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History of medieval chhattisgarh

छत्तीसगढ़ की प्रथम महिला शासिका महारानी प्रफुल्ल कुमारी देवी

प्रफुल्ल कुमारी देवी का राज्याभिषेक सन् 1922 में 12 वर्ष की आयु में हुआ था. उनका विवाह मयूर भंज महाराज के भतीजे प्रफुल्ल चन्द्र भंजदेव के साथ जनवरी 1927 को हुआ. 'द इण्डियन वूमन हुड' नामक एक पत्रिका में महारानी के विषय में उल्लेख है.
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महान भुमकाल विद्रोह (1910 ई.)

महान भुमकाल विद्रोह (1910 ई.) राजा रुद्रप्रतापदेव के कार्यकाल में 1910 का महाविप्लव भूमकाल हुआ. आदिवासियों ने गुन्डाधूर एवं डेंगवरीधुर जैसे शौर्य प्रतिभाओं को ढूंढ़ निकाला. आदिवासी सम्पर्क में जो भी आया उसे छलता ही रहा. सामंत, राजा,
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बस्तर में ब्रिटिश राज (1854-1947 ई.)

बस्तर में ब्रिटिश राज (1854-1947 ई.) डलहौजी की हड़प नीति के तहत् 1854 ई. में नागपुर राज्य रघुजी तृतीय के निःसंतान मृत्यु होने के पश्चात् ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया गया. भोंसला राज्य के 1854 ई. में ब्रिटिश शासन का अंग बन जाने से
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लिंगागिरी विद्रोह (1856-57 ई.)

महान् मुक्ति संग्राम की लपटें: लिंगागिरी विद्रोह (1856-57 ई.) इस नए शासन से न तो राजा भैरमदेव प्रसन्न थे, न उसके दीवान दलगंजनसिंह और न ही यहाँ की आदिवासी जनता. मार्च 1856 ई. के अन्त तक दक्षिण बस्तर में आन्दोलन तीब्र गति पर था. 50
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कोई विद्रोह (1859 ई.)

कोई विद्रोह (1859 ई.) : वन संरक्षण का प्रथम भारतीय उदाहरण 1857 ई. का विद्रोह अभी शान्त भी नहीं हुआ था कि दक्षिण बस्तर के फोतकेल जमींदारी के आदिवासियों ने साल वृक्षों के काटे जाने के खिलाफ विद्रोह कर दिया. जल्दी ही यह आक्रोश दक्षिण बस्तर
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मेरिया विद्रोह (1842-63 ई.)

मेरिया विद्रोह (1842-63 ई.) दन्तेवाड़ा की आदिम जनजातियों ने उन्नीसवीं शताब्दी में आंग्ल मराठा शासन के खिलाफ विद्रोह किया था. यह आत्मरक्षा के निमत्त एवं अपनी धरती पर विदेशियों के घुसपैठ के विरुद्ध एक विद्रोह था. यह उनकी परम्परा और
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तारापुर विद्रोह (1842-54 ई.)

तारापुर विद्रोह (1842-54 ई.) बस्तर के राजा ने नागपुर सरकार के आदेश पर तारापुर परगने की टकोली बढ़ा दी थी, जिसका तारापुर के गवर्नर दलगंजनसिंह ने विरोध किया था. जब दलगंजनसिंह पर नागपुर सरकार का दबाव बढ़ा, तो उन्होंने टकोली बढ़ाकर जनता के
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परलकोट विद्रोह [ Parlakot Revolt (1825)]

परलकोट विद्रोह (1825 ई.)- महिपालदेव के काल में 1825 में परलकोट का विद्रोह हुआ था. 1825 ई. के विद्रोह में परलकोट के जमींदार गेंदसिंह ही विद्रोहीसेना का नेतृत्व कर रहे थे. यह एक प्रकार का ऐसा विद्रोह था, जिसके माध्यम से अबूझमाड़िया ऐसे
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काकतीय राजवंश का इतिहास

अन्नमदेव द्वारा बारसूर में काकतीय वंश की स्थापना के पश्चात् 1936 तक इसकी 20 पीढ़ियों ने 613 वर्षों तक राज किया. सन् 1324 ई. से 1780 ई. तक काकतीय राजाओं ने वस्तर में निष्कंटक राज किया. इनमें से एक राजपाल देव की रानी चंदेलिन के भाई अर्थात्
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बस्तर का इतिहास [History of Bastar]

बस्तर का इतिहास इसके इतिहास के सूत्र पाषाण युग अर्थात् प्रागैतिहासिक काल से मिलते हैं. इन्द्रावती नदी के तट पर स्थित खड़कघाट, कालीपुर, माटेवाड़ा, देउरगाँव, गढ़चन्देला, घाटलोहंगा तथा नारंगी नदी के तट पर अवस्थित गढ़ बोदरा और संगम के आगे
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