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पं. रविशंकर शुक्ल [Pt. Ravi Shankar Shukla]

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पं. रविशंकर शुक्ल [Pt. Ravi Shankar Shukla]

पण्डित शुक्ल का जन्म 2 अगस्त 1877 ई. को सागर में हुआ था. सन् 1885 ई. में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा पास की. बी. ए. की परीक्षा पास करने के बाद उन्होंने शिक्षण कार्य आरम्भ किया. बाद में उन्होंने एल एल.बी. की परीक्षा पास की. तत्पश्चात् वे राजनीति में रुचि लेने लगे. वे आरम्भ में तिलक के उग्रवादी विचारों से प्रभावित हुए. असहयोग आंदोलन के दौरान सक्रिय भाग लेकर उन्होंने विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करवाया. वकालत का त्याग किया. सन् 1921 ई. में राष्ट्रीय-विद्यालय की स्थापना करवायी. सन् 1921 ई. में रायपुर जिला परिषद् के सदस्य व 1923 में अध्यक्ष बन गये और इसके माध्यम से जन-जागरण का कार्य करते रहे. वे ब्रिटिश-शासन के विरोधी और कठोर आलोचक थे.

पं. रविशंकर शुक्ल
पं. रविशंकर शुक्ल

इस क्षेत्र की जनता में स्वतंत्रता की भावना को जाग्रत करने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया. वे कौमी- एकता के प्रबल समर्थक थे. वे सन् 1992 ई. में अखिल भारतीय कांग्रेस के रायपुर जिला राजनीतिक परिषद् के स्वागत समिति के अध्यक्ष बनाये गये. स्थानीय अधिकारियों के उक्त अधिवेशन में प्रवेश पाने हेतु कुछ निःशुल्क प्रवेश-पत्रों की माँग को शुक्ल जी ने ठुकरा दिया. फलस्वरूप उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया, किन्तु जनरोष को देखते हुए अंततः उन्हें रिहा कर दिया गया. यह शासन के खिलाफ जनता की विजय थी.

सन् 1922 ई. में शासन की नीति के अनुसार ग्रामीणशालाओं का प्रबन्ध जिला कौंसिलों को सौंपा गया. वे रायपुर कौसिल के सदस्य चुने गये. उन्होंने रायपुर जिले में अनेक शालाओं की स्थापना कर वहाँ शिक्षकों की नियुक्ति की. उन्होंने शिक्षकों को सरकार विरोधी कार्य करने के लिये प्रोत्साहित किया. सन् 1923 ई. में नागपुर में आयोजित झण्डा सत्याग्रह में उन्होंने छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व किया.

6 अप्रैल, 1930 ई. को गांधीजी द्वारा सविनय अवज्ञा आन्दोलन का शंखनाद किया गया. रायपुर में इस आन्दोलन को पं. शुक्ल ने आरम्भ किया. उन्होंने शराब की दुकानों पर पिकेटिंग और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करवाया. इस आंदोलन के दौरान भी वे गिरफ्तार किये गये,

4 जनवरी, 1932 ई. को गांधीजी ने दूसरी बार सविनय अवज्ञा आन्दोलन आरम्भ किया. जिला कांग्रेस समिति ने पं. शुक्ल को इस आन्दोलन का डिक्टेटर नियुक्त किया. इस दायित्व के निर्वाह हेतु उन्होंने पूरे क्षेत्र का दौरा किया. 29 जनवरी, 1932 ई. को उन्होंने ‘पेशावर दिवस’ मनाया जिसके कारण उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और उनकी सनद भी छीन ली गयी.

सन् 1937 ई. में प्रान्तीय विधान सभा का निर्वाचन हुआ, जिसमें कांग्रेस को बहुमत मिला. 4 जुलाई, 1937 ई. को श्री खरे ने कांग्रेस के प्रथम मंत्रिमण्डल का गठन किया था. इसमें पं. शुक्ल को शिक्षामंत्री के रूप में शामिल किया गया. शिक्षा-मंत्री के पद पर रहकर उन्होंने ‘विधा-मंदिर’ की योजना प्रारम्भ की. कुछ समय पश्चात् वे मुख्यमंत्री बने, किन्तु कांग्रेस की नीति अनुसार उनके मंत्रिमण्डल ने त्यागपत्र दे दिया. वे भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान गिरफ्तार कर लिए गए.

27 अप्रैल, 1946 को पं. रविशंकर शुक्ल ने दूसरी बार मध्यप्रांत एवं बरार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. वे इस पद में 1947 से 1956 ई. तक रहे. इस पद पर रहकर उन्होंने छत्तीसगढ़ क्षेत्र के विकास के लिये अनेक मौलिक योजनाएँ तैयार कर उन्हें क्रियान्वित किया. उनमें आन्दोलनात्मक और रचनात्मक प्रतिभा विद्यमान थी. इस क्षेत्र में शिक्षा के विस्तार के लिए उनके द्वारा किया गया प्रयास प्रशंसनीय है. 1 नवम्बर, 1956 को नया मध्य प्रदेश बना. पं. रविशंकर शुक्ल इस नये राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री बने, परन्तु 31 दिसम्बर, 1956 ई. को उनकी मृत्यु हो गयी.

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