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छत्तीसगढ़ में पुलिस व्यवस्था

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छत्तीसगढ़ में पुलिस व्यवस्था

मराठा काल में छत्तीसगढ़ में पुलिस व्यवस्था का कोई विशेष प्रवन्ध न था. 1855 ई. में यहाँ केवल 149 कर्मचारी कार्यरत् थे जिनका वितरण भी यहाँ असमान था. सितम्बर 1856 में नई व्यवस्था लागू की गई जिससे यहाँ के पुलिस बल में पाँच गुना वृद्धि हुई. पुलिस प्रशासन की दृष्टि से सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ को चार भागों में बाँटा गया जो निम्नानुसार था-

  1. रायपुर सदर,
  2. रायपुर तहसीलदारी क्षेत्र,
  3. धमतरी तहसीलदारी क्षेत्र एवं
  4. रतनपुर तहसीलदारी क्षेत्र.

प्रत्येक तहसीलदारी क्षेत्र के अन्तर्गत 15 पुलिस थानों का निर्माण किया गया. पुनः 1 फरवरी, 1857 ई. में तहसीलों के पुनर्गठन के साथ पुलिस व्यवस्था को भी पुनर्गठित कर सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ को पाँच भागों में विभक्त किया गया जो रायपुर, धमतरी, धमधा, नवागढ़ और रतनपुर आदि तहसीली क्षेत्र थे. जनवरी सन् 1858 ई. में यहाँ पुलिस मेनुअल लागू किया गया जिसमें पुलिस के कर्त्तव्य एवं अनुशासन का विस्तृत व्यौरा था. रायपुर से बिलासपुर के बीच सड़क सुरक्षा हेतु पुलिस थानों का गठन किया गया.
पुलिस की आवश्यकता की सभी चीजें सरकार के द्वारा दी जाने लगी. जमींदारी क्षेत्रों में पुलिस व्यवस्था जमींदारों द्वारा की जाती थी. 1862 ई. में छत्तीसगढ़ के लिए नवीन पुलिस व्यवस्था लागू की गई जिसमें जिला पुलिस अधीक्षक जिले का प्रमुख पुलिस अधिकारी होता था, साथ ही सहायक जिला पुलिस अधीक्षक (प्रथम एवं द्वितीय श्रेणी के) निरीक्षक (तृतीय, चतुर्थ एवं छठी श्रेणी के) मुख्य आरक्षक, प्रधान आरक्षक, आरक्षक आदि पदों का सृजन किया गया. न्याय प्रणाली को सफल बनाने की दृष्टि से पुलिस विभाग को चौकस और व्यवस्थित किया गया. जनता के जान माल की रक्षा के लिए पुलिस एक संवैधानिक शक्ति के रूप में जनसुरक्षा का कार्य करने लगी. अपराधियों को पकड़ने और उन्हें न्यायालय के समक्ष पेश करने तक ही पुलिस का काम होता था. इस प्रकार व्यवस्थित न्याय प्रणाली की स्थापना में पुलिस की महत्वपूर्ण भूमिका थी.


जेल व्यवस्था मराठा काल में अपराधियों के लिए कारागार की कोई व्यवस्था नहीं थी. ब्रिटिश शासन (1854 ई.) से पूर्व रायपुर का जेल एक छोटे से मकान में स्थित था जिसमें 200 कैदियों के रहने की व्यवस्था थी. कैदियों के स्वास्थ्य, भोजन, कपड़ों आदि पर विशेष ध्यान नहीं दिया जाता था. ऐसी स्थिति में जेल प्रबन्ध में सुधार हेतु नवीन ब्रिटिश शासन ने नई व्यवस्था लागू की. मार्च 1858 ई. तक कैदियों को पृथक् राशन दिया जाता था, किन्तु अप्रैल 1858 से कैदियों के लिए जेल में मेस की व्यवस्था की गई. इससे प्रति कैदी भोजन व्यय में लगभग 25% कमी आयी तथा भोजन की गुणवत्ता में वृद्धि हुई.
कैदियों के स्वास्थ्य परीक्षण हेतु एक स्थानीय डॉक्टर की व्यवस्था की गई. एक वर्ष से अधिक सजा वाले कैदियों को सीधे नागपुर कारागार में भेजा जाने लगा. कैदियों को वागवानी व अन्य प्रकार की व्यवहारिक शिक्षा देने की व्यवस्था की गई.जेल के अनुशासन में वृद्धि हुई. कैदियों को वर्दी दी जाती थी जो अपराधों के अनुसार अलग-अलग रंग के होते थे. जेल की साफ- सफाई पर विशेष ध्यान दिया जाने लगा. कैदियों की बढ़ती संख्या को देखते हुए रायपुर जेल भवन का समयानुकूल विस्तार भी किया जाता रहा. डिप्टी कमिश्नर जेल की व्यवस्था का निरीक्षण करते थे.

रायपुर में एक केन्द्रीय जेल के निर्माण की व्यवस्था की गई. कैदियों को अलग-अलग कमरे में रखने की व्यवस्था नहीं थी. जेल में अच्छे आचरण के लिए कैदियों की सजा में कमी करने की प्रथा का सूत्रपात अभी नहीं हो पाया था. जिला मुख्यालयों में लाक-अप बनाने की व्यवस्था की गई. 1862 ई. में जेल में एक सिविल सर्जन की नियुक्ति की गई. इन सुधारों से जेल के रख-रखाव और कैदियों के रहन-सहन के स्तर में सुधार आया. जेल की स्थायी सुरक्षा के लिए सिपाहियों का प्रबन्ध किया गया.

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