1857 की क्रान्ति एवं छत्तीसगढ़

1857 की क्रान्ति एवं छत्तीसगढ़

1757 ई. के प्लासी के युद्ध से बंगाल में एक राजनीतिक सत्ता के रूप में स्थापित अंग्रेज अगले पचास वर्षों में समूचे भारत के एक मात्र और निर्विवाद शक्ति बन गए. यहाँ पैर जमाने के बाद अंग्रेजों ने प्रत्येक क्षेत्र में शोषण की नीति का अवलंबन आरम्भ किया. अंग्रेजों का भारत आगमन ईस्ट इण्डिया कम्पनी के रूप में व्यापार के लिए 17वीं शताब्दी के आरम्भ में हुआ, किन्तु अगले दो सौ वर्षों में भारत उनका एक उपनिवेश बन गया और वे शोषणकारी साम्राज्यवादी नीति पर शासन करने लगे. आर्थिक शोषण, राजनैतिक स्वतंत्रता का हनन, प्रजातिगत भेद भाव, धार्मिक उत्पीड़न आदि उनकी भारतीयों के प्रति नीति के अंग थे.

भारतीय राजाओं का राजनैतिक पतन, उन्हें सत्ताच्युत किया जाना, कृषकों की बदहाली, कारीगर व शिल्पियों के कौशल का विनाश, धार्मिक व सामाजिक मामलों में हस्तक्षेप आदि व धन का बहिर्गमन ऐसे कारण थे जिनके मूल में भारतीय असंतोष पल रहा था, जो 1757 से आरम्भ होकर धीरे धीरे 100 वर्षों में एक भयंकर विप्लब के रूप में फूट पड़ा. इसे भारत के प्रथम स्वतंत्रता समर की संज्ञा दी गई है. यद्यपि यह देश के चुनिंदा हिस्सों में ही हुआ तथापि इसने भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ें हिला दी. अंग्रेजों ने भारत के प्रति अपनी नीति में आमूल-चूल परिवर्तन किए. कम्पनी का शासन खत्म कर दिया गया एवं ब्रिटेन की महारानी भारत की साम्राज्ञी बनी और भारत अब ब्रिटिश संसद के पूर्ण नियंत्रण में आ गया. क्रान्ति कुचल दी गई, निश्चित संगठन के अभाव व सीमित क्षेत्र में ही फैल पाने के कारण यह असफल हुई, पर इसके दूरगामी परिणाम हुए. क्रान्ति के स्वरूप के सम्बन्ध में विद्वानों में गहरा मतभेद है, स्वरूप जो भी रहा हो, किन्तु यह स्वीकार किया जाता है कि ब्रिटिश अधीनता खत्म करने हेतु स्वतंत्रता संघर्ष का सूत्रपात इसी क्रान्ति से हुआ. आरम्भ में यह सैनिक विद्रोह अवश्य था. किन्तु शीघ्र ही विद्रोही स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु लड़ने लगे. यह एक ऐसा आरम्भ था, जिसका अन्त ठीक 90 वर्षों बाद 1947 में भारत की स्वतन्त्रता से हुआ.

क्रान्ति का प्रभाव कुछ चुनिन्दा क्षेत्रों में ही हुआ. अधिकतर जमींदारों व रियासतों ने अंग्रेजों को भरपूर सहयोग दिया. यह उत्तर व मध्य भारत में ही फैल सका उसमें भी समूचा बंगाल व राजस्थान (कोटा व अलवर आदि रियासतों को छोड़कर) इससे पृथक् रहे. दक्षिण व उत्तर पश्चिम इसकी पहुंच से पूर्णतः बाहर रहे. प्रभावशाली भारतीय शिक्षित मध्यम वर्ग इससे दूर रहा. क्रान्ति के संगठन व कुशल केन्द्रीय नेतृत्व की अनुपस्थिति से अंग्रेज बच गए. अन्यथा भारत 90 वर्षों पूर्व ही आजाद हो गया होता. फिर भी इस क्रान्ति ने समस्त जन में राष्ट्रीयता की भावना का संचार किया. इसी भावना से सामाजिक, धार्मिक पुनर्जागरण आरम्भ हुआ जिसने भारत की स्वतंत्रता हेतु राष्ट्रीय आन्दोलन को जन्म दिया. यह क्रान्ति भले ही समूचे देश में न फैल सकी, पर इसका प्रभाव राष्ट्रव्यापी रहा.

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