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छत्तीसगढ़ में शरभपुरीय वंश [Sharbhapuri Dynasty in Chhattisgarh]

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लगभग 5वीं सदी ईस्वी के अन्त में दक्षिण कोसल में एक नये राजवंश की स्थापना हुई. इसकी राजधानी शरभपुर थी, जिसका नामकरण इस वंश के संस्थापक शरभ के नाम पर हुआ था, इस वंश के अधिकांश ताम्रपत्र शरभपुर से प्रचलित किये गये थे, इसलिये इस राजवंश को शरभपुरीय वंश के नाम से सम्बोधित किया जाता है.

का प्राचीन इतिहास Ancient History of Chhattisgarh छत्तीसगढ़ में शरभपुरीय वंश [Sharbhapuri Dynasty in Chhattisgarh]
छत्तीसगढ़ का प्राचीन इतिहास

भानुगुप्त के एरण स्तम्भ लेख (गुप्त संवत् 191 अथवा 510 ई.) में शरभराज का उल्लेख है, जो सम्भवतः शरभपुरीय वंश का संस्थापक था. शरभपुर की स्थिति अभी तक अन्तिम रूप से तय नहीं हो पाई है. कुछ विद्वानों ने इसे सारनगढ़ से समीकृत किया है, तो कुछ इसे ओडिशा के संबलपुर से जोड़ते हैं.

छत्तीसगढ़ में शरभपुरीय वंश

शरभ क उत्तराधिकारी नरेन्द्र था. इसके तीन ताम्रपत्र प्राप्त हुये है, लेकिन इसके काल के किसी महत्वपूर्ण घटना की जानकारी नहीं मिलती. इसके पश्चात् प्रसन्नमात्र नामक एक शक्तिशाली राजा हुआ. परवर्ती अभिलेखों में वंशावली इसी नरेश से प्रारम्भ की गई है. इसने अपने नाम से प्रसन्नपुर नामक नगर की स्थापना की थी, जो निडिला नदी के किनारे स्थित था. विद्वानों ने इसकी पहचान मल्हार के पास लीलागर नदी से की है. यदि इसे माना जाये, तो प्रसन्नपुर का तादात्म्य मल्हार से स्थापित होता है.

प्रसन्नमात्र ने भारी मात्रा में स्वर्ण तथा रजत् मुद्रायें प्रचलित की थी, जिसमें गरुड़, शंख तथा चक्र अंकित हैं. स्वर्ण सिक्कों के प्रचलन से इसके वैभव का पता लगता है. इसके पश्चात् जयराज, मानमात्र, दुर्गराज, सुदेवराज, प्रवरराज आदि राजा हुये. प्रवरराज प्रथम अत्यन्त महत्वाकांक्षी राजा था, अतः उसने श्रीपुर’ में अपनी राजधानी स्थापित की थी.

इतिहासकार अजय मित्र शास्त्री के अनुसार देवराज का भाई प्रवरराज द्वितीय इस वंश का अन्तिम राजा हुआ, जिसके दो ताम्रपत्र लेख ठाकुरदिया और मल्हार से प्राप्त हुये हैं.

सुदेवराज के महासमुंद और कौआताल अभिलेखों में उल्लेखित सर्वाधिकरणाधिकृत ‘इंद्रबल राज’, उसका सामंत था, जो पाण्डुवंशी शासक शिवतीवरदेव के पितामह के रूप में समीकृत किया जाता है. सुदेवराज की मृत्यु के पश्चात् वह प्रवरराज द्वितीय के काल में अवसर पाकर दक्षिण कोसल के उत्तर-पूर्वी भाग पर आधिपत्य स्थापित करके शरभपुरीय शासन को समाप्त कर स्वयं राजा बन गया और श्रीपुर के पाण्डुवंश की स्थापना की.

शरभपुरीय वंश के संस्थापक

संस्थापक :- शरभराज – शरभपुर आधुनिक सारंगढ़ ( शरभपुरीय वंश का शासनकाल 475 से 590 तक था।) इनका शासन काल ईसा के 6 वीं शताब्दी में था ।

 इस वंश को अमरार्य / अमरज कुल भी कहा जाता था। इस वंश के लेख सम्बलपुर(ओडिशा) से प्राप्त अतः इतिहास कार सम्बलपुर को ही सरभपुर मानते है ।

 उत्तर कालीन गुप्त शासक भानुगुप्त के “एरण स्तंभलेख “ (गुप्त संवत 510 ई.) में शरभराज का उल्लेख मिलता है ।

शरभपुरीय वंश के क्षेत्र :-

उत्तर – पूर्वी क्षेत्र (मल्हार , सारंगढ़ , रायगढ़, संबलपुर ) उप राजधानी :- श्रीपुर( सिरपुर )

शरभपुरीय वंश के मुख्य शासक :–

शरभराज नरेंद्र:- शरभराज का उत्तराधिकारी ।

 इसके तीन ताम्रपत्र प्राप्त हुये है। ये तीन ताम्रपत्र पिपरदुला, कुरुद, रवां स्रोत हैं। उन्हें विष्णु के उपासक के रूप में उल्लेखित किया गया है।

 प्रसन्नमात्र:- सर्वाधिक प्रतापी राजा( विष्णु भक्त ) इसने अपने नाम से प्रसन्नपुर नमक नगर की स्थापना की थी, जो निडिल नदी के किनारे स्थित था जिसका तादात्म्य मल्हार में स्थापित है। प्रसन्नमात्र इकलौता शरभपुरीय राजा है जिसके सोने के सिक्को खोज की गई है। इनमे वह प्रसन्नमात्र के रूप में उल्लेख किया गया है। सिक्के महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ क्षेत्र में उड़ीसा, चंदा में कालाहांडी जैसे विभिन्न क्षेत्रों में पाए जाते हैं। प्रसन्नपुर (मल्हार) की स्थापना किया। गरुण, शंख ,चक्र आदि सिक्के चलाये। 

प्रवरराज प्रथम :- इसने राजधानी शरभपुर से श्रीपुर स्थापित की थी। प्रवरराज प्रथम के दो ताम्रपत्र ठाकुरदिया एवं मल्लार प्राप्त हुये है।

 सुदेव राज:- प्रवरराज प्रथम का उत्तराधिकारी ।इनके सात ताम्रपत्र प्राप्त हुये है जो इस राजवंश में सर्वाधिक है। सात ताम्रपत्र नन्हा , धमतरी, सिरपुर, आरंग, कउवतल, रायपुर, सारंगढ़ हैं।

 प्रवरराज-द्वितीय :-प्रवरराज द्वितीय इस वंश का अंतिम शासक था। 

सुदेवराज के सामंत इंद्रबल ने प्रवरराज-द्वितीय को मारकर पाण्डुवंश की नींव डाली । ( कौवाताल अभिलेख , महासमुंद )

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