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कलचुरियों की सामाजिक स्थिति [Social status of kalchuris]

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कलचुरियों की सामाजिक स्थिति [Social status of kalchuris]

कलचुरिकालीन छत्तीसगढ़ में नागरिकों का जीवन उच्च कोटि का था. इस समय तक वर्ण व्यवस्था को स्थान प्राप्त हो चुका था, किन्तु वह कठोर नहीं था. उदाहरण कलचुरियों का सामन्त बल्लभराज वैश्य था.

छत्तीसगढ़ के कलचुरि लेखों में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य का उल्लेख मिलता है, किन्तु शूद्र का नहीं. ब्राह्मण वेदाध्ययन व पठन-पाठन के कार्य के साथ साथ राजकार्यों में भी भाग लेते थे. उदाहरण कलचुरि दरबार में पुरुषोत्तम तथा गंगाधर जैसे विद्वान् मंत्री थे. ग्राम दान केवल उन्हीं ब्राह्मणों को दिया जाता था, जो कुल और ज्ञान में श्रेष्ठ होते थे.

ब्राह्मणों की तरह क्षत्रिय भी सम्माननीय थे जो राज्य रक्षा करते और प्रशासन में उच्च पदों पर नियुक्त किये जाते थे. राजा क्षत्रिय होते थे. वैश्य व्यापार व्यवसाय के साथ प्रशासन के उच्च ओहदों पर भी आसीन थे. उदाहरण-रतनपुर नगर का प्रधान श्रेष्ठी वैश्य था. वैश्यों के बाद कायस्थ जाति प्रभावशील था.

छत्तीसगढ़ में कलचुरि प्रशस्ति के लेखक कायस्थ अर्थात् ‘वास्तल्य’ थे. कायस्थ के बाद सूत्रधार जाति का उल्लेख है, जो शिल्पकला में प्रवीण थे. कलचुरि कालीन छत्तीसगढ़ में समाज में स्त्रियों को उच्च स्थान प्राप्त था. वे कामकाज में भाग लेती थीं.

उदाहरण-जाजल्लदेव प्रथम ने अपनी माता के कहने पर वस्तर राजा सोमेश्वर देव को कैद मुक्त कर दिया था, किन्तु इस समय बहुपत्नी तथा सती प्रथा जैसी कुप्रथाएँ भी मौजूद थीं.

सामाजिक सामंजस्य

छत्तीसगढ़ के सामाजिक सामंजस्य का इतिहास कई संस्कृतियों के समन्वय का प्रतिरूप है. इस क्षेत्र में अरण्यक सभ्यता के रूप में आदिवासियों और अर्धनगरीय सभ्यता के रूप में मैदान क्षेत्र में बाहर से आने वाले लोगों की मिली-जुली सभ्यता के दर्शन होते हैं. यहाँ पर रहने वाली विभिन्न जातियों ने अपनी-अपनी संस्कृति का विकास किया तथा जीवन की मूलभूत आवश्यकताएँ इन्हें एक दूसरे के निकट लायीं और उनमें परस्पर विवाह सम्बन्ध व सांस्कृतिक परिवर्तन हुए. यहाँ द्विज एवं अद्विज जातियों का धर्म, संस्कार भाव, विचार व जीवन के प्रति उनका दृष्टिकोण एक है. इन दोनों जातियों का मिश्रण यहाँ इतनी सघनता से हुआ है कि उनका विलगाव करना कठिन है.

अद्विजों ने छत्तीसगढ़ में राजीवलोचन, शिवरीनारायण, खरौद, पाली, आरंग, रायपुर आदि के मन्दिरों का निर्माण किया एवं शैव, शाक्त धर्म व भक्तिवाद, जिनमें कबीर व सतनामी पंथ प्रमुख हैं, का विकास किया. यहाँ की जातियों ने ब्राह्मणों से सम्बन्धित सभी धर्मो, देवी देवताओं को अंगीकार किया व पूज्यनीय माना, जिसके पीछे मूल भावना यह थी कि निम्न जातियाँ सामाजिक मर्यादा प्राप्त करना चाहती थीं. इस तरह यह क्षेत्र आर्य अनार्य संस्कृति का संगम स्थल रहा है. यहाँ का आदिवासी समाज अपने जीवन में आदिम विशेषताओं को सँभाले हुए अपने जीवन की सुरक्षा हेतु प्रकृति और धर्म का सहारा लेता है.

यहाँ पर 43 प्रकार की वन्य जातियाँ पायी जाती हैं, किन्तु गोंड़ यहाँ की सबसे प्रमुख जनजाति है, जो देवता बूढ़ा देव को मानती है. इनका मुख्य कर्म कृषि करना है.

आर्थिक स्थिति

आर्थिक स्थिति कलचुरि काल में छत्तीसगढ़ की आर्थिक स्थिति समृद्ध थी. कृषि, वनोपज, खनिज आय के प्रमुख साधन थे. भू-राजस्व प्रणाली, कर प्रशासन के आर्थिक आधार तथा सिक्कों का प्रचलन व वस्तु विनियम यहाँ के जनजीवन को प्रभावित कर रही थी.

कुटीर उद्योग वाणिज्य कर एवं यातायात के साधनों का विकास भी काल क्रमानुसार होता रहा. इस काल में नगरों की अपेक्षा ग्रामों पर अधिक ध्यान दिया गया, जिससे इनकी संख्या अधिक थी, किन्तु नये नगरों का निर्माण भी हो रहा था, जैसे-रतनपुर, रायपुर, मल्लालपत्तन, बिलासपुर, जांजगीर, विकर्षपुर, तेजल्लपुर आदि. विभिन्न प्रकार के वजन व माप प्रचलित थे.

राजा की आय का मुख्य साधन भूमि कर था. इस तरह प्राप्त कलचुरि लेखों से स्पष्ट होता है कि कलचुरि कालीन छत्तीस गढ़ों’ की आर्थिक स्थिति सम्पन्न व समृद्ध थी. जीवन में संघर्ष का अभाव होने से मानव आलसी हो चला था, क्योंकि जीवन के लिए उपयोगी वस्तुओं की प्रचुरता थी.

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