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कृष्णमार्गी शाखा के महान् सन्त महाप्रभु वल्लभाचार्य

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महाप्रभु वल्लभाचार्य

वल्लभाचार्य वैष्णवधर्म के कृष्णमार्गी शाखा के दूसरे महान् सन्त थे. इनका जन्म 1479 ई. में चंपारण्य (जिला रायपुर) में उस समय हुआ था, जब इनके पिता तेलंग ब्राह्मण लक्ष्मणभट्ट तेलंगाना से अपने परिवार के साथ काशी की तीर्थयात्रा पर जा रहे थे. ये उनके दूसरे पुत्र थे. चंपारण्य को महाप्रभु की 84 बैठकों में से एक महत्वपूर्ण बैठक माना जाता है. इसीलिये इन्हें महाप्रभु कहा जाता है. इन्होंने संपूर्ण देश की यात्रा की तथा अन्ततः वृन्दावन में स्थायी रूप से निवास करने लगे, जहाँ से इन्होंने कृष्णभक्ति का उपदेश दिया. ये श्रीनाथ जी के नाम से भगवान् कृष्ण की पूजा करते थे. कबीर और नानक की तरह इन्होंने विवाहित जीवन को आध्यात्मिक उन्नति के लिए बाधक नहीं माना. ये संस्कृत और ब्रजभाषा में अनेक पाण्डित्यपूर्ण कृतियों के लेखक हैं.

महाप्रभु वल्लभाचार्य
महाप्रभु वल्लभाचार्य

वल्लभाचार्य 13वीं शताब्दी के महान् संत विष्णु स्वामी के दर्शन शुद्धाद्वैतवाद के अनुगामी थे. इनका दर्शन एक वैयक्तिक तथा प्रेममयी ईश्वर की अवधारणा पर केन्द्रित है, वे पुष्टि (कृपा) और भक्ति (निष्ठा) के पथ पर विश्वास करते थे. उनके इसी दर्शन को पुष्टि मार्ग कहा गया है. इन्होंने श्रीकृष्ण को सर्वोच्च ब्रह्म, पुरुषोत्तम और परमानंद के रूप में देखा.

इनके अनुसार व्यक्ति केवल अकेले ही ईश्वर की अनुभूति कर सकता है जिसके लिये व्यक्ति को भक्ति का अभ्यास करना पड़ता है. पुष्टिमार्ग की अभिव्यक्ति में मार्ग शब्द का तात्पर्य पथ या पंथ है और पुष्टि का अर्थ ईश्वर की कृपा या अनुभव है. इसके द्वारा मुक्ति प्राप्त की जा सकती है. इनके अनुसार भक्ति बिना किसी उद्देश्य या बिना किसी फल की इच्छावश की जानी चाहिये. इनके द्वारा ‘रूद्र संप्रदाय’ की स्थापना की गयी.

चंपारण्य छत्तीसगढ़ का महत्वपूर्ण वैष्णव तीर्थस्थल है. प्रतिवर्ष यहाँ माघ पूर्णिमा के अवसर पर विशाल मेला लगता है.

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