सम्बलपुर के सुरेन्द्र साय का विद्रोह

सम्बलपुर के सुरेन्द्र साय का विद्रोह

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सन् 1827 ई. में सम्बलपुर के चौहान राजा महाराजसाय की मृत्यु बिना उत्तराधिकारी के हो गई. चौहानवंश की परम्परा के अनुसार सम्बलपुर की राजगद्दी पर उनकी राजपुर-खिंडा शाखा के सुरेन्द्र साय का अधिकार बनता था, किन्तु अंग्रेज अधिकारियों ने उनके वैध अधिकार को अस्वीकार करते हुए पहले महाराजसाय की विधवा रानी मोहनकुमारी को गद्दी पर बैठा दिया, किन्तु जन असंतोष को देखते हुए वरपाली के चौहान जमींदार परिवार के अपने पिटू राजकुमार नारायणसिंह को अवैध रूप से सम्बलपुर की गद्दी पर बैठा दिया.

राजपुर-खिडा के चौहान परिवार ने इसका विरोध किया. सुरेन्द्र साय छः भाइयों, उनके चाचा बलरामसिंह तथा अनेक जमींदारों ने विद्रोह का प्रारम्भ किया. इसी बीच सुरेन्द्र साव के समर्थक लखनपुर जमींदारी के बलभद्रदेव की नारायणसिंह की एक सिपाही ने हत्या कर दी. इसका बदला लेने के लिए सुरेन्द्रसाय ने रामपुर के किले पर आक्रमण कर यहाँ के जमींदार दुर्जयसिंह की, जो सम्बलपुर के राजा का वफादार था, हत्या कर दी. इस अपराध में सुरेन्द्र साय उसके भाई उदन्त साय और चाचा बलराम सिंह को आजीवन कारावास की सजा देकर हजारीबाग जेल में भेज दिया.

इस बीच अंग्रेजों के अत्याचार से असंतुष्ट जमींदारों एवं प्रजा ने सुरेन्द्र साय के नेतृत्व में संघर्ष करने का निश्चय किया. अंततः 31 अक्टूबर, 1857 को सुरेन्द्र साय जेल से भागने में सफल हुए. सुरेन्द्र साय और उनके परिवारजनों ने अंग्रेजों से लगातार संघर्ष किया. सम्बलपुर क्षेत्र, जो उस समय छत्तीसगढ़ का एक जिला था, आज भी सुरेन्द्र साय की कथाओं से गुंजित है.

सुरेन्द्र साय को अन्त में 23 जनवरी, 1964 को उसके भाइयों तथा साथियों सहित गिरफ्तार कर लिया गया. छत्तीसगढ़ के कमिश्नर ने उन्हें आजन्म कारावास दिया. इस निर्णय को तत्कालीन ज्यूडिशियल कमिश्नर कम्पबेल ने यह कहकर निरस्त कर दिया कि सुरेन्द्र साय के विरुद्ध आरोप सिद्ध नहीं होते, फिर भी ब्रिटिश अधिकारियों ने 1818 के तीसरे रेग्यूलेशन के तहत् इन्हें कैद कर असीरगढ़ जेल भेज दिया, जहाँ 28 फरवरी, 1884 ई. में लगभग 90 वर्ष की आयु में सुरेन्द्र साय की मृत्यु हो गई. इस प्रकार प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का एक और सितारा डूब गया.

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