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दुर्ग जिला में पर्यटन [Tourism in Durg District]

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दुर्ग जिला में पर्यटन

दुर्ग (दुरुग) नगर :

एक परिचय यह रायपर से 37 किलोमीटर की दूरी पर स्थित जिला मुख्यालय है. इस नगर की नींव लगभग 10वीं शताब्दी में जगपाल ने डाली थी, जो मिर्जापुर जिले का निवासी था और रतनपुर राज्य में कोषाध्यक्ष का कार्य करता था. राजा रत्नदेव उसकी कार्य कुशलता से प्रसन्न और संतुष्ट थे फलतः उन्होंने दुरुग (किला) तथा क्षेत्र, जिसके अंतर्गत 700 गाँव आते थे, उसे पुरस्कार में प्रदान कर दिया. दुरुग का असली नाम ‘शिव दुर्ग’ था, जैसाकि दुरुग में प्राप्त एक शिलालेख से विदित होता है.

‘दुर्ग’ नगर में मिट्टी के किले के खण्डहर, जिनका निर्माण स्पष्टतः प्राचीन समय में हुआ था, अभी भी दृष्टिगत होते हैं.

औद्योगिक नगर (भिलाई)-

भिलाई, मुम्बई-हावड़ा रेलमार्ग का एक प्रमुख रेलवे स्टेशन है, जिसे ‘औद्योगिक नगरी’ के रूप में जाना जाता है. इसे छत्तीसगढ़ की ‘गार्डन सिटी’ भी कहा जाता है.

भिलाई इस्पात संयंत्र-

यह संयंत्र शैक्षणिक व तकनीकी रुचि वाले पर्यटकों के लिये महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल है. सार्वजनिक क्षेत्र के इस प्रथम इस्पात संयंत्र की स्थापना द्वितीय योजना काल में सोवियत रूस के तकनीकी सहयोग से हुई थी.

टाउनशिप-

भिलाई टाउनशिप में नेहरू आर्ट गैलरी एवं विभिन्न धर्मावलम्बियों के उपासनागृह देखने योग्य हैं,

मैत्रीबाग-

मैत्रीवाग 100 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ एक अत्यंत सुन्दर उद्यान व चिड़ियाघर है, जो भारत रूस मैत्री सम्बन्ध की याद में स्थापित किया गया था. यहाँ पर देशी विदेशी नस्ल के वन्य जीवों का अच्छा संग्रह है. टॉय ट्रेन, कृत्रिम झील व झरना मैत्रीबाग के विशेष आकर्षण हैं. झील में नौका विहार की सुविधा है.

नवागढ़ (पुरातात्विक, ऐतिहासिक)-

दुर्ग से 63 मील की दूरी पर बेमेतरा तहसील में छत्तीसगढ़ों में एक ‘नवागढ़’ पूर्वकाल में गोंड राजाओं की राजधानी थी. यहाँ एक प्राचीन मंदिर है, जो ‘खेड़पति मंदिर’ के नाम से जाना जाता है जिसमें संवत् 704 वि. (सन् 647) उत्कीर्ण है.

गुरूर (ऐतिहासिक, धार्मिक)

‘बलोदा धमतरी मार्ग’ पर बसे ‘गुरूर’ में 9-10वीं शताब्दी में बना हुआ ‘महाभैरव मंदिर’ स्थित है. प्रमाणों से पता चलता है कि इसे कांकेर रियासत के नरेश व्याघ्रराज (बागराज) ने बसाया था.

तांदुला (बाँध)

दुर्ग जिला मुख्यालय से बालोद होते हुए लगभग 64 किलोमीटर की दूरी पर ‘तांदुला’ बाँध स्थित है. इसका निर्माण ‘तांदुला नदी’ पर 1923 में किया गया. सुन्दर प्राकृतिक सौंदर्य लिये यह एक पर्यटन स्थल है.

नगपुरा (उबसग्गहरं पार्श्वनाथ तीर्थ-छत्तीसगढ़ का एकमात्र जैन तीर्थ)-

दुर्ग जिला मुख्यालय से 14 किलोमीटर दूर देश के प्रमुख जैन तीर्थों में एक एवं छत्तीसगढ़ का एकमात्र जैन तीर्थ नगपुरा (पारस नगर) स्थित है. शिवनाथ के किनारे खुदाई में मिलने वाली पार्श्वनाथ प्रतिमायें संकेत करती हैं कि पार्श्वनाथ इस रास्ते से कभी गुजरे होंगे. कलचुरी वंश के शंकरगण के प्रपौत्र गजसिंह ने एक पार्श्वनाथ प्रतिमा की स्थापना के समय (ईसवीं 919) संकल्प किया था कि वह राज्य में ऐसी 108 प्रतिमायें स्थापित करेगा. ताम्रपत्र में उसने लिखा है यदि वह ऐसा नहीं कर सका, तो उसके वंशज ऐसा करेंगे. गजसिंह के प्रपौत्र जगतपाल सिंह ने नगपुरा में पार्श्वनाथ की प्रतिमा स्थापित की थी. खण्डित चरण पादुकाएं एवं जीर्ण-शीर्ण मंदिर इसका प्रमाण माने जाते हैं.

1982 में उत्तर प्रदेश की गंडक नदी के किनारे ग्राम उगना में 24 तीर्थकरों में से 23वें तीर्थकर पार्श्वनाथ की प्रतिमा प्राप्त हुई बाद में इसे नगपुरा लाया गया.

1985 से नगपुरा का तीर्थोद्वार शुरू हुआ तभी से यह तीर्थस्थल के रूप में विकसित हुआ में पार्श्वनाथ का विशाल जिनालय (मंदिर) है. तीन शिखरों से युक्त इस मंदिर के गर्भगृह में पार्श्वनाथ की 15 प्रतिमायें प्रतिष्ठित हैं. यह जैन तीर्थ विश्व भर में प्रसिद्ध हो चुका है. प्रतिवर्ष यहाँ लगभग दस लाख लोग आते हैं. अमरीका, केन्या, इंगलैण्ड, जापान, आस्ट्रेलिया, नेपाल आदि अनेकानेक देशों से तीर्थ यात्री यहाँ आ चुके हैं. यहाँ 6 धर्मशालायें हैं जिसमें 100 कमरे हैं एवं 1200 लोग एक साथ ठहर सकते हैं.

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