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छत्तीसगढ़ में सार्वजनिक कल्याण व स्थानीय संस्थाएँ

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छत्तीसगढ़ में सार्वजनिक कल्याण व स्थानीय संस्थाएँ

छत्तीसगढ़ में सार्वजनिक कल्याण

1854-55 ई. में जन सुविधा एवं उसके कल्याण हेतु ब्रिटिश शासन ने यहाँ सत्ता सम्हालते ही सार्वजनिक कल्याण विभाग की स्थापना की. इस विभाग द्वारा सड़क, पुल, नहर, भवन आदि के निर्माण का कार्य यहाँ आरम्भ किया गया. विभाग का सर्वोच्च अधिकारी संभागीय स्तर पर चीफ इंजीनियर होता था तथा जिले का प्रमुख अधिकारी एक्जीक्यूटिव होता था, जो क्रमशः राजधानी रायपुर एवं जिला मुख्यालयों में पदस्थ होते थे. इनके अधीन अधीक्षण यंत्री, सहायकयंत्री, उपयंत्री आदि अमले पदस्थ होते थे, जो विभाग के निर्देशन में आवश्यकतानुसार निर्माण कार्य करते थे.

अंचल के नवनिर्माण में इस विभाग का महत्वपूर्ण योगदान था. इसने यहाँ स्थापत्य की अंग्रेजी शैली में भवनों का निर्माण किया. इस विभाग के कार्यों की गुणवत्ता उस काल के भवनों, सेतुओं को देखकर पता लगता है जो आज भी सुरक्षित विद्यमान है.

छत्तीसगढ़ में स्थानीय संस्थाएँ

लाई रिपन (1880-84 ई.) ब्रिटिश प्रशासकों में सबसे उदार एवं जनहितैषी व्यक्ति थे. ब्रिटिश काल में स्थानीय स्वशासन का आरम्भ उन्हीं के द्वारा किया गया. इसके अन्तर्गत नगर जिला स्तरों में स्थानीय निकायें गठित की गयीं जिसमें सीमित क्षेत्रों में इन निकायों को अधिकार सौंपे गए. इसके लिए 1885 ई. में जिला परिषदों का गठन जिला स्तर पर तथा बड़े शहरों में नगर पालिकाओं का गठन किया गया. इसके तहत् दोनों स्थानीय संस्थाएँ क्रमशः ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में प्राथमिक शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रकाश, सड़क आदि कार्यों की देखभाल करती थीं.

छोटे स्थानों में ‘नोटीफाइड एरिया’ का गठन किया गया. इसी तरह सहकारी बैंक का भी गठन किया गया, जिसका कार्य कम ब्याज पर किसानों को ऋण उपलब्ध कराना था. अधिकारीगण व्यवस्था और निरीक्षण की दृष्टि से दौरा किया करते थे. रायपुर एवं बिलासपुर में जिला परिषद् का गठन किया गया. साथ ही रायपुर, बिलासपुर में नगर पालिकाएँ भी बनी. जिला परिषदों द्वारा ग्रामीण शालाओं का प्रबन्ध एवं स्वास्थ्य आदि विषय जिला परिषदों द्वारा देखे जाते थे.

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