Sahity.in से जुड़ें @WhatsApp @Telegram @ Facebook @ Twitter

रायपुर जिला में पर्यटन / दर्शनीय स्थल

Get real time updates directly on you device, subscribe now.

रायपुर जिला में पर्यटन / दर्शनीय स्थल

रायपुर में स्थित दर्शनीय स्थल दूधाधारी मठ, महामाया मंदिर, किला या गढ़ के अवशेष (सन् 1460 में राजा भुवनेश्वर देव द्वारा निर्मित), बूढ़ा तालाब, भण्डारपुरी मंदिर, गोपाल, मंदिर, रहस्यमय शिव मंदिर आदि प्रमुख हैं. यहाँ स्थित महंत घासीदास संग्रहालय भी महत्वपूर्ण है, जो राजनांदगाँव रियासत के परोपकारी राजा महंत घासीदास द्वारा सन् 1875 में अंचल के लिए (एक विभागीय संग्रहालय के रूप में) स्थापित किया गया.


नन्दन कानन (वन्य प्राणी अभयारण्य)

नन्दन कानन रायपुर शहर से भिलाई की और राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक-6 पर 12वें
किमी. से दायीं ओर 3 किमी भीतर स्थित है. यह एक लघु जीव उद्यान है, जिसका रखरखाव वन विभाग की वन्य जीव
शाखा द्वारा किया जाता है, यहाँ विभिन्न प्रकार के वन्य प्राणी यथा शेर, तेंदुआ, हिरण की विभिन्न प्रजातियाँ व अनेक प्रकार
के पक्षी, सरीसृप लोगों के मनोरंजन एवं शिक्षा की दृष्टि से रखे गये हैं.

गिरौधपुरी (सतनामी समाज का तीर्थस्थल)-

बिलासपुर से लगभग 80 किलोमीटर तथा शिवरीनारायण से मात्र 12 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है-गिरीधपुरी, छत्तीसगढ़ की पावन भूमि एवं महानदी के किनारे स्थित पवित्र गाँव गिरोधपुरी में सोमवार माघ पूर्णिमा 18 दिसम्बर, 1756 को घासीदास का जन्म हुआ था, जो आगे चलकर संत घासीदास के नाम से प्रसिद्ध हुए. गुरु घासीदास छत्तीसगढ़ में सामाजिक क्रांति के प्रथम अग्रदूत एवं सतनामी सम्प्रदाय के प्रणेता हैं.

गुरु निवास

गिरीधपुरी में संत गुरु घासीदासजी का निवासगृह स्थित है. जहाँ लगभग 60 वर्ष प्राचीन जैत स्तम्भ है एवं समीप ही गुरुजी की गद्दी बनी हुई है, जिसके दर्शन करने के लिए समाज के लोग प्रतिवर्ष जाते हैं.

तपोभूमि

गिरीधपुरी से 2 किलोमीटर पूर्व दिशा में पहाड़ी पर ओरा व घोरा वृक्ष के नीचे गुरु घासीदासजी ने तप किया था, जिसके फलस्वरूप उन्हें संत ज्ञान की प्राप्ति हुई थी. इसलिए इस स्थल को तपोभूमि के नाम से जाना जाता है. प्रतिवर्ष इसी स्थल पर फाल्गुन शुक्ल पंचमी से लेकर सप्तमी तक मेला लगता है.

Chhattisgarhs turism रायपुर जिला में पर्यटन / दर्शनीय स्थल

छाता पहाड़

तपोभूमि से लगभग 8 किलोमीटर पूर्व की ओर स्थित पहाड़ी के ढाल में बहुत बड़ी शिला है जिसे छाता पहाड़ कहते हैं, गुरु घासीदासजी ने इस पर्वत की एक शिला पर बैठकर 6 माह तक समाधि लगाई थी.

सुफरा मठ-

गुरु घासीदास के जन्मस्थल के करीब 200 गज पूर्व दिशा में एक छोटा सा जलाशय है, जिसके समीप उत्तर दिशा में गुरु घासीदासजी की पत्नी सुफराजी का मठ है. इस मठ के विषय में किंवदंती है कि घासीदास के बड़े पुत्र अमरदास के वन में खो जाने के वियोग में माता सुफरा ने समाधि लगा ली थी, जिसे लोगों ने मृत समझकर गुरु की अनुपस्थिति में उपर्युक्त स्थान पर दफना दिया था. समाधि समाप्त होने पर उन्होंने माता सुफरा को पुनर्जीवित किया था. मेले के अवसर पर इस स्थल पर दर्शनार्थी आते हैं.

राजिम (ऐतिहासिक, धार्मिक : छत्तीसगढ़ का प्रयाग)-

रायपुर से 45 किलोमीटर की दूरी पर राजिम स्थित है. राजिम को ‘पद्मावतीपुरी’, ‘पंचकोशी’, ‘छोटा काशी’ आदि नामों से भी जाना जाता है. राजिम छत्तीसगढ़ का एक ‘त्रिवेणी संगम’ तीर्थ- स्थल है. धार्मिक दृष्टि से राजिम को ‘छत्तीसगढ़ का प्रयाग’ कहा जाता है. यहाँ महानदी, पैरी तथा सौंढुल (सौंढुर) नदियों का पवित्र संगम स्थल है. यह संगम स्थल प्राचीन कुलेश्वर मंदिर के निकट है, जो इसकी महत्ता को प्रकट कर रहा है. इस त्रिवेणी संगम का धार्मिक महत्व प्रयाग के समकक्ष है. इसीलिए यहाँ हिन्दू आकर श्राद्ध, पिण्डदान, तर्पण, पर्व स्नान, अस्थि विसर्जन, दान आदि करते हैं.

राजीव लोचन मंदिर

राजिम में ही ‘त्रिवेणी संगम’ के निकट राजीव लोचन मंदिर, छत्तीसगढ़ के प्राचीन मंदिरों में से एक है. मंदिर में अंकित महामण्डप की पार्श्व भित्ति पर कल्चुरि संवत् 896 (अर्थात् 1154 ई. सन्) का एक शिलालेख है. शिलालेख में कल्चुरी पृथ्वीदेव द्वितीय (1135-1165 ई.) के सेनानी द्वारा तलहारि मंडल को पराजित करने का वर्णन मिलता है. दूसरा शिलालेख 8वीं या 9वीं शताब्दी में लिखा गया प्राप्त हुआ है जिसे पढ़ने से पता चलता है कि यह एक विष्णु मंदिर है. इस तरह यह मंदिर यहाँ के मंदिरों में सर्वाधिक प्राचीन है. यह मंदिर अपनी प्रधानता तथा शिल्पगत प्रौढ़ता के कारण विशिष्ट है. गर्भगृह में काले पत्थर की बनी भगवान् विष्णु की चतुर्भुजी मूर्ति है. श्री राजीव लोचन मंदिर को ‘पाँचवाँ धाम’ माना गया है.

कुलेश्वर महादेव मंदिर-

पंचमुखी महादेव के दर्शन विश्व में गिने- चुने स्थानों पर होते हैं, उनमें से एक है राजिम, जहाँ पर पंचमुखी कुलेश्वर महादेव का मंदिर स्थित है. यह मंदिर महानदी, पैरी तथा सोंढुल (सोंदुर) तीनों नदियों के संगम में स्थित है. किंवदंती है कि भगवान् राम, सीताजी एवं लक्ष्मण ने वनवास के दिनों में यहाँ कुछ दिनों के लिए निवास स्थल बनाया था. संगम स्थल पर स्थापित कुलेश्वर महादेव का उल्लेख सतयुग की कथाओं में मिलता है,

इसके अलावा यहाँ महर्षि लोमेश ऋषि का आश्रम, सोमेश्वर महादेव का मंदिर, राजीमा तेलिन मंदिर, श्री रामचन्द्र मंदिर, श्री कालभैरव मंदिर, श्री गरीबनाथ मंदिर, श्री भूतेश्वर महादेव मंदिर, श्री पंचेश्वर महादेव मंदिर, जगन्नाथ मंदिर, ब्रह्मचर्य आश्रम आदि हैं. यहाँ महाशिवरात्रि के अवसर पर एक विशाल मेला लगता है. इस अवसर पर लाखों की संख्या में लोग त्रिवेणी संगम में स्नान करते हैं.

चम्पारन (महाप्रभु बल्लभाचार्य की जन्मस्थली)-

रायपुर से 56 किमी तथा राजिम से मात्र 9 किलोमीटर की दूरी पर चम्पारण्य या चंपाझर महानदी के समीप स्थित है. यहीं प्रसिद्ध वैष्णव संत महाप्रभु वल्लभाचार्य ने वैशाख कृष्ण ।। संवत् 1535 विक्रमी को जन्म लिया था. इनके पिता का नाम लक्ष्मण भट्ट था. ये तैलंग ब्राह्मण थे. चम्पारन को महाप्रभु की 84 बैठकों में से एक महत्वपूर्ण बैठक होने का गौरव प्राप्त है. यहाँ अरण्य के बीच चम्पकेश्वर महादेव का एक प्राचीन मंदिर है. चम्पारन धीरे धीरे छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध तीर्थ स्थल का रूप धारण कर रहा है. यहाँ पर दूर दूर से वैष्णव एवं सभी धर्मों के लोग दर्शन एवं पर्यटन हेतु आते हैं. प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा के अवसर पर यहाँ विशाल मेला लगता है.

पंचकोशी (तीर्थस्थल)-

राजिम का प्राचीन नाम कमल क्षेत्र पद्मावतीपुरी था. ऐसा नाम रखने का आधार यह था कि राजिम का कुलेश्वर मंदिर केन्द्र में है, जिसके आसपास 8-9 मील की दूरी पर कमल की पंखुड़ियों (कोसों) की भाँति पाँच तीर्थस्थल हैं, जिनके नाम हैं-पटेश्वर (पटेवा), चम्पेश्वर (चम्पारण), कोपेश्वर (कोपरा), बानेश्वर (बह्मनी) तथा फिंगेश्वर (फिगेश्वर). इसलिये इसे पंचकोशी कहा जाता है. इनकी बसावट कमल के फूल की भाँति है अतः इसे ‘कमल क्षेत्र’ भी कहा जाता है. छत्तीसगढ़ के ग्रामीण माघ फागुन माह में पाँचों देवालयों के लिए पद यात्रा करते हैं, जिसे ‘पंचकोशी’ यात्रा भी कहा जाता है. यह तीर्थस्थल एक पर्यटक केन्द्र है.

आरंग (मदिरों का नगर)-

राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 6 मुम्बई-कोलकाता राजमार्ग) पर रायपुर से 37 किलोमीटर की दूरी पर स्थित आरंग पौराणिक एवं पुरातात्विक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है. इस छोटे से नगर में अनेक मंदिर हैं, अतः आरंग को मंदिरों का नगर कहा जाता है. यहाँ जैनियों का एक कलापूर्ण उत्कृष्ट मंदिर है, इसे लोग भांड देवल (जैन मंदिर) के नाम से जानते हैं.

12वीं शताब्दी में निर्मित इस मंदिर के गर्भगृह में जैनधर्म के तीर्थंकर नेमीनाथ, अजीतनाथ तथा श्रेयांश की 6 फट ऊँची काले ग्रेनाइट पत्थर की मूर्तियाँ स्थापित हैं. साथ ही यहाँ पर 11वीं सदी पूर्व का प्राचीन शिव मंदिर बाघेश्वर बाबा मंदिर या बाघ देवल है. स्थ शैली के इस 18 स्तंभों एवं 60 फुट ऊँचे शीर्ष वाले मंदिर पर शिवरात्रि के अवसर पर मेला लगता है. इसके अलावा यहाँ के इस 18 स्तंभों एवं 60 फुट ऊँचे शीर्ष वाले मंदिर पर शिवरात्रि के अवसर पर मेला लगता है. इसके अलावा यहाँ के अनेक मंदिरों में बाबा हरदेव लाल मंदिर, महामाया मंदिर, पंचमुखी महादेव, पंचमुखी हनुमान आदि प्रमुख हैं .

तुरतुरिया (महर्षि वाल्मीकि की पुण्यभूमि)-

सिरपुर से लगभग 24 किलोमीटर दूर ‘तुरतुरिया’ नामक स्थल है. इसकी गणना तीर्थस्थानों में की जाती है. अनुश्रुति है कि वेतायुग में यहीं ‘महर्षि वाल्मीकि का आश्रम था और उन्होंने यहीं ‘सीताजी’ को ‘श्री रामचन्द्रजी’ द्वारा त्याग देने पर आश्रय दिया था. यहीं सीता के दोनों पुत्र ‘लव’ और’ और ‘कुश’ ने जन्म लिया था.

खल्लारी (खल्लवाटिका) –

प्राचीन राजधानी रायपुर से 80 किलोमीटर की दूरी पर आरंग खरियार रोड मार्ग पर बागबाहरा विकास खण्ड में खलारी ग्राम स्थित है. इसका प्राचीन नाम ‘खल्लवाटिका’ या ‘खैवाटिका’ था. यहाँ के देवालय से जो शिलालेख प्राप्त हुए हैं, उससे पता चलता है कि यह स्थान विक्रम संवत् 1471 अर्थात् ई. सन् 1415 का है और उसमें उल्लेखित है कि यह हैह्यवंशी’ राजा हरि ब्रह्मदेव की राजधानी थी. यह मंदिर देवपाल मोची द्वारा बनवाया गया था. कल्चुरियों की रायपुर शाखा के अंतर्गत खलारी भी एक महत्वपूर्ण गढ़ था. यहाँ खलारी माता का मंदिर एक पहाड़ी पर स्थित है. इसके अलावा यहाँ दर्शनीय स्थलों में भीम पाँव, भीम की नाव एवं चूल्हा, लखेशरी गुड़ी, आदि स्थल हैं. माना जाता है महाभारत कालीन भीम अर्थात् पांडव यहाँ आये थे.

पलारी (धार्मिक स्थल) –

रायपुर से 68 किलोमीटर उत्तर पूर्व में तथा बलौदाबाजार से ग्राम ‘पलारी’ 15 किलोमीटर दूर स्थित है. यहाँ ईंटों से निर्मित लगभग 8वीं 9वीं शताब्दी का अनूठा शिव मंदिर स्थित है. इस देवालय के निर्माण में अपनायी गई उत्कृष्ट तकनीक व सूझ बूझ पूर्णतः स्थानीय वास्तुकला का प्रमाण है और इससे छत्तीसगढ़ की अपनी स्वयं की मंदिर वास्तु शैली का बोध होता है.

नारायणपुर (ऐतिहासिक धार्मिक स्थल)-

वह रायपुर से 53 मील दूर महानदी के तट पर एक छोटा सा ग्राम है. यहाँ एक पूर्वाभिमुख शिव मंदिर है. स्थापत्य एवं मूर्तिकला की दृष्टि से यह 10वीं-11वीं शती ईस्वी का लाल बलुए पत्थर से बना हुआ है जहाँ शिल्प की श्रेष्ठ कृतियाँ दृष्टिगत होती हैं. खरीद में पाये गये सन् 1181 ई. के शिलालेख के अनुसार हैह्यवंशी राजाओं ने यहाँ पर एक सुंदर उद्यान लगवाया था.

चन्द्रखुरी (ऐतिहासिक धार्मिक स्थल)-

रायपुर से 30 किलोमीटर की दूरी पर ‘चन्द्रखुरी’ एक छोटा सा ग्राम स्थित है. वहाँ एक प्राचीन शिव मंदिर है. स्थापत्य एवं मूर्तिकला के आधार पर इस मंदिर को 13वीं-14वीं सदी ईसवी का माना जाता है.

उदयंती (बन्य प्राणी अभयारण्य)-

रायपुर जिले व ओडिशा की सीमाओं के मध्य ‘उदयंती’ अभयारण्य स्थित है, ‘उदयंती अभयारण्य’ 247-59 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर फैला हुआ है. यह अभयारण्य रायपुर से राजिम होते हुए लगभग 170 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. इस अभयारण्य में बाघ, तेंदुआ, वन, भैंसा, गौर, चीतल एवं अन्य वन्य प्राणियों की प्रचुरता है. यह प्रमुख रूप से वन भैंसा के संरक्षण हेतु 1983 को स्थापित किया गया है.

Get real time updates directly on you device, subscribe now.

Leave a comment