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छत्तीसगढ़ में ताहूतदारी पद्धति

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छत्तीसगढ़ में ताहूतदारी पद्धति


छत्तीसगढ़ में ताहूतदारी पद्धति का सूत्रपात केप्टन सेन्डीस (1825-28 ई.) के अधीक्षण काल में हुआ. उन्होंने लोरमी और तरेंगा नामक ताहूतदारी का निर्माण किया. सिरपुर और लवन नामक दो ताहूतदारी का निर्माण मराठा काल (1830-54 ई.) में किया गया तथा डिप्टी कमिश्नर लेफ्टिनेंट सी. इलियट ने अपने काल में तीन नये ताहूतदारियों सिहावा, खल्लारी और संजारी का सृजन किया.

इस व्यवस्था को यहाँ जन्म देने का मूल उद्देश्य क्षेत्र की कुशल और पड़ती भूमि को इन ताहूतदारों के माध्यम से कृषि क्षेत्र में परिवर्तित करना था, जो अपनी राशि का उपयोग कर ऐसा करने हेतु प्रेरित किए जाते थे, किन्तु यह व्यवस्था यहाँ अधिक कारगर सिद्ध न हो सकी, क्योंकि वे न ही गाँव के गोटियों की तरह लोकप्रिय थे और न ही जमींदारों की तरह सक्षम, शेष सभी कर समाप्त कर दिए गए.

राजस्व का भूमि कर के बाद दूसरा महत्वपूर्ण स्रोत सायर व तीसरा स्रोत आबकारी कर था. पंडरी से अपेक्षाकृत कम आय होती थी. राजस्व व्यवस्था में महत्वपूर्ण परिवर्तन नवम्बर 1855 में किया गया, अब करों का भुगतान नकद करना अनिवार्य हो गया. अतः सरकार अब अनाजों का संग्रह नहीं करती थी. अंग्रेजों ने राजस्व वर्ष 1 मई से 30 अप्रैल तक निर्धारित किया. अतः 30 अप्रैल तक चालू वर्ष के सभी हिसाब किताब पूर्ण कर लिए जाते थे, राजस्व विभाग में वर्ष 1856 ई. से नवीन अधिकारी नियुक्त किए गए, जो हैं-रीस्तेदार, नायब श्री रीस्तेदार, मुहाफिज, दफ्तरी, वासील-वाकी नवीस, परगना नवीस, मोहर्रिर और नाजिर आदि. उसी प्रकार कोषागार (खजाना विभाग) में कार्य करने वाले अधिकारी थे खजांची (कशियर), सियानवीस, मोहर्रिर और फोतदार आदि.


राजस्व मामलों से सम्बन्धित समस्याओं के निदान के लिए एक नियमावली थी जिसे ‘दस्तूर उल अमल’ का नाम दिया गया था.
त्रिवीय व्यवस्था (1855-58,1859-61) छत्तीसगढ़ में भू राजस्व की दो त्रिवर्षीय व्यवस्थाएँ लागू की गई, जो 1855 से 1861 तक चली. भू राजस्व निर्धारण का आधार हलों की संख्या थी जिसके आधार पर भू राजस्व का अनुमान लगाया जाता था. भूमि की पैमाइश नहीं की जाती थी. 1861 ई. के पश्चात् यह अनुभव किया गया कि यहाँ भूमि की स्थाई और नियमित व्यवस्था की जाए, ताकि इस सम्बन्ध में विद्यमान सभी जटिलताओं को दूर किया जा सके.

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