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कोई विद्रोह (1859 ई.)

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कोई विद्रोह (1859 ई.) : वन संरक्षण का प्रथम भारतीय उदाहरण

1857 ई. का विद्रोह अभी शान्त भी नहीं हुआ था कि दक्षिण बस्तर के फोतकेल जमींदारी के आदिवासियों ने साल वृक्षों के काटे जाने के खिलाफ विद्रोह कर दिया. जल्दी ही यह आक्रोश दक्षिण बस्तर की सभी जमींदारियों में फैल गया. इन जमींदारियों में रहने वाले आदिवासियों को उस समय ‘कोई’ कहा जाता था, जिन्हें आज ‘दोर्ला’ तथा ‘दण्डामी माड़िया’ कहा जाता है.

बस्तर के ‘कोई’ लोगों में असन्तोष के भड़कने का मूल कारण यह था कि ब्रिटिश सरकार ने यहाँ के जंगलों का ठेका हैदराबाद के व्यापारियों को दे दिया था. 1859 के विद्रोह के अनेक कारणों में से एक कारण ठेकेदार की निष्ठुरता भी थी. ठेकेदार मालिक मकबूजा के काटे गए सागौन के वृक्षों का मूल्य भी नहीं चुकाता था. ब्रिटिश सरकार उसके विरुद्ध किसी भी प्रकार की शिकायत को नहीं सुनना चाहती थी.

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