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छत्तीसगढ़ की राजस्व व्यवस्था

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छत्तीसगढ़ की राजस्व व्यवस्था

रायपुर के डिप्टी कमिश्नर मि. इलियट ने छत्तीसगढ़ की राजस्व व्यवस्था को व्यवस्थित करने के लिए गवर्नर जनरल के निर्देशानुसार ‘तीन वर्षीय राजस्व व्यवस्था लागू की, जो सन् 1855 से 1857 तक के लिए बनी थी. यह क्षेत्र के लिए लाभकारी सिद्ध हुई. सन् 1855 ई. में छत्तीसगढ़ को रायपुर या छत्तीसगढ़ जिला कहा जाने लगा जिसमें तीन तहसील थे, जिनके अंतर्गत अनेक परगने थे. परगनों को पुनर्गठित कर उनकी संख्या बारह की गई जो पूर्व में नौ या दस थी. परगनों में गाँवों की संख्या निर्धारित की गई, साथ ही कई गाँव सम्मिलित कर रेवेन्यू सर्कल बनाया गया. गाँवों में पटवारियों की नियुक्ति कर उन्हें हल्कों के अनुसार अलग अलग कार्यक्षेत्र सौंपे गए. अब परगना अधिकारी नायब तहसीलदार कहलाने लगा. पुनर्गठन में तीन पुराने परगनों राजरो, लवन और खल्लारी के स्थान पर चार नए परगने गुलू, सिमगा, मारो और बीजापुर का निर्माण किया गया.
राजस्व की दृष्टि से सम्पूर्ण क्षेत्र को तीन भागों में विभक्त किया गया-

(1) खालसा क्षेत्र,

(2)जमींदारी क्षेत्र,

(3) ताहूतदारी

सिद्धान्त रूप में सरकार सम्पूर्ण भूमि की स्वामी थी. आय का मुख्य स्रोत भूमि कर था. यह गाँव का प्रमुख मालगुजार होता था जो सम्बन्धित जमीन के जमींदार को मालगुजारी देता था और जमींदार अपने सम्पूर्ण जमींदारी के लिए निर्धारित भू- राजस्व सरकार को अदा करता था. खालसा क्षेत्र के किसान गोटियों के माध्यम से सीधे सरकार को भूमि कर अदा करते थे.
ताहूतदारी क्षेत्र से राजस्व अदायगी ताहूतदारों द्वारा निर्धारित दर पर की जाती थी. 1854 ई. के पूर्व छत्तीसगढ़ में आय के प्रमुख सात मद प्रचलित थे. उनके नाम थे भू-राजस्व, आबकारी, कलाली, टकोली, पंसारी सेवाय और दीगर सेवाय. परन्तु 1 जून, 1856 ई. से सम्पूर्ण आय को चार मदों में बाँटा गया-
(I) भू राजस्व,

(2) आबकारी (मादक द्रवों की विक्री कर),

(3) सायर (चुंगी कर),

(4) पंडरी (गैर किसानों पर विशेष कर).

आगे पढ़ें : छत्तीसगढ़ में ताहूतदारी पद्धति

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