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कलचुरियों के धार्मिक स्थिति [Religious status of kalchuris]

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कलचुरियों के धार्मिक स्थिति [Religious status of kalchuris]

छत्तीसगढ़ के कलचुरि धर्मनिरपेक्ष शासक थे. इन्होंने अपने राजत्वकाल में शैव, वैष्णव, जैन एवं बौद्ध धर्मों को संरक्षण ही नहीं दिया, अपितु उन्हें पल्लवित-पुष्पित भी किया. वे स्वयं शैवोपासक थे, किन्तु उनके राज्यकाल में वैष्णव मन्दिर, जांजगीर का विष्णु मन्दिर, खल्वाटिका का नारायण मन्दिर, रतनपुर में प्राप्त लक्ष्मीनारायण की मूर्ति, शिवरीनारायण का विष्णु मन्दिर आदि का निर्माण हुआ.

शिव, विष्णु के अलावा पार्वती, एकवीरा, गणपति रेवन्त देवालय भी रतनपुर बड़द, दुर्ग, पट्टपक, विकर्णपुर आदि स्थानों में बनाये गए. शक्ति पूजा के अन्तर्गत दुर्गा, महामाया, महिषासुरमर्दिनी, भी मन्दिर बनाये गए. वैसे जैन धर्म के सम्बन्ध में कलचुरि कालीन छत्तीसगढ़ में जानकारी नहीं मिलती, किन्तु आरंग, सिरपुर, मल्लार, धनपुर, रतनपुर आदि में प्राप्त मध्ययुगीन जैन तीर्थंकरों की मूर्तियाँ इस काल में जैन धर्म के प्रसार को स्पष्ट करती हैं.

छठवीं शताब्दी में बौद्ध धर्म छत्तीसगढ़ में स्थापित था. राजधानी सिरपुर इसका केन्द्र था, किन्तु कलचुरि काल में इसके पतन के आसार दिखने लगे थे. इसी काल में राजिम के समीप चम्पारण्य नामक स्थान पर 1593 ई. के आस पास महाप्रभु वल्लभाचार्य का जन्म हुआ. वे ‘शुद्धाद्वैतवाद’ अथवा पुष्टिमार्ग के संस्थापक थे.

रामानन्द ने वैष्णव भक्ति को दक्षिण से उत्तर लाया, जिसका प्रभाव छत्तीसगढ़ में भी हुआ और वहाँ रामानंदी मठों की स्थापना हुई. इसी परम्परा के अन्तर्गत कालान्तर में रायपुर का दुधाधारी मठ स्थापित हुआ. इस तरह यहाँ शैव धर्म के साथ वैष्णव धर्म भी प्रभावी रूप से विद्यमान रहा. इनके साथ अन्य धर्म भी स्वतन्त्र रूप से पल्लवित होते रहे.

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