दी तक आबाद रही हो और कालिदास यहाँ अपने नाट्य मंचन हेतु आये हों और तभी इस लेख से उन्होंने प्रेरणा ली हो.

लक्ष्मण बंगरा (ऐतिहासिक, धार्मिक)

जोगीमारा के समक्ष अनेक गुफाओं में से एक लक्ष्मण बंगरा भी है जिसके भीतर रखी हुई विशाल चट्टान एवं इसके सम्मुख का दृश्य अत्यंत मोहक है. यह श्री लक्ष्मण के शयन अथवा विश्राम के लिये प्रयोग में लायी जाती थी और यहीं से वे श्रीराम और सीताजी की रखवाली किया करते थे. इस तरह सीता बंगरा, जोगीमारा गुफा और लक्ष्मण बंगरा तीनों रामायणकालीन अवशेष हैं. ऐसी मान्यता भी है कि यहीं से रावण ने सीता का हरण किया था. यहाँ पर एक लकीर भी खींची हुई दिखती है जिसे लक्ष्मण रेखा कहा जाता है. सीता बंगरा में जो पदचिह्न दिखाई देता है उसे रावण का पदचिह्न माना जाता है. ये सभी तथ्य यह प्रमाणित करते हैं कि सीता बंगरा, जोगीमारा और लक्ष्मण वंगरा का इतिहास रामायणकालीन है. सरगुजा ही बालि एवं सुग्रीव का राज्य था और यहीं से राम ने वानर सेना बनाकर सीता की खोज हेतु प्रस्थान किया था. यहाँ स्थित किष्किन्धा पहाड़ ही रामायणकालीन किष्किन्धा पर्वत था, ऐसा कुछ विद्वानों का मत है.

देवगढ़ (पुरातात्विक)

बिलासपुर अम्बिकापुर मार्ग पर 200 किलोमीटर की दूरी पर उदयपुर से 20 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में ‘देवगढ़’ एक पुरातात्विक स्थल है. अम्बिकापुर से इसकी दूरी लगभग 60 किलोमीटर है. देवगढ़ में एकादश रुद्र की कभी स्थापना रही होगी, आज केवल उनके भग्नावशेष पड़े हैं. सभी ग्यारह मंदिरों के भग्नावशेष रेणुका (रिहन्द) नदी के तट पर पास-पास बिखरे पड़े हैं. एकादश रुद्रों में एक ऐसा शिवलिंग है. शिवलिंग के पश्चिम की ओर देवी पार्वती की मूर्ति सुंदर कलापूर्ण ढंग से अंकित है.

महेशपुर (ऐतिहासिक, पुरातात्विक)-

बिलासपुर-अम्बिकापुर (व्हाया कटघोरा) मार्ग पर अम्बिकापुर से 40 किलोमीटर की दूरी पर पड़ने वाले ग्राम उदयपुर से दक्षिण की ओर 8 किलोमीटर की दूरी पर ‘महेशपुर’ ग्राम स्थित है. ग्राम से 1 किमी की दूरी पर रेणुका नदी के निकट 10वीं शताब्दी का विशाल शिव मंदिर स्थित है. शिव मंदिर से लगभग 1 किमी की दूरी पर स्थित यह स्थल ‘कुड़िया-झोरी-मोड़ी’ नाम से यहाँ 10वीं शताब्दी में निर्मित दो विशाल विष्णु मंदिर के अवशेष हैं. यह दोनों मंदिर लगभग डेढ़ एकड़ के भू भाग में अवस्थित थे, किन्तु ये वर्तमान में अत्यन्त भग्न अवस्था में हैं. ग्राम के समीप लगभग डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर जैन तीर्थकर वृषभनाथ की एक प्रतिमा अवस्थित है, जोकि 8वीं शताब्दी की है, महेशपुर में स्थित सभी मंदिर वलुआ, लाल पत्थरों द्वारा निर्मित हैं.

बेलसर (ऐतिहासिक, पुरातात्विक)

अम्बिकापुर से 85 किलोमीटर, डीपाडीह से 15 किलोमीटर तथा शंकरगढ़ से 6 किलोमीटर की दूरी पर ‘वेलसर स्थित है जहाँ 8वी-9वीं शताब्दी का एक प्राचीन शिव मंदिर स्थित है, जो वर्तमान में जीर्ण अवस्था में है.

कोटाडोल (ऐतिहासिक, पुरातात्विक)-

अम्बिकापुर से एकदम पश्चिम भाग में लगभग 150 किमी पर भरतपुर तहसील में ‘गोपद’ और ‘बनास’ नदियों के निकट ऐतिहासिक स्थल ‘कोटाडोल’ स्थित है. यहाँ अशोककालीन कई मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं, जिसमें इस काल की कलाकृतियों का जीवंत स्वरूप दृष्टव्य है. इन मूर्तियों पर अशोक की लाट, शेर की त्रिमूर्ति आदि भी उत्कीर्ण हैं, जिससे स्पष्ट है कि सम्राट अशोक का साम्राज्य विस्तार इस क्षेत्र तक रहा होगा.

घाघरा (ऐतिहासिक, पुरातात्विक)

चांगभखार (जनकपुर) तहसील में दो नदियों के किनारे तथा अम्बिकापुर से लगभग 150 किमी पर ‘घाघरा’ स्थित है, यहाँ एक प्राचीन गुफा है, जिसे ‘सीतामढ़ी’ के नाम से जाना जाता है. गुफा के अंदर मध्य में पत्थर के कटे हुये दो सुंदर खम्भे हैं, उन्हीं खम्भों के मध्य में शंकर जी की मूर्ति है. मान्यता है कि सीताजी ने यहाँ शिव पूजा की थी.

हरचौका : मानवीकृत गुफाएं (ऐतिहासिक, पुरातात्विक)

सरगुजा जिले के जनकपुर तहसील के उत्तर-पश्चिम में सीधी जिले की सीमा में अम्बिकापुर से लगभग 160 किमी पर ग्राम मवाही में नदी के किनारे ‘हरचौका’ स्थित है. यहाँ का आकर्षण पहाड़ी चट्टान को काटकर बनायी गयी गुफाएं हैं जिनके अंदर कई छोटी-छोटी कोठरियाँ भी हैं, जिनमें शिवलिंग एवं शंकरजी की मूर्ति के साथ अन्य देवी-देवताओं की प्राचीन मूर्तियाँ स्थापित हैं.

मुरेरगढ़ (ऐतिहासिक, पुरातात्विक)-

सरगुजा जिले की जनकपुर तहसील के उत्तर-पूर्व में अम्बिकापुर से लगभग 140 किमी ‘मुरेरगढ़’ एक ऊँचे पहाड़ पर स्थित है. इसकी चोटी की ऊँचाई लगभग 3027 फीट है. यहाँ दूसरी शताब्दी के प्राचीन किले के भग्नावशेष है, जोकि राजा वुलंदशाह द्वारा बनवाया गया था.

कलचा भदवाही (ऐतिहासिक, पुरातात्विक)-

कलचा भदवाही सरगुजा जिले के उदयपुर से सूरजपुर की ओर जाने वाली कच्ची सड़क में 23 किमी तथा अम्बिकापुर से 63 किमी दूर स्थित है, यह पुरातात्विक दृष्टिकोण से एक महत्वपूर्ण स्थल है जहाँ खुदाई के दौरान 8वीं-9वीं शताब्दी के दुर्लभ मंदिरों के ध्वंसावशेष प्राप्त हुए हैं. यहाँ उत्खनन में शैव मत से सम्बन्धित सात मंदिरों को भग्न स्थिति में अनावृत्त किया गया है. इस स्थल को ‘सतमहला’ नाम से भी जाना जाता है.

डीपाडीह-

डीपाडीह महत्वपूर्ण पुरातत्वीय स्थल है. यहाँ पर 1 किमी के क्षेत्र में प्राचीन मंदिरों के ध्वंसावशेष बिखरे पड़े हैं. इस स्थल पर मलवा सफाई के बाद अनेक मंदिरों के समूह अनावृत्त कर अनुरक्षण कार्य के द्वारा सुरक्षित रखने का प्रयास किया गया है. डीपाडीह के भग्न स्मारकों में शिव मंदिर ‘सामत सरना’ विशेष प्रसिद्ध हैं. मंदिर के मंडप में कार्तिकेय, विष्णु, महिषासुर मर्दिनी, गणेश, वराह और नंदी आदि की प्रतिमाएं रखी हुई हैं. यहाँ पर स्थानीय संग्रहालय बनाया गया है.

मैनपाट-

अम्बिकापुर-रायगढ़ राजमार्ग में स्थित अम्बिकापुर से 85 किमी की दूरी पर स्थित 25 वर्ग किमी के क्षेत्र में विस्तृत छत्तीसगढ़ का एकमात्र हिल स्टेशन मैनपाट’ एक उच्च भूमि सदृश्य क्षेत्र है. समुद्र सतह से इसकी ऊँचाई 4000 फीट है. यहाँ स्थित 150 फुट ऊँचा ‘सरभंजा जल प्रपात’ पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र है. टाइगर पॉइंट यहाँ का महत्वपूर्ण स्थल है. शीतोष्ण प्रकार की जलवायु होने के कारण, शासन की ओर से यहाँ तिब्बतियों को प्रतिस्थापित किया गया है. बौद्ध धर्म अनुयायी मैनपाट के तिब्बती ‘दलाई लामा’ को अपना धर्म प्रमुख मानते हैं. मैनपाट में बॉक्साइट का प्रचुर भण्डार है. यहीं मतरंगा पहाड़ से ‘रिहन्द’ नदी निकली है. जिस पर उत्तर प्रदेश में ‘रिहन्द बाँध’ का निर्माण किया गया है. तिब्बतियों द्वारा निर्मित यहाँ के ‘कालीन’ एवं गर्म कपड़े प्रसिद्ध हैं एवं निर्यात भी किये जाते हैं. कालीन के अलावा मैनपाट पॉमेरियन एवं जासूसी कुत्तों के लिए मशहूर है. मैनपाट को शासन ने दार्जिलिंग की तरह विकसित करने का संकल्प लिया है.

तातापानी-

अम्बिकापुर रामानुजगंज राजमार्ग पर अम्बिकापुर से 80 किमी की दूरी पर उष्ण जल के 8-10 भू स्रोत स्थित हैं, जो “तातापानी’ नाम से जाने जाते हैं. इसके जल का तापमान 84° से. ग्रे. के लगभग है. यह एक प्राकृतिक हाटस्प्रिंग है जिसमें सल्फर की मात्रा विद्यमान होने से यह चर्मरोग हेतु लाभप्रद है. वैज्ञानिकों द्वारा इसमें विद्युत् संयंत्र लगाने की अनुशंसा की गई है. भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण विभाग द्वारा यहाँ तीन बोर होल किये गये हैं जिनसे 97 डिग्री सेंन्टीग्रेड का पानी 1200 लिटर प्रति मिनिट की दर से फव्वारों के रूप में निकल रहा है. इन फव्वारों से सौ किलोवॉट ओ.आर.सी. ऊर्जा इकाई के लिये अनुशंसा की गई है. निकट भविष्य में यह विद्युत् संयंत्र भू वैज्ञानिक सर्वेक्षण, तेल एवं प्राकृतिक गैस आयोग के सहयोग से स्थापित होगा. यह देश का अपनी तरह का दूसरा संयंत्र होगा, गर्म जल के फव्वारों पर पहला संयंत्र लद्दाख जिले की पुगा घाटी में लगाया गया है. तातापानी का जल खनिज लवणों से युक्त है यहाँ खनिज जल का एक प्लांट स्थापित किया जा सकता है.

रक्सगण्डा जल प्रपात (प्राकृतिक)-

सरगुजा जिले में ‘चांदनी थाना’ एवं ‘बलंगी’ नामक स्थान के समीप ‘रेंड नदी’ बहती है, जोकि वलंगी के निकट ‘रक्सगण्डा जल प्रपात’ का निर्माण करती है. प्रपात नीचे एक सँकरे कुंड का निर्माण करता है जिसकी गहराई काफी अधिक है एवं यहाँ से एक 100 मीटर की सुरंग निकलती है, सुरंग के छोर से रंग-बिरंगा पानी निकलता रहता है, जो अपनी तरह का एकमात्र उदाहरण है.

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