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शिवाजी की रतनपुर यात्रा [Shivaji’s visit to Ratanpur ]

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शिवाजी की रतनपुर यात्रा

डॉ. आर. जी. शर्मा, बिलासपुर के ग्रन्थ ‘छत्तीसगढ़ के दर्पण’ के अनुसार डॉ. पुरुषोत्तम ज. देवरस का विवरण अंचल के इतिहास को एक नई खोज से परिचित कराता है, डॉ. देवरस के अनुसार शिवाजी जब औरंगजेब की कैद (जयपुर भवन, आगरा) में थे, तब वहाँ से वै छद्म वेश में निकल गये. 13 अगस्त, 1666 को सुबह औरंगजेब के पहरेदारों ने शिवाजी को देखा था. उसके बाद शिवाजी वहाँ छद्म वेश में अपने पुत्र साथ सफलतापूर्वक कैद से मुक्त हो गये.

अपने विवरण के पक्ष प्रमाण स्वरूप उन्होंने, जयराम पिण्डे, 1673 एवं भीमसेन सक्सेना, 1666 (भीमसेन उस समय औरंगबाद में माहसूलदार थे) के उदाहरण दिये हैं. औरंगजेब का इतिहास लिखने वाले खाफीखाँ जो मुगल कालीन इतिहास के लिये प्रामाणिक माने जाते हैं, ने भी यह विवरण मान्य किया है.

शिवाजी के जाने के मार्ग का विवरण देते हुए डॉ. देवरस ने उल्लेख किया है कि आगरा से अपने पुत्र संभाजी को लेकर वे मथुरा पहुंचे, वहाँ संभाजी को दासोजी पंत के यहाँ छोड़ दिया और कृष्णाजी पंत के साथ फतेहपुर के पास यमुना पार किया. दक्षिण जाने के मार्ग पर मुगल सेना उनकी खोज में लगी हुई थी. अतः वे इटावा, कानपुर, इलाहाबाद होते हुए वाराणसी तथा यहाँ से मिर्जापुर होते हुए सरगुजा रियासत के घने जंगलों में पहुंचे.

यहाँ से वे रतनपुर, रायपुर, चन्द्रपुर फिर चिन्नूर, करीमगंज, गुलबर्गा, मंगलबेड़ा होते हुए 22 सितम्बर, 1666 को रायगढ़ पहुंचे और पुनः मुगल अत्याचार के विरुद्ध अभियान आरम्भ कर दिया. इस तरह वे अत्यल्प अवधि के लिये रतनपुर प्रवास पर रहे.

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