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गांधीवादी नेता ठाकुर रामप्रसाद पोटाई

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गांधीवादी नेता ठाकुर रामप्रसाद पोटाई

कांकेर जिले के प्रख्यात गांधीवादी नेता ठाकुर रामप्रसाद पोटाई का जन्म भानुप्रतापपुर तहसील के करमोती गाँव में 1904 में हुआ था. उनका स्थान छत्तीसगढ़ के स्वाधीनता संग्राम सेनानियों के मध्य अग्रणी है. ब्रिटिश छत्तीसगढ़ की रियासतों में जनता द्वारा तीसरे दशक में सामंतशाही एवं ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष चल रहा था, जिसका नेतृत्व ठाकुर प्यारे लाल सिंह कर रहे थे. श्री रामप्रसाद पोटाई इस संघर्ष में कांकेर रियासत में जनता को अपना सक्रिय नेतृत्व दे रहे थे. श्री पोटाई द्वारा रायगढ़ एवं राजनांदगाँव आदि रियासतों में चल रहे संघर्ष की भाँति बस्तर एवं कांकेर रियासतों में भी जनजातियों को संघर्ष हेतु प्रेरित किया गया.

ठाकुर रामप्रसाद पोटाई
ठाकुर रामप्रसाद पोटाई

शिक्षा

ठाकुर रामप्रसाद पोटाई की आरम्भिक शिक्षा कांकेर रियासत के कॉफर्ड हाईस्कूल में हुई. उच्च शिक्षा के अंतर्गत उन्होंने वी.ए. एवं एल एल.वी. की डिग्री मोरिस कॉलेज नागपुर में प्राप्त की. उस समय नागपुर मध्य प्रांत की राजधानी होने के साथ राजनीतिक गतिविधियों का प्रसिद्ध केन्द्र भी था. धमतरी तहसील के सिहावा तथा राजनांदगाँव के बदराटोला आदि सत्याग्रहों में इन्होंने कांकेर रियासत के किसानों के शिक्षित नवयुवकों को प्रशिक्षित कर भाग लेने हेतु तैयार किया था.

राजनीति

श्री पोटाई ने 1939 में कांग्रेस के त्रिपुरी अधिवेशन में भाग लिया. वे सुभाष चन्द्र बोस के समर्थक थे, किन्तु कांग्रेस से उनके त्यागपत्र के पश्चात् वे पुनः कांग्रेस के लुधियाना अधिवेशन में गांधीजी से मिलने गये. गांधीजी से प्रेरित होकर वे ‘रियासती कृपक प्रजा परिषद्’ के गठन की दिशा में सक्रिय हो गये. 1939-45 के द्वितीय विश्व-युद्ध के समय, कांकेर रियासत भी जनता से बेगार, पट्टानवीसी तथा नजराना वसूलने के लिए उनका उत्पीड़न कर रही थी, के विरुद्ध श्री पोटाई ने किसानों को विनम्र प्रतिरोध हेतु संगठित किया. वे 1939 में कांकेर नगरपालिका के नामजद सदस्य भी रहे. इस मध्य उन्होंने जगदलपुर, धमतरी, रायपुर आदि के प्रतिनिधियों के सहयोग से रियासतों में जनजातियों के विकास हेतु अपना कार्य जारी रखा.

राष्ट्रवादी गतिविधियों का संचालन

1942-1946 के मध्य उन्होंने, कांकेर, नरहरपुर तथा भानुप्रतापपुर में युवकों के साथ, गांधीवादी राष्ट्रीय वाचनालय तथा खद्दर प्रचारक क्लब की स्थापना करके राष्ट्रवादी गतिविधियों का संचालन किया. जगदलपुर के पत्रकार तथा रायपुर के क्रान्तिकारी निरन्तर, गुप्त रूप से उनसे मिलते रहते थे. दिसम्बर, 1946 में, सी.पी. एंड ओरिसा रियासती लोक परिषद् से मध्यप्रांत देशी राज्य लोक परिषद् अलग हो गया जिसके अध्यक्ष ठाकुर प्यारे लाल सिंह बने. 1946 में कांकेर रियासत-किसान सभा का गठन हुआ. वे किसानों एवं ग्रामीण युवकों को रियासत के विलय हेतु सक्रिय आन्दोलन चलाने, संगठित करने लगे. अगस्त 1947 में देश की आजादी के साथ ही भारत की अन्य रियासतों की भाँति, कांकेर रियासत को भी, वहाँ के नरेश ने स्वतंत्र घोषित कर दिया था जिसके विरोध में सितम्बर 1947 में कांकेर स्टेट कांग्रेस का संगठन हुआ. यह संगठन किसान सभा के बदले स्थापित हुआ था जिसके अध्यक्ष राम प्रसाद पोटाई बने थे.

रियासती विलय का मसला

ठाकुर राम प्रसाद पोटाई ने रियासती विलय के मसले को संविधान सभा में प्रखरता से उठाया था जिसके फलस्वरूप मध्य प्रांतीय रियासतों का प्रांतीय जिलों में विलय करने का मसला राष्ट्रव्यापी मुद्दे के रूप में सम्मिलित किया गया था. इन्हीं दिनों छत्तीसगढ़ की नांदगाँव, सक्ती तथा रायगढ़ रियासतों में जन आंदोलन प्रबल होने लगा था. ठाकुर राम प्रसाद पोटाई (कांकेर) तथा पं. सुंदर लाल त्रिपाठी (बस्तर) के प्रयासों से इन जिलों की रियासतों में भी जन आंदोलन उग्र हो उठा था. ऐसी स्थिति में रियासत विभाग के प्रमुख मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल 15 दिसम्बर, 1947 को नागपुर पहुंचे जहाँ मध्य प्रांतीय रियासतों की विलीनीकरण वार्ता आयोजित की गयी. ठाकुर रामप्रसाद पोटाई तथा किशोरी मोहन त्रिपाठी ने मध्य प्रांत की रियासतों के विलीनीकरण की माँग हेतु ‘मेमोरेंडम’, सरदार पटेल को सौंपा था.

1948 के रियासती विलीनीकरण के उपरांत जमींदारी उन्मूलन एवं भूदान आंदोलन से पोटाई निरंतर जुड़े रहे. उन्होंने जनजातियों एवं गैर जनजातीय कृषक, खेतिहरों को सामाजिक उत्थान एवं राष्ट्र सेवा में समर्पित होने हेतु प्रेरित किया. 1962 चीन-भारत युद्ध में एवं 1971 के भारत पाक युद्ध के समय युवकों एवं सामाजिक संगठनों को राष्ट्रीय हित में धन देने एवं सामाजिक कार्य करने की प्रेरणा देने का कार्य किया. 1976 में उनके निधन के उपरान्त भी उनकी यशस्वी प्रेरणा कांकेर जिले में विद्यमान है.

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