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रतनपुर के कलचुरि वंश [Kalachuri Dynasty of Ratanpur]

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रतनपुर के कलचुरि वंश [Kalachuri Dynasty of Ratanpur]

बिलहरी (जबलपुर) अभिलेख से ज्ञात होता है कि कोकल्लदेव प्रथम के पुत्र शंकरगण द्वितीय ‘मुग्धतुंग’ ने लगभग 900 ई. में कोसल राजा को पराजित कर कोसल का प्रदेश छीन लिया था. इसके पश्चात् 950 ई. के आस-पास सोमवंशियों ने पुनः कोसल क्षेत्र पर अधिकार कर लिया. तब त्रिपुरी के लक्ष्मणराज ने सेना भेजकर कोसल पर भयानक आक्रमण किया और क्षेत्र को पुनः विजित कर लिया.

कल्चुरी वंश (1000 -1740 )-

कल्चुरी वंश के संस्थापक कलिंग राज को माना जाता है। कल्चुरी वंश ने पुरे भारत में 550 से 1741 तक किसी न किसी जगह राज किये थे। चंदनबरदायी के ‘पृथ्वीराज रासो’ में इनका वर्णन मिलता है।

पुरे भारत में किसी एक वंश द्वारा, यह सबसे लम्बी शासन करने वाला वंश है। छत्तीसगढ़ में इनकी शुरुवात त्रिपुरी (जबलपुर) के कलचुरियो के वंश के द्वारा हुआ था। उस समय त्रिपुरी के कल्चुरी वंश के संस्थापक वामनराज देव था, तथा स्थायी रूप से शासन चलाने के श्रेय कोकल्ल देव को जाता है।

प्रमुख शासक

कलिंगराज (1000-1020 ईस्वी )

कलचुरियों की वास्तविक सत्ता लगभग 1000 ई. में कलिंगराज द्वारा तुम्मान में राजधानी बनाकर स्थापित की गई. इसने 1020 ई. तक शासन किया.

  • कलिंग राज लक्ष्मणराज के पुत्र थे। लक्ष्मणराज उस समय के त्रिपुरी के शासक थे।
  • कलिंग ने तुम्माण को अपनी राजधानी बनायीं। जो की आज के समय में कोरबा शहर के नाम से जाना जाता है।
  • चैतुरगढ़ के महामाया मदिर का निर्माण कलिंग राज ने ही करवाया था।

कमल राज ( 1020 – 1045 )

कमलराज (1020-45 ई.) कलिंगराज का उत्तराधिकारी उसका पुत्र कमलराज लगभग 1020 ई. में राजा हुआ. त्रिपुरी के राजा गांगेयदेव द्वारा ओडिशा पर आक्रमण के अवसर पर कमलराज ने उसकी सहायता की थी. रत्नदेव अथवा रत्नराज प्रथम (1045-65 ई.)-कमलराज का उत्तराधिकारी रत्नदेव प्रथम हुआ. इसका विवाह कोमोमण्डलके अधिपति वज्जूक या वजूवर्मा की पुत्री नोनल्ना से हुआ था. सम्भवतः इस सम्बन्ध के कारण कलचुरियों की स्थिति मजबूत हो गई.

कमल राज के बारे में इतिहास  से ज्यादा कुछ प्रभावित करने वाली बाते प्राप्त नहीं हुई है परन्तु इसने उत्त्कल से वापस आते हुए साहिल नाम का एक व्यक्ति अपने साथ लाया था जिन्होंने इसके राज्य के विस्तार में इनकी बहुत मदद की।

राजा रत्नदेव ( 1045 – 1065 )

रत्नदेव (प्रथम) के काल में अनेक निर्माण कार्य तुम्माण में किए गए. इसने लगभग 1050 ई. में रत्नपुर नामक नगर स्थापना कर राजधानी तुम्माण से यहाँ स्थानान्तरित की. रत्नपुर (वर्तमान में रतनपुर) के नाम पर कलचुरियों के दक्षिण कोसल की इस शाखा को इतिहासकारों द्वारा रतनपुर के कलचुरि के नाम से सम्बोधित किया जाता है.
रत्नदेव ने नवीन राजधानी में अनेक मन्दिरों एवं तालाबों का निर्माण कराया. प्रसिद्ध महामाया मन्दिर का निर्माण इन्हीं के द्वारा कराया गया. रतनपुर को ‘कुबेरपुर’ की उपमा दी गई और उसका महत्व अधिक बढ़ गया.

आज के रतनपुर को बसाने का श्रेय रत्नदेव को जाता है। 1050 में इन्होने रतनपुर को बसाया था और अपनी  राजधानी भी घोषित किया था। इन्होने कोमोमंडल के प्रमुख वजू वर्मा की पुत्री नोनल्ला से विवाह किया था।

पृथ्वीदेव प्रथम ( 1065 – 1095 )

पृथ्वीदेव प्रथम (1065-95 ई.) रत्नदेव प्रथम के पश्चात् उसका पुत्र पृथ्वीदेव प्रथम राजा बना. इसकी सर्वप्रथम तिथि रायपुर ताम्रपत्र से कलचुरि संवत् 821 अर्थात् 1095 ई. ज्ञात होती है. इसने ‘सकलकोसलाधिपति’ की उपाधि धारण की थी तथा वह कोसल के इक्कीस हजार ग्रामों का अधिपति था. इसके काल में तुम्माण एवं रतनपुर में निर्माण कार्य होते रहे.

  • उपाधि- “सकल कोसलाधिपति
  • इन्होने अपने शासन काल के दौरान अनेक मंदिरो और तालाबों का निर्माण कराया था। तुम्माण के बांकेश्वर मंदिर में चतुंषिक्का (चार खम्भों वाला मंडप ) का निर्माण, पृथ्वीदेवेश्वर सिंह मंदिर,रतनपुर का विशाल तालाब का निर्माण इनके प्रमुख निर्माणों में से एक है।
  • अमोदा ताम्रपत्र में मिली जानकारी के अनुसार पृथ्वीदेव प्रथम 21 हजार गावो का स्वामी था।

जाजल्लदेव प्रथम( 1095 -1120 )

जाजल्लदेव प्रथम (1095-1120 ई.)-जाजल्लदेव प्रथम अपने पिता पृथ्वीदेव प्रथम के पश्चात् लगभग 1095 ई. में रतनपुर का राजा हुआ. इसके रत्नपुर शिलालेख में इसकी विजयों का उल्लेख है. इसने वैरागर, लॉजिका, भाणर, तलहारिमण्डल, दण्डकपुर (बंगाल में स्थित), खिमिडी (आन्ध्र में स्थित) को पराजित किया.

नन्दावली एवं कुक्कुट के राजा इसकी अधिसत्ता स्वीकार कर इसे कर देते थे। जाजल्नदेव ने चक्रकोट के छिंदक नागवंशी राजा सोमेश्वर को दण्ड देने के उद्देश्य से उसकी राजधानी को जला दिया तथा उसे मंत्रियों तथा रानियों सहित कैद कर लिया, किन्तु उसकी माता के अनुरोध पर मुक्त कर दिया. उसने सुवर्णपुर के भुजबल को पराजित कर कैद किया था। इस प्रकार इसकी प्रतिष्ठा और कीर्ति में वृद्धि हुई. इसने अपने नाम पर स्वर्ण मुद्राएँ प्रचलित करायी. इसने जाजल्यपुर नगर (वर्तमान जांजगीर) की स्थापना की तथा पाली के शिव मन्दिर का जीर्णोद्वार कराया जो आज भी सुरक्षित है. इसने अपने स्वर्ण सिक्कों पर ‘श्रीमज्जाजल्यदेव’ एवं ‘गजशार्दूल’ चित्रित करवाया.

  • उपाधि – गजशार्दूल
  • जाजल्लदेव प्रथम ने उड़ीसा के शासक भुजबल और छिन्दकनाग वंश के शासक सोमेश्वर को हराया था। इन्होने अपने नाम के स्वर्ण एवं ताम्बे के सिक्के चलवाये थे।
  • इन्होने गजशार्दूल की उपाधि धारण किया था। गजशार्दूल का अभिप्राय है -हाथियों का शिकारी। नया शहर बसाया जाजल्लपुर, जिसे हम अभी जाजंगीर शहर के नाम से जानते है।
  • पाली के शिव मंदिर का जीर्णोद्धार का श्रेय इन्ही को जाता है।

रत्नदेव द्वितीय (1120 -1135 )

रतनदेव द्वितीय (1120-35 ई.)-जाजल्लदेव प्रथम के पश्चात् रत्नदेव द्वितीय कलचुरि सं. 878 अर्थात् 1127 में राजा हुआ. इसने त्रिपुरी के कलचुरियों की अधिसत्ता मानना अस्वीकार कर दिया. अतः त्रिपुरी के राजा गयाकर्ण ने इस पर आक्रमण किया, किन्तु उसे सफलता नहीं मिली. इसी समय गंगवंशी राजा अनन्तवर्मा चोड़गंग ने भी रतनपुर के कलचुरि राज्य पर आक्रमण किया, किन्तु शिवरीनारायण के पास हुए युद्ध में उसे पराजित हो कर लौटना पड़ा. इसके पश्चात् जाजल्लदेव ने गौड़ देश पर आक्रमण कर वहाँ के राजा को पराजित किया.

  • उपाधि – त्रिलिंगाधिपति
  • अपनी शासनकाल में सोने और चांदीके सिक्के चलवाये। गैंग वंशीय शासक अनंतवर्मन को इन्होने पराजित किया था।

पृथ्वीदेव द्वितीय (1135 -1165 )

पृथ्वीदेव द्वितीय (1135-65 ई.)-रत्नदेव द्वितीय का उत्तराधिकारी उसका पुत्र पृथ्वीदेव द्वितीय हुआ. इसका सर्वप्रथम अभिलेख कलचुरि संवत् 890 अर्थात् 1138 ई. का है. इसके काल में रतनपुर का कलचुरि साम्राज्य अत्यन्त विस्तृत हो गया . इसके राजिम शिलालेख से ज्ञात होता है कि इसके सेनापति जगपाल ने सरहागढ़, मचका, सिहावा, भ्रमरवद्र, कान्तार, कुसुमभोग, कान्दाडोंगर तथा काकरय के क्षेत्रों को जीतकर साम्राज्य का विस्तार किया. \इसके पश्चात् इसने चक्रकोट पर आक्रमण कर उसे नष्ट कर दिया. इससे अनन्तवर्मा चोड़गंग भयभीत होकर समुद्र तट भाग गया. अनन्तवर्मा की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र मधुकामार्णव जटेश्वर राजा हुआ. पृथ्वीदेव द्वितीय ने इसे भी पराजित कर कैद कर लिया. इसका अन्तिम रतनपुर अभिलेख कलचुरि सं. 915 अर्थात् 1163 ई. का है,

चाँदी के सबसे छोटे सिक्के चलवाने का श्रेय इन्ही को जाता है। इनके शासन काल में जगतपाल द्वारा राजीवलोचन मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया था।

जाजल्लदेव द्वितीय ( 1165 – 1168  )

रतनपुर के सिंहासन पर जाजल्लदेव द्वितीय अपने पिता पृथ्वीदेव द्वितीय के पश्चात् वैठा. इसकी सर्वप्रथम ज्ञात तिथि मल्हार शिलालेख कलचुरि संवत् 919 अर्थात् 1167 ई. से मिलती है. इसके काल में त्रिपुरी के कलचुरि राजा जयसिंह ने आक्रमण किया, किन्तु वह असफल रहा. इस शासक का राज्य अल्पकालीन था. जाजल्लदेव द्वितीय के पश्चात् उसके बड़े भाई जगदेव के राजा बनने का विवरण रत्नदेव के खरौद शिलालेख में मिलता है. इससे ज्ञात होता है कि जब जाजल्लदेव की मृत्यु हो गई, तब उसके बड़े भाई जगदेव ने जो स्वेच्छा से सिंहासन छोड़कर पूर्व में गंग राजाओं के दमन के लिए निकला था, ने आकर शासन सम्हाला तथा कलचुरि शासन की समुचित व्यवस्था की.

इसके बारे में कुछ खास इतिहास से प्राप्त नहीं हुए है।

जगददेव ( 1168 -1178 )

ये जाजल्लदेव का भाई था। जो गैंग राजाओ के दमन के लिए निकला था।

रत्नदेव तृतीय ( 1178 – 1198 )

रत्नदेव तृतीय (1178-98 ई.) जाजल्लदेव के पश्चात् उसके पुत्र रत्नदेव तृतीय के विषय में उसके कलचुरि सं. 933 के अर्थात् 1168 ई. के खरौद शिलालेख से जानकारी मिलती है. यह जगद्देव रानी सोमल्ला का पुत्र था. इसके काल में अराजक स्थिति निर्मित हो गई थी, इससे निपटने हेतु उसने एक ब्राह्मण गंगाधर को प्रधानमंत्री बनाया और उसकी सहायता से इसने स्थिति पर नियन्त्रण प्राप्त किया. गंगाधर ने खरौद के लखनेश्वर मन्दिर के सभी मंडपों का जीर्णोद्धार कराया.

यह जगददेव का बेटा था। इसके मंत्री गंगाधर राव ने खरौद के लखनेश्वर मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था और रतनपुर में एकवीरा देवी का मंदिर का निर्माण करवाया था।

प्रतापमल्ल ( 1198 – 1222 )

रत्नदेव तृतीय के पश्चात् प्रतापमल्ल राजा हुआ. इसके तीन ताम्रपत्र पेन्ड्राबंध, कोनारी एवं बिलाईगढ़ नामक स्थानों से क्रमशः 1213, 1216 एवं 1217 ई. (सं. 965, 968 एवं 969) के प्राप्त हुए हैं. इन अभिलेखों से ज्ञात होता है कि यह कम उम्र में भी अत्यन्त शक्तिवान था. इसके ताँबे के चक्राकार एवं षटकोणाकार सिक्के मिले हैं, जिसमें सिंह और कटार की आकृति मिलती है. इसी काल में जसराज अथवा बशोराज नामक एक कलचुरियों का सामन्त हुआ. इसका उल्लेख बोरिया (कवर्धा के निकट) मूर्तिलेख, कलचुरि संवत् 910 तथा सहसपुर के सहस्त्रबाहु प्रतिमा (कलचुरि संवत् 934) लेख में मिलता है. इस प्रकार इसका काल ई.1158 से 1182 ई. ज्ञात है.

सिंह और कटार की आकृति चिन्ह अंकित वाले ताम्बे के सिक्के चलाये। इसके दो सामंत थे पहला जसराज और दूसरा यशोराज।

कलचुरि का अंधकारयुग

1122 के बाद लगभग 250 सालो का इतिहास, इतिहासकारो के द्वारा कलचुरी शासको का कोई वर्णन नहीं मिला है इसलिए इस समय को अंधकारयुग कहा गया है।


प्रतापमल्ल के पश्चात् रतनपुर के कलचुरियों के विषय में जानकारी देने वाले स्रोतों की कमी है. प्रतापमल्ल के बाद 1494 तक अर्थात् लगभग 300 वर्षों तक इस वंश से सम्बन्धित कोई अभिलेख प्राप्त नहीं हुए हैं. अतः प्रतापमल्ल के बाद कलचुरियों का प्रामाणिक इतिहास सर्वथा अप्राप्य है. कलचुरि वंश से सम्बन्धित दो प्रसिद्ध विद्वानों बाबू रेवाराम कायस्थ और पं. शिवदत्त शास्त्री गौराहा द्वारा लिखे हैहयवंशियों के अप्रकाशित इतिहास मिले हैं, जिससे कुछ प्रकाश पड़ता है.

देवगिरी के यादवों के अभिलेखों से जानकारी मिलती है कि उस वंश के सिंघण, कृष्ण तथा रामचन्द्र (अलाउद्दीन खिलजी का समकालीन) नामक राजाओं ने दक्षिण कोसल पर आक्रमण किया था. सिंघण समय के इस क्षेत्र में जाजल्ल नामक राजा राज्य करता था, चूँकि सिंघण का काल 1210-1247 ई. था. अतः अनुमान किया जा सकता है कि यह जाजल्ल (तृतीय)
प्रतापमल्न का उत्तराधिकारी रहा होगा.

इसके बाद के शासक –

बहरेन्द्र साय ( 1480 – 1525 )

लम्बे अन्तराल के पश्चात् वाहरेन्द्र (बाहरसाय, सम्भवतः 1480-1525 ई.) नामक राजा के विषय में जानकारी मिलती है. इसका एक शिलालेख रतनपुर के विक्रम संवत् 1552 (1495-96 ई.) तथा दो शिलालेख कोसंगई से प्राप्त हुए हैं, जिसमें एक विक्रम संवत् 1570 अर्थात् 1513 ई. का है, दूसरा तिथिविहीन है. वाहरेन्द्र के अभिलेख से उसके पूर्ववर्ती अनेक राजाओं के नाम मिलते हैं. इसमें सिंघण तथा उसके पश्चात् क्रमशः डंधीर, मदनब्रम्हा, रामचन्द्र तथा रत्नदेव के नामोल्लेख हैं.

वाहरेन्द्र रत्नदेव का पुत्र था. बाहरेन्द्र के काल में राजधानी रतनपुर से कोसंगा (कोसंगई गढ़ वर्तमान छुरी) स्थानान्तरित कर दी गई थी. इसके शासन काल में पठानों का आक्रमण हुआ था तथा इसने उन्हें सोन नदी तक खदेड़ दिया था. सिंघण के पूर्ववर्ती एक राजा लक्ष्मीदेव का उल्लेख रायपुर के ब्रम्हदेव के अभिलेखों में मिलता है. वाहरेन्द्र का शासनकाल 1480 से 1525 ई. स्वीकृत किया जा सकता है. प्रतापमल्ल और वाहरेन्द्र (1222-1480 ई.) के बीच राज्य करने वाले राजाओं की सूची बाबू रेवाराम कायस्थ ने प्रस्तुत की है, किन्तु अभिलेखीय साक्ष्यों से उसकी पुष्टि नहीं होती.”

कल्याण साय ( 1544  – 1581)-

कल्याण साय मुग़ल के सम्राट अकबर के समकालीन था। कल्याण से के राजस्व की जमाबंदी प्रणाली शुरू की थी। इसी जमाबंदी प्रणाली के अनुसार ही ब्रिटिश अधिकारी चिस्म ने बाद में छत्तीसगढ़ को 36 गढ़ो में बांटा था।

वाहरेन्द्र के पश्चात् रतनपुर के कलचुरियों के अभिलेख नहीं मिलते, किन्तु अन्य साक्ष्यों से जानकारी मिलती है कि कल्याणसाय नामक एक राजा ने रतनपुर में लगभग 1544 से 1581 तक (कुछ इतिहासकारों के अनुसार 1536-1573 ई. तक) राज्य किया. इसके समय की एक राजस्व पुस्तिका का उल्लेख मिलता है, जिसमें उस समय की प्रशासनिक व्यवस्था, राजस्व एवं सैन्य बल की जानकारी मिलती है. मिस्टर चिशम बिलासपुर के प्रथम अंग्रेज बंदोबस्त
अधिकारी ने सन् 1868 में इस पुस्तिका को आधार मान कर कलचुरि शासन व्यवस्था के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण प्रकाश डाला है. इस पुस्तिका के आधार पर ही चिशम ने रतनपुर और रायपुर के 18-18 गढ़ों अर्थात् कुल छत्तीसगढ़ों के प्रशासन का बाबूरेवाराम के अनुसार प्रतापमल्ल और बाहरसाय के मध्य (1222-1554 ई.) निम्नलिखित राजा रतनपुर में हुए

(I) जयसिंहदेव,
(2) धरमसिंहदेव,

(3) जगन्नाथसिंहदेव,

(4) वीरसिंहदेव-इसके समय में रतनपुर राज का बँटवारा हुआ तथा रायपुर क्षेत्र में लहुरि शाखा स्थापित हुई,

(5) कमलदेव,

(6) शंकरसाय,

(7) मोहनसाय,

(8) दादुसाय,

(9) पुरोषत्तमसाय,

(10) बारहसाब (1544 ई.).

उल्लेख किया है.

कल्याण साय मुगल सम्राट अकबर का समकालीन था तथा उसके दरबार में लगभग आठ वर्ष रहा और वहाँ से अनेक प्रकार के सम्मान एवं सनद आदि लेकर लौटा. इसके समय राज्य की आर्थिक स्थिति अच्छी थी. इस समय सम्पूर्ण राज्य से होने वाली वार्षिक आय ₹6.50 लाख थी. उसका शासन 1581 ई. तक चलता रहा और इस समय तक रतनपुर का कलचुरि राज्य अपनी प्रौढ़ता को प्राप्त कर चुका था. बाद के शासकों का शासन उल्लेखनीय नहीं रहा और यह क्रमशः क्षीणता की ओर अग्रसर होने लगा.

कल्याण साय की जमाबंदी : अकबर के पूर्व की विकसित राजस्व व्यवस्था

देश के इतिहास में भू-राजस्व व्यवस्थापन के साथ सदैव अकबर और उनके नवरत्नों में से एक राजा टोडरमल को याद किया जाता है, किन्तु लोग अपने क्षेत्रीय गौरव कलचुरि शासक कल्याण साय की जमाबंदी को भूल जाते हैं. रतनपुर शाखा के कल्याण साय (सन् 1550 ई.) के जमाबंदी की पृष्ठभूमि निश्चित ही अकबर से पहले की है. इस जमाबंदी में अंकित ऐतिहासिक राजस्व व अन्य राजकीय सूचनाओं का महत्व अंग्रेज अधिकारियों ने पहचाना.

सन् 1861-68 के मध्य बिलासपुर जिले का (पहला) बंदोबस्त करते हुए बंदोबस्त अधिकारी मि. चीजम ने इसी जमाबंदी को अपने कार्य का आधार बनाया और फिर सन् 1909-10 में बिलासपुर जिला गजेटियर तैयार करने के सिलसिले में मि. नेल्सन द्वारा इसकी खोज की गई. यह मूल अभिलेख न मिल पाने के फलस्वरूप देरों जानकारियाँ जो मि. चीजम ने उद्धृत की थीं, ज्यों का त्यों इस्तेमाल कर गजेटियर पूरा किया जा सका. कल्याण साय को जमाबंदी तत्कालीन, अत्यन्त रोचक और महत्वपूर्ण जानकारियों का दस्तावेज है, जिसके अनुसार रतनपुर राज के गढ़ों अर्थात् केवल खालसा क्षेत्र से साढ़े छः लाख रुपए का राजस्व वसूल होता था, तब के रुपए का मूल्य अनुमान कर तत्कालीन सम्पन्नता समझी जा सकती है. कल्याण साय की जमाबंदी से तत्कालीन इतिहास का जो दृश्य सामने आता है, उससे इस क्षेत्र के नामकरण के पीछे छत्तीस प्रशासनिक इकाइयाँ-गढ़ ही आधार बनीं, इसमें कोई संदेह नहीं रह जाता.

लक्ष्मण साय ( 1581-1600 )

इन्होने देशबही बनवाया था जिसके जरिये राज्य में लगने वाला करो का लेखा जोखा होता था।

कल्याण साय के पश्चात् 1581 से 1689 ई. के मध्य लक्ष्मण साय (1581 ई.), शंकर साय (1596 ई.), मुकुन्द साय (1606 ई.), त्रिभुवन साय (1622 ई.), अदली साय (1659 ई.), जगमोहन साय (1653 ई.), रणजीत राय (1675 ई.) तथा तखतसिंह साय (1685 अथवा 1689 ई.) आदि राजाओं के नामोल्लेख बाबू रेवाराम तद्नुसार निर्मित कनिंघम की सूची एवं जिला गाजेटियरों में मिलते हैं.

तखत सिंह (17वी शताब्दी )


तखतसिंह ने तखतपुर की स्थापना 17वीं शताब्दी के अन्त में की थी. इसके पश्चात् राजसिंह (1689-1712 ई.) राजा हुआ. इसने राजपुर (वर्तमान जूना शहर रतनपुर के निकट) बसाया. जनश्रुतियों के अनुसार वे निःसंतान थे. अतः ब्राह्मण दीवान के निबोग द्वारा इसे पुत्र उत्पन्न हुआ जिसका नाम विश्वनाथ सिंह था. विश्वनाथसिंह का विवाह रीवा की राजकुमारी के साथ हुआ था. नियोग की घटना से क्रोधित राजा ने दीवान तथा उसके रिश्तेदारों के निवास क्षेत्र को तोप से उड़ा दिया था, वहीं कालान्तर में आत्मग्लानि के कारण विश्वनाथ सिंह ने आत्महत्या कर ली थी. प्रसिद्ध कवि गोपाल (गोपाल चन्द्र मिश्र) राजसिंह के राजाश्रय में थे, जिन्होंने प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘खूब तमाशा’ लिखा था. 1721 ई. में राजसिंह की मृत्यु हो गई.

औरंगजेब का समकालीन था। तखतपुर शहर बसाया था।

राज सिंह–

प्रसिद्ध कवि गोपाल मिश्र ने खूब तमाशा की रचना इसी के शासन काल में किया था।

राजसिंह के उत्तराधिकारी नहीं होने के कारण उन्होंने रायपुर शाखा के मोहनसिंह को उत्तराधिकारी घोषित किया था, किन्तु राजसिंह के आकस्मिक मृत्यु के समय मोहनसिंह उपस्थित नहीं था. अतः राजसिंह ने राज्य अपने चाचा 60 वर्षीय सिरदार सिंह को सौंप दिया.

सरदार सिंह

सिरदार सिंह (1713-1732 ई.) के निःसंतान होने के कारण उनका भाई रघुनाथसिंह राजा बना.

रघुनाथ सिंह–  [अंतिम कलचुरी शासक]


इसके शासनकाल में ही मराठा सेनापति भास्कर पन्त ने 1741 ई. में ओडिशा अभियान के मध्य रतनपुर पर अधिकार कर लिया. कहा जाता है कि वृद्ध रघुनाथसिंह अपने एकमात्र पुत्र की मृत्यु से दुःखी रहता था, जिससे राजकीय कार्यों में उसकी अरुचि हो गई थी. अतः रघुनाथसिंह ने भास्कर पन्त का विरोध नहीं किया. रतनपुर के किले का एक हिस्सा तोप से मराठा सेना द्वारा नष्ट कर दिया गया था, तब रघुनाथसिंह की रानियों ने सफेदध्वज फहराकर संधि की घोषणा की.

भास्कर पन्त ने रघुनाथसिंह को ही भोंसलों के नाम पर राज्य करने की अनुमति प्रदान कर वास्तव में हैहय वंशियों की मुख्य शाखा रतनपुर के अन्तिम शासक रघुनाथसिंह को जर्जर वृद्धावस्था एवं पुत्र शोक से टूटी मानसिकता ने पूरी तरह से उदासीन कर दिया था, जिसका लाभ भोंसलों को मिला और भोसला सेनापति भास्कर पंत ने अपने ओडिशा अभियान (बंगाल के नवाब अलीवर्दी खाँ से चौथ एवं पूर्व बकाया वसूली हेतु) के तहत् बिना युद्ध के रतनपुर राज्य जीत लिया और मराठों के अधिकार की स्थापना के साथ ही प्रबल प्रतापी हैहयवंशी राज्य की इतिश्री हो गयी.

मोहन सिंह–[ मराठो के अधीन अंतिम कलचुरी शासक]

इसके पश्चात् रघुनाथसिंह की मृत्यु के उपरान्त मोहनसिंह मराठों के प्रतिनिधि के रूप में 1758 ई. तक रतनपुर का शासक बना रहा. 1758 से भोंसला राजकुमार बिंबाजी ने छत्तीसगढ़ में प्रथम मराठा शासक के रूप में प्रत्यक्ष शासन स्थापित किया.

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