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महासमुंद जिला में पर्यटन [Tourism in Mahasamund District]

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महासमुंद जिला में पर्यटन

सिरपुर (ऐतिहासिक धार्मिक स्थल)

रायपुर से 77 किलोमीटर की दूरी पर वन्य क्षेत्र में ‘महानदी के तट पर वर्तमान ‘सिरपुर’ ग्राम है जो कभी ‘श्रीपुर’ तथा ‘चित्रांगदपुर’ के नाम से प्रचलित रहा है. सिरपुर अंचल के गौरवशाली अतीत के अनेक अवशेष सँजोये हुये हैं. यह छोटा सा गाँव कभी ‘शरभपुरीय वंश’, तत्पश्चात् ‘पाण्डुवंशीय’ राजाओं की राजधानी रहा है. इसका यशस्वी राजनैतिक इतिहास रहा है. बौद्ध ग्रंथ ‘अवदान शतक’ के अनुसार महात्मा बुद्ध यहाँ आये थे. प्राचीन समय में यह महत्वपूर्ण बौद्ध नगरी थी, जिसके प्रमाण यहाँ मिले चैत्य, विहार एवं अनेक बौद्ध मूर्तियाँ हैं. ह्वेनसांग ने भी 635-640 ई. के मध्य यहाँ की यात्रा की थी. कुछ विद्वानों द्वारा ऐसा माना जाता है कि सिरपुर ही महाभारतकालीन अर्जुन के पुत्र भब्रुवाहन की राजधानी थी और इसका तत्कालीन नाम मणिपुर अथवा चित्रांगदपुर था.

डॉ. एम.जी. दीक्षित ने सागर विश्वविद्यालय एवं पुरातत्व विभाग की ओर से यहाँ सन् 1955-56 में उत्खनन कार्य किया था जिससे इस स्थल के प्राचीन इतिहास पर प्रकाश पड़ा. डॉ. दीक्षित के अनुसार सिरपुर 5वीं सदी में आबाद था एवं उस समय यहाँ पर शरभपुर वंश के शासकों के शासन का उल्लेख मिलता है. यहाँ इस वंश के शासकों के अभिलेख भी प्राप्त हुवे हैं जो सिरपुर को इनकी राजधानी प्रमाणित करते हैं. इसके पश्चात् यहाँ सोमवंशियों का शासन रहा. कालांतर में कल्चुरियों द्वारा बिलासपुर के निकट तुम्मान तत्पश्चात् रतनपुर को अपनी राजधानी बनाया गया, जिससे रतनपुर का महत्व बढ़ता गया एवं सिरपुर का महत्व घटने लगा और अन्ततः इस ऐतिहासिक वैभवशाली नगरी का पतन हो गया.

दर्शनीय स्थल-

सिरपुर में स्थित दर्शनीय स्थल निम्न हैं-

Chhattisgarhs turism महासमुंद जिला में पर्यटन [Tourism in Mahasamund District]
‘बौद्ध विहार’ तथा ‘स्वास्तिक विहार’-

सन् 1955-56 में हुए उत्खनन के फलस्वरूप ‘बौद्ध विहार’ तथा ‘स्वास्तिक विहार’ प्रकाश में आये थे, बौद्ध विहार में 14 कक्षों से युक्त मुख्य गर्भगृह में साढ़े छः फुट ऊँची भगवान् बुद्ध की विशाल प्रतिमा स्थापित है. बुद्ध मंदिर के सामने पानी का ‘कुण्ड’ तथा चारों और बौद्ध भिक्षुओं की कुटिया बनी हुई हैं. इनका निर्माण लम्बी ईंटों तथा लम्बे-लम्बे प्रस्तर खण्डों से किया गया है. निर्माण की स्थिति देखकर ऐसा लगता है कि यह दुमंजिला रहा होगा. ‘स्वास्तिक विहार’ भी ‘बौद्ध विहार’ का लघु रूप दिखाई पड़ता है. बौद्ध विहार का निर्माण छठवीं शताब्दी में महाशिवगुप्त के शासन काल (595-655 ई.) में बौद्ध भिक्षु आनंदप्रभु द्वारा कराये जाने की जानकारी मिलती है.

लक्ष्मण मंदिर

‘पाण्डुवंश’ (सोमवंश) के राजा हर्षगुप्त का विवाह मगध के ‘मौखिरी’ राजा ‘सूर्यवर्मा’ की बेटी ‘वासटा देवी’ से हुआ था. वह वैष्णव धर्मावलम्बी थी. पति के स्वर्गवासी होने के उपरान्त पति की स्मृति को चिरस्थायी बनाने हेतु ‘राजमाता वासटा’ ने ‘सिरपुर’ में ‘हरि’ (विष्णु) का मंदिर’ बनवाया जो आज ‘लक्ष्मण मंदिर’ के नाम से विख्यात है.

इस समय इनके पुत्र महाशिव गुप्त बालार्जुन का शासन (595-655 ई.) था. लाल ईंटों द्वारा निर्मित यह मंदिर सिरपुर का विशेष आकर्षण है तथा सम्पूर्ण देश में प्रसिद्ध है. ईंटों में ही विभिन्न देवी-देवताओं, पशुओं, कमल पुष्पों की सुंदर व सुस्पष्ट आकृतियाँ मंदिर में ऊपर से नीचे तक उभारी गई हैं. ईंटों पर किसी किस्म का प्लास्टर नहीं होने के बावजूद सैकड़ों वर्षों की वर्षा, धूप में अपने सौंदर्य को समेटे खड़ा यह मंदिर वास्तुविदों तथा पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है. मंदिर के गर्भगृह में शेषनाग युक्त लक्ष्मणजी की एक प्रस्तर प्रतिमा रखी हुई है, संभवतः इसीलिए इसे ‘लक्ष्मण मंदिर’ कहा जाने लगा.

गंधेश्वर महादेव

गंधेश्वर महादेव का स्थापना काल 8वीं शताब्दी में माना जाता है इसका जीर्णोद्धार चिमनजी भोंसला राजा द्वारा कराया गया था. यहाँ काले पत्थर से बना शिवलिंग स्थापित है. इस मंदिर प्रांगण में भगवान् बुद्ध, जैन प्रतिमा, विष्णु, महिसासुर मर्दिनी तथा नटराज की प्रतिमायें दृष्टिगोचर होती हैं, जो तत्कालीन धर्मनिरपेक्षता की परिचायक हैं.

संग्रहालय-

लक्ष्मण मंदिर के पार्श्व में भारतीय पुरातात्विक विभाग द्वारा स्थापित एक संग्रहालय है. इसमें सिरपुर में प्राप्त लगभग 100 प्रतिमायें तथा कलाकृतियाँ संरक्षित हैं. ये कृतियाँ शैव, वैष्णव, बौद्ध, जैन आदि सम्प्रदायों से सम्बन्धित हैं. प्रतिवर्ष ‘बौद्ध पूर्णिमा’ के अवसर पर यहाँ ‘सिरपुर महोत्सव’ का आयोजन किया जाता है तथा प्रतिवर्ष ‘माघ पूर्णिमा’ के अवसर पर ‘मेला’ लगता है. प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग सन् 639 ईसवीं में कलिंग होते हुये दक्षिण कोसल की राजधानी पहुंचा था जिसने अपने यात्रा वृत्तांत में यहाँ का रोचक वर्णन किया है. किन्तु उसने यहाँ के राजा एवं राजवंश की चर्चा नहीं की है. उसने यहाँ अशोक के द्वारा स्तूप बनाए जाने का उल्लेख भी किया है. यदि विस्तृत उत्खनन कार्य किया जाये, तो यहाँ मौर्य एवं बुद्ध काल के अवशेष भी प्राप्त होंगे.

बार नवापारा (वन्य प्राणी अभयारण्य)-

यह रायपुर जिले की सीमा को छूता हुआ महासमुंद जिले में महानदी तट पर 80°22″30′ से 82°3730″ पूर्वी देशांतर तथा 21°1845″ से 21°300″ पूर्वी अक्षांश के मध्य स्थित ‘अभयारण्य’ है. राष्ट्रीय राजमार्ग क्र. 6 पर रायपुर के आगे स्थित पटेवा से इसकी दूरी 17 किलोमीटर है. अभयारण्य का सम्पूर्ण क्षेत्रफल 244-66 वर्ग किलोमीटर है. इस अभयारण्य में हिरणों की संख्या अधिक है. इसके अलावा, बाघ, तेंदुआ, चीतल, गौर आदि वन्य प्राणी यहाँ पाये जाते हैं. सागौन से आच्छादित वन और उसमें स्थित यह अभयारण्य पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र है. इसकी स्थापना 1976 में हुई थी. नवम्बर से जून के मध्य यह पर्यटकों के लिये खुला रहता है.

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