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छत्तीसगढ़ में मराठा शासन

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बस्तर में मराठाराज (1778-1853 ई.)

मराठे अपने सर्वोत्तम प्रयास के उपरान्त भी बस्तर को पराभूत नहीं कर सके. मराठा सेना का बस्तर की सेना ने सन् 1750 ई. में टुकड़े-टुकड़े कर डाले थे, किन्तु 1779 ई. में दलपतदेव के पुत्र तथा उत्तराधिकारी दरियावदेव को महान् ‘हल्बा क्रान्ति’ के विरुद्ध मराठों से सहायता माँगनी पड़ी और उसे नागपुर के भोसला राजा को वार्षिक ₹ 4000 से ₹ 5000 तक की अल्प राशि देने के लिये आबद्ध होना पड़ा. महान् हल्बा क्रान्ति 1774-79 ई. में सैनिक सहायता की प्राप्ति के कारण दरियावदेव मराठों का राजनिष्ठ बन गया.

कोटपाड़ सन्धि (6 अप्रैल, 1778 ई.)

बस्तर में आंग्ल-मराठाराज (1819-53 ई.)

मराठा अभिलेखों में बस्तर का वर्णन जमींदारी या सूबा या छत्तीसगढ़ के एक प्रान्त के रूप में किया गया है, जिस पर भोंसलों का शासन था, किन्तु वास्तव में बस्तर के राजाओं ने मराठों की प्रभुत्ता कभी स्वीकार नहीं की. बस्तर राज्य 1777 ई. तक अक्षुण्य बना रहा, किन्तु मराठों और उनके साथियों के लूटमार वाले दृष्टिकोण के कारण वह बाद के वर्षों में क्रमशः सिकुड़ता गया.

फिर भी 1818 ई. तक वह मराठों के सामने झुका नहीं, 1818 ई. में आंग्ल मराठा सन्धि हो जाने के कारण नए अनुबन्धों के अधीन बस्तर की शक्ति सीमित कर दी गई थी. ये अनुबन्ध नए जमींदारों के साथ किए गये थे. यद्यपि बस्तर सिद्धांततः उक्त अवधि में मराठा अधीनता में रहा, तथापि मराठा साम्राज्य में ब्रिटिश नियन्त्रण 1818-30 ई. एवं उसके बाद भी 1854 ई. में मराठा साम्राज्य के ब्रिटिश प्रभुसत्ता में आने तक बस्तर में सम्मिलित रूप से मराठों एवं अंग्रेजों का प्रभाव रहा.

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