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सोनाखान का विद्रोह

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सोनाखान का विद्रोह


मानवता एवं शौर्य के प्रतीक छत्तीसगढ़ के प्रथम शहीद वीर नारायण सिंह

इससे पहले पढ़ें : छत्तीसगढ़ में 1857 क्रान्ति का प्रभाव

सोनाखान जमींदारी-

सोनाखान के जमींदार बिंझवार राजपूत थे. यह जमींदारी क्षेत्र कलचुरियों की बिलासपुर शाखा के अन्तर्गत आती थी, किन्तु वर्तमान में यह रायपुर जिले में आती है. यह जमींदारी (सम्पत्ति) रतनपुर के कलचुरी राजा बाहरसाय (1500 ई.) द्वारा वीरनारायण के पूर्वजों को उनकी सैनिक सेवा के पुरस्कार स्वरूप करमुक्त जागीर के रूप में दी गई थी. इस जमींदारी में बारह गाँव थे. उस समय से मराठा विजय काल (1741 ई.) तक इस जमींदारी पर कोई कर नहीं लगाया गया था, किन्तु बिंबाजी (1758-87 ई.) के काल में सोनाखान पर इमारती लकड़ी और लाख पूर्ति का दायित्व सौंपा गया, जो साठ वर्षों तक चलता रहा, इसके बाद रामराजे (वीरनारायण सिंह के पितामह) की प्रमुखता के कारण उत्पन्न विरोध के फलस्वरूप यह जमींदारी अंग्रेजी आधिपत्य में दे दी गई. इसके बाद पट्टे में कुछ संशोधन किया गया, जिसके तहत् लकड़ी और लाख के भुगतान को जमींदार के निवेदन पर माफ कर दिया गया, क्योंकि जमींदारी के मूल पट्टे में लकड़ी और लाख के भुगतान की शर्ते नहीं थी. इसके साथ ही इस जमींदारी को तीन सौ रुपए का नामनूक भी प्रदान किया गया. उसे खरीद के संरक्षण हेतु नब्बे रुपयों की अतिरिक्त व्यवस्था की गई, जिसमें तीस रुपए उसके स्वयं के लिए एवं साठ रुपए चौकीदारों के लिए थे.

इस तरह सोनाखान की जमींदारी का पट्टा सैनिक शासन के अन्तर्गत था, अतः यहाँ से किसी प्रकार का कर वसूल नहीं होता था. यह जमींदारी अपनी इसी स्थिति के कारण प्रतिष्ठित थी. साथ ही यह जमींदारी इस बिंझवार वंश के पास पिछले तीन सौ छियासठ वर्षों से थी. यद्यपि यहाँ से अंग्रेजों को कोई टकोली प्राप्त नहीं होती थी, पर यहाँ से ₹303 12 आने का राजस्व प्रतिवर्ष प्राप्त होता था. जेनकिंस के विवरण के अनुसार अंग्रेजों के देश में आधिपत्य के साथ ही सोनाखान का जमींदार रामराय अपना विरोध और आक्रोश प्रदर्शित करते हुए उनकी अवहेलना करने लगा था, अतः 1819 ई. में इस पर आक्रमण कर पराजित किया गया तथा कैप्टन मैक्सन ने उसे बंदी बनाया था. उसकी जागीर उसे इसी शर्त पर वापस की गई थी कि भविष्य में वह अनुचित व्यवहार नहीं करेगा. रामराय ने इस शर्त का सम्मानपूर्वक पालन किया. उसके समर्पण के ठीक बाद कुछ खालसा ताल्लुक उसे दे दिया गया, जिसे वह अपने स्वयं व परिवार हेतु उपयोग में ला सके.

1855 ई. में अंग्रेजी शासन के आरम्भ के समय यहाँ के जमींदार रामराजे का पौत्र व रामराय के पुत्र नारायण सिंह थे. इन्होंने पैंतीस वर्ष की आयु में अपने पिता रामराय की मृत्यु बाद 1830 ई. में जमींदारी का कार्यभार ग्रहण किया. अंग्रेज सोनाखान जमींदारी से विशेष रूप से चिढ़ते थे एवं दुराग्रह व ईर्ष्या की भावना रखते थे. 10 जून, 1855 ई. के अपने रिपोर्ट में नवनियुक्त प्रथम डिप्टी कमिश्नर चार्ल्स सी. इलियट ने लिखा है कि “जमींदार के तथाकथित अहंकार एवं क्रूर प्रवृत्ति की सूचना मेरे पास प्रायः पहुँचती रहती थी. उसके इस दुर्व्यवहार का आतंक खरीद और लवन की जमींदारियों और परगनों में भी व्याप्त था.”

अंग्रेजों ने दुराग्रहवश (इलियट ने) सोनाखान के प्रति आर्थिक शोषण और लाभ की ही नीति का अनुगमन किया और जमींदारी को अंग्रेजी कोषालय से कुछ भी नहीं देने का फैसला किया.

सोनाखान का विद्रोह

वीर नारायण सिंह जनहित कार्यों में रुचि रखते थे इसलिए वे अपनी प्रजा में लोकप्रिय थे. दुर्भाग्यवश सन् 1856 ई. में इस क्षेत्र में भीषण अकाल पड़ा, लोग भूखों मरने लगे. लोगों की जान की रक्षा के लिए उन्होंने कसडोल के एक व्यापारी माखन के गोदाम का अनाज (अगस्त 1856 ई. में) अपनी भूखी प्रजा में बाँट दिया. उसने इस कृत्य की सूचना रायपुर के डिप्टी कमिश्नर को दी. जमीदार के इस कृत्य को कानून विरोधी समझा गया. डिप्टी कमिश्नर के अनुसार पहले उसने नारायण को बुलाया, किन्तु आदेश का पालन न होने पर उसने उसकी गिरफ्तारी का वारण्ट जारी किया.

सत्यता यह थी कि वीर नारायण सिंह ने माखन के गोदाम से अन्न निकालकर किसानों में बाँट देने की सूचना स्वयं अंग्रेजी हुकूमत को दे दी थी. वास्तव में जनता की दयनीय स्थिति और शासन की निष्क्रियता वश नारायण सिंह ने ऐसा साहसिक कदम मानवीय दृष्टिकोण से उठाया था, किन्तु तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर ने अपने शासकीय बयान में इस घटना का विवरण तोड़-मरोड़ कर दिया है. उसके अनुसार क्षेत्र के किसानों के लिए बीज की नितांत आवश्यकता को नजर अंदाज करते हुए नारायण सिंह ने माखन नामक व्यापारी के गोदाम में जबरदस्ती घुसकर अनाज बाहर निकाल लिया. डिप्टी कमिश्नर ने स्थिति पर सावधानी या सहानुभूतिपूर्वक विचार नहीं किया. उसने तत्काल रायपुर से कटक तक सभी प्रशासनिक अधिकारियों को नारायण सिंह को गिरफ्तार कर रायपुर लाने का आदेश दिया और जमींदार के मकान (सोनाखान) में पुलिस भेज दी. नारायण सिंह को पकड़ने हेतु एक सैनिक टुकड़ी भेजी, जिसने 24 अक्टूबर, सन् 1856 ई. को सम्बलपुर में काफी कठिनाइयों के बाद बंदी बनाकर रायपुर लाया गया. जमींदार नारायण सिंह पर लूटपाट और डकैती का आरोप लगाकर रायपुर जेल में डाल दिया गया.

वास्तव में नारायण सिंह की राजनीतिक चेतना अंग्रेज अधिकारियों को बरदाश्त नहीं हो रही थी वे उसे एक चुनौती के रूप में देखने लगे थे और यही उसके प्रति अंग्रेजों की ईर्ष्या का मूल कारण बन गई. दूसरा कारण जिससे अंग्रेज इस जमींदारी से चिढ़ते थे वह यह थी कि नारायण सिंह की जमींदारी अंग्रेजी कोष में टकोली नहीं भेजती थी, क्योंकि वह कर मुक्त थी. अतः अंग्रेजों की निगाहों में इस जमींदारी का विशेष दर्जा चुभता था.

वीर नारायण सिंह का जेल से पलायन और अंग्रेजों से युद्ध

इसी समय अंग्रेजों के विरुद्ध सन् 1857 का विद्रोह आरम्भ हो गया. इसका प्रभाव छत्तीसगढ़ में भी पड़ा. विद्रोह की अग्नि रायपुर जेल में भी धधक रही थी. पूरे दस माह चार दिन रहने के बाद नारायण सिंह जेल से भाग निकले. ऐसा कहा जाता है कि वीर नारायण रायपुर स्थित सेना के सहयोग से भाग निकलने में सफल हुए थे. डिप्टी कमिश्नर ने सूचना दी कि 28 अगस्त की सुबह उसे नारायण सिंह और तीन कैदियों को सुरंग बनाकर जेल से भाग निकलने की सूचना मिली. इस घटना की छानबीन की जिम्मेदारी रायपुर में नियुक्त तीसरी टुकड़ी की कमान् को सौंपी. जमींदार की खोज के लिए लेफ्टीनेंट नेपियर के साथ लेफ्टीनेंट स्मिथ सेना सहित निकल पड़े, इसी समय संबलपुर के क्रान्तिकारी सुरेन्द्रसाय जो हजारीबाग जेल में थे, वहाँ से भाग निकले. जेल से छूटने के बाद वीर नारायण सिंह सोनाखान पहुंचे और वहाँ उन्होंने अपने नेतृत्व में 500 सैनिकों की एक सेना तैयार की. इधर स्मिथ सेना सहित सोनाखान के लिए रवाना हो गए.

स्मिथ ने मार्ग में जमींदारों से सहयोग लिया. 29 नवम्बर को वह खरौद से सोनाखान रवाना हुआ, कुछ सेना उसने बिलासपुर छावनी से बुलवायी थी. देवरी का जमींदार रिश्ते में नारायण का चाचा था, पर उसका खानदानी शत्रु था और ऐसे समय में वह स्मिथ का पथ प्रदर्शन (क्षेत्र सम्बन्धी) कर रहा था. 1 दिसम्बर को स्मिथ ने देवरी से सोनाखान प्रस्थान किया. सोनाखान से कुछ ही दूर नाले के समीप वीर नारायण ने स्मिथ की सेना पर आक्रमण कर दिया. घमासान युद्ध हुआ प्रारम्भ में स्मिथ पराजित होता दिखा, पर बाहरी सहायता से स्मिथ ने वीर नारायण को पीछे हटने हेतु विवश किया. स्मिथ को भटगाँव, बिलाईगढ़ और देवरी जमींदारियों से सहयोग प्राप्त हुआ. दोपहर को स्मिथ ने सोनाखान में घुसकर खाली गाँव में आग लगा दी. सोनाखान को किस तरह जलाया गया था, उसका प्रमाण स्मिथ के विवरण से मिलता है, उसने लिखा है-“रात बड़ी उत्तेजनात्मक थी, किन्तु चमकती हुई चाँदनी और आग में धधकते हुए गाँव की रोशनी से हमें काफी लाभ पहुँचा.

2 दिसम्बर को कटंगी की फौज स्मिथ से जा मिली. दोपहर पश्चात् स्मिथ उस पहाड़ी की ओर बढ़ा जहाँ बीर नारायण अपने सेना के साथ तैयार था. स्मिथ की विशाल सेना ने उक्त पहाड़ी को चारों ओर से घेर लिया, दोनों ओर से गोलियाँ चलती रही. अन्त में वीर नारायण गिरफ्तार कर लिए गए और उन्हें पुनः रायपुर जेल में डाल दिया गया. उन पर देशद्रोह का मुकदमा चलाया गया. स्मिथ ने अपने अभियान की रिपोर्ट में वीर नारायण को खतरनाक बताते हुए उस पर किसी प्रकार की दया न करने की गुजारिश डिप्टी कमिश्नर से की. उसने लिखा-उसे क्षमा दान देना सबसे बड़ा अपराध होगा. हमें अपने उन स्वामीभक्त व्यक्तियों की मनः स्थिति का पूर्ण अहसास है, जो हमारी आवश्यकता के क्षणों में हमारे साथ थे तथा उसके आतंक से बहुत भयभीत थे. (9 दिसम्बर, 1857 ई. छत्तीसगढ़ डिविजनल रिकार्ड्स) आगे की कार्यवाही के सम्बन्ध में इलियट ने (10 दिसम्बर, 1857 ई. को) लिखा है-“सोनाखान का तथाकथित जमींदार नारायण सिंह मेरी अदालत के सामने हाजिर किया गया एवं उस पर 1857 ई. के अधिनियम के एक्ट चौदह और सेक्शन सात के अन्तर्गत अभियोग लगाया गया. यह 1857 ई. के ग्यारहवें एक्ट एवं सेक्शन एक के अन्तर्गत आता है, यह मेरे द्वारा मौत की सजा का भागी करार दिया गया. यह सजा आज ही सुबह सामान्य परेड में एकत्रित पूरी सेना के सामने उसे बिना किसी व्यवधान, त्रुटि अथवा अन्य कारणों के निश्चय ही दी गई.”

छत्तीसगढ़ डिविजनल रिकार्ड्स पत्र क्र. 286, दिनांक 10 दिसम्बर, 1857 ई. के अनुसार नारायण सिंह को 10 दिसम्बर, 1857 ई. को फाँसी की सजा दी गई एवं डिप्टी कमिश्नर ने सोनाखान की जमींदारी को खालसा ताल्लुक में बदलने की अनुमति दी. नारायण सिंह को सजा वर्तमान ‘जयस्तम्भ चौक’ में तोप से उड़ाकर दी गई. नारायण सिंह के अपराध और उसके परिणाम की सूचना को जोर-शोर से सम्पूर्ण जिले और आस-पास के क्षेत्रों में प्रचारित किया गया. इस प्रकार सोनाखान के रण केशरी छत्तीसगढ़ माटी के सच्चे सपूत निभीक, स्वाभिमानी, प्रजाप्रिय एवं देशभक्त जमींदार नारायण सिंह 10 दिसम्बर, 1857 को शहीद हुए. वे छत्तीसगढ़ अंचल में स्वतंत्रता संग्राम के प्रथम शहीद थे. उनसे हुए संघर्ष के बारे में स्मिथ ने लिखा है-“नारायण सिंह ने उत्कट शौर्य, साहस एवं उत्साह के साथ हम लोगों का गुरिल्ला पद्धति से मुकाबला किया.”

इस शहादत पर-“म. प्र. में स्वतंत्रता संग्राम आन्दोलन” में उद्धृत है-“अधिकारियों ने एक प्रभावी एवं देशभक्त नेता को मात्र उसके इस अपराध पर कि उसने दुर्भिक्ष के क्षणों में एक व्यापारी के गोदाम को लूटकर अनाज कृषकों में वितरित कर दिया था, उसे अपराधी घोषित कर इस तरह की निर्मम सजा दी, जबकि उसने अपने किए हुए की सूचना निर्भीकतापूर्वक डिप्टी कमिश्नर को स्वयं दे दी थी. यह स्पष्ट है कि उसने यह कार्य अकाल पीड़ित जनता की भलाई हेतु किया और आवश्यकता पड़ने पर व्यापारी को उसके नुकसान की क्षतिपूर्ति भी की जा सकती थी. उसने वस्तुतः एक छोटे स्तर पर बड़ा कार्य किया जो कोई भी सरकार ऐसी परिस्थिति में करती.”

नारायण सिंह की सजा के बाद ब्रिटिश सरकार ने उन सभी लोगों को जिन्होंने नारायण सिंह के विरुद्ध अंग्रेजों की सहायता की थी, लाभ दिया. नारायण सिंह की सम्पत्ति से माखन बनिया को उसकी लूटी हुई सम्पत्ति का मुआवजा तेरह सौ सतत्तर रुपए आठ आने दिया गया. नारायण की गिरफ्तारी से सम्बन्धित सिपाहियों को बीस बीस रुपए और जाँच में अथवा अन्य किसी प्रकार से इस प्रकरण से सम्बन्धित अधिकारी को सौ-सौ रुपए दिए गए.

नारायण सिंह के बाद सोनाखान : गोविंद सिंह और अंग्रेज

वीर नारायण सिंह के बलिदान के पश्चात् उनके पुत्र श्री गोविन्द सिंह को गिरफ्तार कर नागपुर जेल भेज दिया गया, किन्तु सन् 1860 ई. में उसे रिहा कर दिया गया. सोनाखान वापसी पर उसने पाया कि देवरी के जमींदार उसके चाचा महाराज साय ने उसकी जमींदारी पर कब्जा कर लिया है. ऐसा सम्भवतः उसने अंग्रेजों की सहमति पर किया था. सोनाखान की जमींदारी शायद उसे पुरस्कार स्वरूप अंग्रेजों ने वीर नारायण सिंह की गिरफ्तारी में सहयोग के बदले दे दी थी. इसी बीच 31 अक्टूबर, 1857 ई. को सुरेन्द्र साय, जोकि सम्बलपुर के विद्रोही जमींदार थे, हजारीबाग जेल से भाग निकले और पुनः अंग्रेजों से लोहा लेते हुए रायपुर पहुंचे.

विद्रोही गोविंद सिंह ने उनके सहयोग से देवरी के जमींदार पर आक्रमण कर उसके शरीर के टुकड़े कर दिए और उसके विश्वासघात का बदला ले लिया. इसके बाद गोविंद सिंह सुरेन्द्र साय से मिलकर अंग्रेजों के विरुद्ध अभियान पर निकल पड़े. दोनों ने मिलकर रायपुर और बस्तर की सीमा तक अंग्रेजों की नींद हराम कर दी. अंग्रेजों ने इनकी गिरफ्तारी हेतु इनाम घोषित किया. 23 जनवरी, 1864 ई. को सुरेन्द्र साय अचानक घिर गए और उन्हें पकड़ कर उनके साथियों के साथ असीरगढ़ के किले में कैद कर दिया गया. जहाँ उन्हें मृत्युपर्यंत यातनाएँ दी जाती रहीं. गोविंद सिंह ने परिस्थितियों को देखते हुए व अंग्रेजों की ताकत को समझते हुए महसूस किया कि ज्यादा दिनों तक अंग्रेजों से अकेले जूझना सम्भव नहीं है, और सम्भवतः उन्होंने अंग्रेजों से संधि कर ली. अंग्रेजों ने भी विद्रोह शांत होने पर गोविन्द सिंह को छोड़ दिया. सोनाखान की जमींदारी उसे वापस कर दी गई. इसके पश्चात् के काल में सोनाखान की जमींदारी के विषय में और अधिक जानकारी नहीं मिलती.

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