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बिलासपुर जिला में पर्यटन [Tourism in Bilaspur District]

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बिलासपुर जिला में पर्यटन [Tourism in Bilaspur District]

रतनपुरा (ऐतिहासिक, धार्मिक स्थल)-

विलासपुर से लगभग 25 किलोमीटर की दूरी पर बिलासपुर कटघोरा मार्ग पर ‘रतनपुर स्थित है. रतनपुर अनेक तालाबों और मंदिरों से युक्त प्राचीन धार्मिक नगरी है. प्राचीन ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक दृष्टि से यह एक महत्वपूर्ण स्थल है. पहाड़ियों के बीच स्थित रतनपुर प्राचीन छत्तीसगढ़ की राजधानी’ रहा है. प्राकृतिक दृष्टि से उपयुक्त होने के कारण कल्चुरि राजाओं ने इसे अपनी राजधानी बनाया. कल्चुरि काल में यह सभी तरह की गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र था. इसे ‘रत्नदेव प्रथम’ ने बसाया था, जिसके कारण इसका नाम ‘रतनपुर’ पड़ा. दर्शनीय स्थलों में रतनपुर अपने प्राचीन वैभव के परिणामस्वरूप ऐतिहासिक, धार्मिक एवं पुरातात्विक महत्व के स्थल संजोये हुये है.

महामाया का प्रख्यात मंदिर

नगर में ‘महामाया’ का प्रख्यात मंदिर स्थित है. इस मंदिर का निर्माण राजा रत्नदेव के द्वारा लगभग 11वीं शताब्दी में कराया गया था. मंदिर का सभागृह राजा बाहरसाय द्वारा शिल्पी छितक के द्वारा बनवाया गया था. मंदिर के गर्भगृह में देवी महामाया की प्रतिमा स्थापित है. महामाया आज भी जाग्रत सिद्ध शक्तिपीठ है. नवरात्रि के अवसर पर यहाँ मेला लगता है. इसके अलावा भैरव मंदिर, राम पंचायतन मंदिर (राम टेकरी), श्री वृद्धेश्वरनाथ मंदिर, श्री रत्नेश्वर महादेव, भुवनेश्वर महादेव, लखनी देवी मंदिर (इकबीर का मंदिर), कण्ठीदेऊल मंदिर, जगन्नाथ मंदिर, मल्ली मकरबन्ध, रतनपुर का किला, सती चौरे, बीस दुवरिया (सती मंदिर), मूसा खाँ की दरगाह आदि स्थल भी दर्शनीय हैं.

खूटाघाट जलाशय (प्राकृतिक)-

बिलासपुर-कोरवा मार्ग पर 25 किमी दूरी पर, ‘रतनपुर’ से 8 किमी की दूरी पर, खूटाघाट (खारंग जलाशय) जलाशय स्थित है. यह जलाशय खारंग नदी पर बाँध बनाकर तैयार किया गया है. बाँध की अधिकतम ऊँचाई 21.3 मी एवं लम्बाई 495 मी है. इस बाँध का निर्माण सन् 1931 में पूर्ण हुआ. इससे दो मुख्य नहरें बायीं तट, दायीं तट सिंचाई हेतु निकाली गई हैं. जल संग्रह क्षमता 194 मिलियन घनमीटर है. यह जलाशय पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र है, जो चारों ओर पहाड़ों से घिरा हुआ नैसर्गिक सौंदर्य से परिपूर्ण है. समय समय पर जलाशय में नौकाचालन की व्यवस्था भी की जाती है.

पाली (ऐतिहासिक, पुरातात्विक)-

पाली, बिलासपुर जिलान्तर्गत बिलासपुर-अम्बिकापुर मार्ग में 55 किमी की दूरी पर स्थित पाली छत्तीसगढ़ के प्राचीन ऐतिहासिक स्थलों में एक महत्वपूर्ण स्थल है. यहाँ स्थित शिव मंदिर’ पुरातात्विक महत्व का है. एक हजार वर्ष पूर्व का यह प्राचीन शिवालय आज भी प्राचीन मूर्तिकला और इतिहास को अपने गर्भ में समेटे ‘पाली’ के बाहरी भाग में सरोवर के तट पर स्थित है.

खजुराहो, कोणार्क, भोरमदेव आदि मंदिरों की तरह दक्षिण कोसल की शैली में यहाँ ‘काम-कला’ का चित्रण मिलता है. यहाँ मिथुन मुद्राओं का चित्रण कलात्मकतापूर्वक किया गया है. पाली के इस शिव मंदिर का निर्माण ‘बाणवंशीय राजा प्रथम विक्रमादित्य’ जिसे ‘जयमेऊ’ भी कहा जाता है, के द्वारा कराया गया था जिनका शासनकाल दक्षिण कोसल पर सन् 870 से 895 ई. तक था. तत्पश्चात् इस मंदिर का जीर्णोद्धार कल्चुरीवंशीय जाजल्यदेव के समय हुआ था, क्योंकि मंदिर के तीन चार स्थानों पर ‘श्रीमज्जाजल्ल देवस्य कीर्तियम्’ खुदा हुआ है. प्रतिवर्ष महाशिवरात्रि के अवसर पर यहाँ मेला लगता है.

लाफागढ़ (चैतुरगढ़) (ऐतिहासिक, पुरातात्विक)-

बिलासपुर से लगभग 45 किमी की दूरी पर तथा ‘बिलासपुर-कोरवा मार्ग’ पर स्थित ‘पाली’ से 15 किमी की दूरी पर लाफागढ़’ स्थित है, जोकि एक महत्वपूर्ण पुरातात्विक और ऐतिहासिक स्थल है. गढ़ मंडला के गोंड राजा ‘संग्रामशाह’ के बावन गढ़ों की सूची में ‘लाफागढ़’ (चैतुरगढ़) सम्मिलित रहा है. 15-16वीं सदी ई. में गोंड़ों के साम्राज्य में इस गढ़ का राजनैतिक एवं सामरिक दृष्टि से विशेष महत्व था.

दुर्गम पर्वतमाला की समतल चोटी पर लगभग दो हजार फीट की ऊँचाई पर अवस्थित ‘लाफागढ़’ चैतुरगढ़ के नाम से जाना जाता है. यहाँ ‘चैतुरगढ़ का किला’ स्थित है, जिसकी ऊँचाई समुद्र सतह से 3240 फीट है. इस किले का निर्माण 14वीं शताब्दी में कल्चुरि शासक बाहरसाय के काल में करवाया गया था. इस किले को दुर्गमता तथा सुरक्षा की दृष्टि को देखकर अंग्रेज शासक ‘बेगलर’ ने कहा था कि “मैंने इससे दुर्गम तथा सुरक्षित किला नहीं देखा.”

किले के अंदर ‘महामाया देवी का मंदिर’ है. यहाँ प्रतिवर्ष ‘चैत्र’ एवं ‘क्वार’ की नवरात्रि के अवसर पर नौ दिनों का ‘मेला’ लगता है. किले के वायीं ओर तीन किमी की दूरी पर “शंकर खोला गुफा’ स्थित है. ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण लाफागढ़ का किला एक आकर्षक पर्यटन स्थल है.

गनियारी (ऐतिहासिक, पुरातात्विक)-

बिलासपुर से लगभग 20 किमी की दूरी में कोटा मार्ग पर ‘गनियारी’ स्थित है. यहाँ 12वीं शताब्दी का एक प्राचीन शिव मंदिर’ ‘देवर तालाब के किनारे भग्नावस्था में स्थित है, जो पुरातात्विक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है. वर्तमान में मंदिर का गर्भगृह ही शेष है. इसके अलावा यहाँ खुदाई में ।।वीं शताब्दी की अनेक मूतियाँ प्राप्त हुई हैं.

धनपुर (ऐतिहासिक, पुरातात्विक एवं धार्मिक)

प्राचीन नगर बिलासपुर से ‘बिलासपुर कटनी रेलमार्ग’ पर पेंड्रा रोड स्टेशन से 23 किमी की दूरी पर ‘धनपुर’ नामक प्राचीन ऐतिहासिक नगर है. ‘धनपुर’ जैन धर्मावलम्बियों का अंचल का सबसे बड़ा प्राचीन व्यवसायिक केन्द्र था. प्राचीनकाल में प्रमुख व्यापारिक पथ में होने के कारण ‘धनपुर’ जैन धर्मावलम्बियों के वैभवशाली नगर के रूप में प्रसिद्ध था. धनपुर में जैन धर्म के अलावा शैव धर्म से सम्बन्धित अवशेष भी प्राप्त हुए हैं.

धनपुर ग्राम में ऋषभनाथ तालाब स्थित है, जिसके समीप एक पेड़ के नीचे जैन तीर्थकर की प्रतिमा ‘ग्राम देवता’ के रूप में स्थापित है, जबकि बायीं ओर परकोटा खींचकर माँ दुर्गा की प्रतिमा स्थापित की गयी है, मंदिर परिसर में जैन धर्म से सम्बन्धित अनेक प्रतिमाएँ रखी हुई हैं. गाँव से लगभग 2-2 किमी दूर एक विशाल काली, किन्तु बलुई प्राकृतिक चट्टान में, जैन धर्म से सम्वन्धित एक विशाल प्रतिमा, अर्द्धगठित स्थिति में खुदी हुई है जिसे यहाँ के निवासी ‘बेनी वाई’ के नाम से जानते हैं. कार्योत्सर्ग मुद्रा में उत्कीर्णित तीर्थकर प्रतिमा लगभग 25 फुट ऊँची है. छत्तीसगढ़ अंचल में यही एकमात्र शैलोत्कीर्णित जैन- मूर्तिकला का उदाहरण है.

अचानकमार (वन्य प्राणी अभयारण्य)

यह अभयारण्य बिलासपुर से 58 किमी दूर विलासपुर पेंड्रा-अमरकण्टक मार्ग पर 551 वर्ग किमी वन क्षेत्र में विस्तृत है. घने साल वनों और विविध वन्य प्राणियों के वाहुल्य वाला क्षेत्र ‘अचानकमार अभयारण्य’ प्रकृति प्रेमियों एवं पर्यावरण संरक्षण से जुड़े लोगों के लिये महत्वपूर्ण स्थल है. अचानकमार’ को सन् 1975 में अभयारण्य घोषित किया गया. इस अभयारण्य में बाघ, तेन्दुआ, गौर, चीतल आदि वन्य प्राणियों के साथ अनेक विविध वन्य जीव पाये जाते हैं. पर्यटकों के ठहरने हेतु अचानकमार’ एवं ‘लमनी’ में विश्रामगृह उपलब्ध हैं. यहाँ बाघों की संख्या 31 है तथा अभयारण्य में दुर्लभ ‘माउस डीयर’ पाया जाता है,

अमरकंटक (ऐतिहासिक, पुरातात्विक एवं धार्मिक)

अपने गर्भ में विपुल खनिज सम्पदा छिपाये एवं आयुर्वेदिक जड़ी बूटियों से युक्त वनस्पति तथा स्वास्थ्यप्रद जलवायु से परिपूर्ण यह स्थल छत्तीसगढ़ का महत्वपूर्ण सांस्कृतिक केन्द्र है.

प्राचीनकाल में अमरकंटक के अरण्य में कपिलमुनि ने यहाँ तपस्या कर अपनी तपोस्थली बनाई. संत कबीर भी यहाँ पहुँचे थे. मराठा काल में रानी अहिल्याबाई होल्कर ने नर्मदा उद्गम स्थल पर कुण्ड एवं मंदिर का निर्माण कराया. मुगल-मराठा काल तक अमरकंटक रतनपुर राज्य के पेंड्रा जमींदारी के अन्तर्गत आता था, किन्तु 1857 की क्रांति में स्वामीभक्ति प्रदर्शित करने के फलस्वरूप यह क्षेत्र रीवां राज्य को पुरस्कार के रूप में अंग्रेजों द्वारा पेंड्रा जमींदारी से लेकर दे दिया गया. मध्य प्रदेश राज्य बनने पर 1956 में यह रीवा संभाग के शहडोल जिले में चला गया और पुनः सन् 2000 में छत्तीसगढ़ राज्य बनने पर मध्य प्रदेश राज्य का हिस्सा बन गया, किंतु राज्य निर्माण के पश्चात् छत्तीसगढ़ द्वारा इस क्षेत्र की माँग की जा रही है. दर्शनीय स्थल दर्शनीय स्थलों के कारण ‘अमरकंटक’ एक आकर्षक पर्यटन स्थल है.

कबीर चबूतरा, नर्मदा कुण्ड (नर्मदा उद्गम), कपिलधारा (जलप्रपात), दुग्धधारा (जलप्रपात), सोनमुड़ा (सोन उद्गम), माई की बगिया, भृगु कमंडल, माई का मण्डप, श्री ज्वालेश्वर महादेव (जुहिला नदी या ज्वाला नदी के उद्गम स्थल जलेश्वर पर स्थित) तथा ‘श्री यंत्र’ महामेरू मंदिर, आदि मंदिरों के अलावा यहाँ बॉक्साइट खदान भी लोकप्रिय है.

बेलपान (लघु अमरकंटक-धार्मिक)-

बिलासपुर से 30 किमी दूरी पर मनियारी नदी तट पर तखतपुर से 11 किमी उत्तर को ओर ऐतिहासिक ग्राम-‘बेलपान’ स्थित है. दर्शनीय स्थल शिव मंदिर, विशाल कुण्ड (माँ नर्मदा का उद्गम स्रोत), सीता कुण्ड, महात्माजी की समाधि आदि हैं,

मल्हार (ऐतिहासिक, पुरातात्विक एवं धार्मिक एवं प्राचीन राजधानी)

यह स्थान बिलासपुर के दक्षिण-पश्चिम में विलासपुर से रायगढ़ जाने वाले सड़क मार्ग पर मस्तूरी से लगभग 14 किमी की दूरी पर स्थित है. यहाँ सागर विश्वविद्यालय एवं पुरातत्व विभाग द्वारा उत्खनन कार्यों से इस स्थल की प्राचीनता एवं यहाँ के प्राचीन वैभवशाली संस्कृति एवं इतिहास की जानकारी प्राप्त हुई है जिसमें यहाँ ताम्र पाषाण काल से लेकर मध्यकाल तक का क्रमवद्ध इतिहास प्रमाणित हुआ है.

इसे भी पढ़ें : मल्हार नगर का परिचय [Introduction to Malhar Nagar]

सरगाँव (पुरातात्विक, धार्मिक)-

बिलासपुर से 28 किमी की दूरी पर बिलासपुर-रायपुर मार्ग पर ‘सरगाँव’ स्थित है. दर्शनीय स्थल-यहाँ एक प्राचीन शिव मंदिर है, शिल्पकला के आधार पर मंदिर को 11वीं शताब्दी का माना जा सकता है. देवकिरारी (पुरातात्विक, धार्मिक)-बिलासपुर से 27 किमी की दूरी पर तथा बिलासपुर रायपुर रेलमार्ग पर स्थित ‘विल्हा’ स्टेशन से देवकिरारी लगभग 3 किमी की दूरी पर है. यहाँ लगभग 12वीं शताब्दी के एक प्राचीन मंदिर के भग्नावशेष स्थित हैं. सम्भवतः देवकिरारी कलचुरिकालीन कला का समृद्ध केन्द्र रहा होगा.

तालागाँव (बाममार्गियों की तंत्र साधना स्थली-ऐतिहासिक, पुरातात्विक, धार्मिक)-

बिलासपुर से 27 किमी की दूरी पर ‘बिलासपुर रायपुर मार्ग’ पर भोजपुर ग्राम से लगभग 7 किमी तथा ‘बिलासपुर रायपुर रेल मार्ग’ पर ‘दगोरी’ स्टेशन से मात्र एक-डेढ़ किमी दूर ‘अमेरीकापा ग्राम के समीप मनिवारी नदी के तट पर तालागाँव’ नामक स्थान है. दर्शनीय स्थल-तालागाँव में लगभग चौथी-पाँचवीं शताब्दी के पुरातात्विक महत्व के दो मंदिर तथा अद्भुत रौद्रशिव की प्रतिमा उल्लेखनीय हैं.

सर्वप्रथम बिलासपुर के तत्कालीन कमिश्नर मि. फिशर ने पुरातत्ववेत्ता जे.डी. बेगलर को इन पुरावशेषों की सूचना 1873-74 में दी. इसके बाद 20वीं शताब्दी में पं. लोचन प्रसाद पाण्डेय ने छठे दशक में इसे चिह्नित किया, किंतु सातवें दशक में डॉ. विष्णु सिंह ठाकुर ने इनकी जानकारी सार्वजनिक की. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर 1980 में अमरीकी शोधार्थी ‘डोनाल्ड स्टेडनर’ ने ताला के देवरानी मंदिर का प्रकाशन छायाचित्रों सहित कराया, इसके बाद राज्य शासन के पुरातत्व विभाग ने अधिग्रहीत कर इनके संरक्षण की व्यवस्था की.

देवरानी/जेठानी मंदिर

तालागाँव में मनियारी नदी के किनारे दो मंदिर स्थित हैं. संयुक्त नाम ‘देवरानी/जेठानी’ मंदिर ग्रामीणों द्वारा इनकी स्थिति के कारण दिया गया है. बायें जेठानी तथा दाहिने पार्श्व पर ‘देवरानी मंदिर’ स्थित है. यह मंदिर कुछ अच्छी हालत में है, जोकि लाल बलुये पत्थरों से बना है. यह गुप्तकालीन शिल्प स्थापत्यकला का प्रतिनिधित्व करता है. यह ‘जलेश्वर शिव का मंदिर’ है.

इस मंदिर का शिल्पगत सौंदर्य, सूक्ष्मता की दृष्टि से गुप्तकालीन मंदिरों की ज्ञात श्रृंखला में अद्भुत है.

देवरानी मंदिर की बाई और ‘जेठानी मंदिर’ स्थित है. यह मंदिर भग्नावस्था में है, किन्तु कुछ मूर्तियाँ एवं फलक प्रतिमायें अच्छी स्थिति में हैं. यह ‘कुपाण’ शिल्प स्थापत्यकला का प्रतिनिधित्व करता है. इसमें स्थूल और विशालकाय मूर्तियों का ढेर है. देवरानी और जेठानी मंदिर के निर्माणकाल में लगभग 50-60 वपों का अंतर है. ये दोनों मंदिर चौवी एवं पाँचवी शताब्दी के मध्य निर्मित हुए हैं.

रुद्र शिव : विश्व की अद्भुत प्रतिमा

तालागाँव के देवरानी मंदिर के द्वार पर उत्खनन के दौरान शिव के रौद्र रूप की अनुपम कृति युक्त एक प्रतिमा टीले में दबी हुई प्राप्त हुई है, जिसका नामकरण एवं अभिज्ञान आज तक नहीं हो सका है. इसे सन् 1987 में निकाला गया था. इस प्रतिमा को वास्तु इतिहास की अनहोनी कहा जा सकता है.

इस प्रतिमा का विवरण इस प्रकार है-

  • प्रतिमा के 11 अंग विभिन्न प्राणियों से निर्मित किये गये हैं.
  • यह सात फुट ऊँची, चार फुट चौड़ी तथा छः टन वजन की लाल बलुये पत्थर की बनी है.
  • इस प्रतिमा को अभी तक रुद्रशिव, महारुद्र, पशुपति, अघोरेश्वर, महायज्ञ विरूपेश्वर, यक्ष आदि नाम दिये जा चुके हैं.
  • इस अद्भुत प्रतिमा के शिरोभाग पर नाग बुग्मों का पगड़ीनुमा केश विन्यास है. नाक तथा भौंह छिपकली द्वारा, नेत्र विस्फारित भेक मुख तथा नेत्र गोलक अंडे से बने हुये हैं. मूछे- मत्स्य, टुड्डी केकड़ा, कर्ण मयूर एवं कंधे मकर से बनाये गये हैं.
  • हाथों की उंगलियाँ सर्प मुखों से निर्मित हैं. दोनों कंधों के ऊपर नागफणों का छत्र है.
  • लिंग-कच्छप से तथा अण्डकोष घंटाकृति से अलंकृत है.
  • जंघाओं पर चार विनम्र चेहरे, घुटने पर दो बाद्यमुख तथा उदर व सीने पर भी मुख उत्कीर्ण है.
  • सम्भवतः पाँचवीं छठी सदी की यह कलाकृति शरभपुरी शासकों के काल की अनुमानित है, क्योंकि यहाँ छठी सदी के शरभपुरीय शासक प्रसन्नमात्र का उभारदार रजित सिक्का भी मिला है, साथ ही कल्चुरी रत्नदेव प्रथम व प्रतापमल्ल की एक रजत मुद्रा भी प्राप्त है.
  • मूल प्रतिमा देवरानी मंदिर तालाग्राम परिसर में सुरक्षित है.

लुतरा शरीफ (धार्मिक)-

बिलासपुर-बलौदा मार्ग पर लगभग 32 किमी प्रसिद्ध मुस्लिम धार्मिक स्थल ‘लुतरा शरीफ’ स्थित है. यहाँ प्रसिद्ध मुस्लिम संत हजरत वावा सैयद इंसान की दरगाह स्थित है. सभी धर्मों के लोग बाबा की दरगाह पर आकर मनोवांछित फल प्राप्त करते हैं. यहाँ वर्ष में उर्स का आयोजन होता है.

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