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छत्तीसगढ़ में काकतीय वंश(1324-1961)

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बस्तर में नागवंशियों के पश्चात् काकतीय वंश का राज्य स्थापित हुआ. इस वंश की चर्चा करने के पूर्व इसके सम्बन्ध में जान लेना आवश्यक है. 13वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में वारंगल का काकतीय राजा गणपति था, जो निःसंतान था. उसने अपनी पुत्री रुद्राम्बा को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया, जिसने सन् 1261-1293 ई. तक वारंगल राज्य में शासन किया.

तेरहवीं शताब्दी के मध्य में महादेव नामक चालुक्य व्यक्ति तथा उनकी पत्नी मम्मडम्बा, जोकि शासनाधीन काकतीय महारानी रुद्राम्बादेवी की पुत्री थी, के दो पुत्र प्रतापरुद्रदेव तथा अन्नमदेव हुये. महादेव तथा मम्मडम्बा की एक पुत्री भी थी, जिसका नाम रैलादेवी था (जो आज भी बस्तर में दशहरा पर्व के समय रैलापूजा के नाम से पूजित है). रानी रुद्राम्बा भी निःसंतान थी. अतः उसने चालुक्यवंशी महादेव के पुत्र प्रतापरुद्रदेव को गोद ले लिया.

तदुपरांत प्रताप रुद्रदेव रानी रुद्राम्बा की मृत्यु के पश्चात् काकतीयों की राजगद्दी पर बैठा. दत्तक नियमों के अनुसार प्रतारुद्रदेव चालुक्य होते हुए भी काकतीय कहलाये. प्रतापरुद्रदेव का भी कोई पुत्र नहीं था. अतः उसके अनुज अन्नमदेव उत्तराधिकारी हुये, काकतीय परम्परा को आगे बढ़ाने के कारण उनके राजवंश को काकतीय राजवंश के नाम से जाना गया. दंतेवाड़ा के शिलालेख में भी बस्तर राजाओं को काकतीय कहा गया. इस वंश के बाईसवें शासक प्रवीरचन्द्र भंजदेव ने स्वयं को हमेशा काकतीय कहा है. अतः इस वंश को काकतीय मानना ही श्रेयस्कर होगा.

छत्तीसगढ़ में काकतीय वंश(1324-1961)

काकतीयों के आदिपुरुष प्रतापरुद्रदेव काकतीय (दुर्गा) नाम की देवी के पूजक थे. आन्ध्र प्रदेश के ‘एकशिला’ नामक नगर में काकतीय देवी का प्रसिद्ध मन्दिर था एवं इस प्रदेश का पुराना नाम त्रिलंग था, जहाँ शिव के तीन पीठ थे. इसलिये यह प्रदेश ‘त्रिलांगाना’ और कालान्तर में तेलंगाना कहलाया और यहाँ के निवासी ‘तेलंग’ कहे गये. जैसा ऊपर बताया गया है कि चालुक्य प्रतापरुद्रदेव काकतीय हो गये और 1295 ई. में तेलंगाना के शासक बने. यह अत्यन्त प्रतापी शासक था. अपने पिता के काल में ही उसे बुवराज का पद प्रदान कर विजय यात्रा हेतु भेजा गया था. उसकी विजय यात्रा का विस्तृत विवरण एक प्राचीन नाटक ‘प्रतापादिव्य विजय’ में मिलता है, जिसमें उसने अनेक राज्यों पर विजय प्राप्त की थी.

काकतीय राजा बनने के उपरान्त भी उन्होंने 1295 से 1310 ई. तक कुशलतापूर्वक शासन किया, किन्तु 1309-10 ई. में अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति मलिक काफूर ने अपनी दक्षिण विजय के दौरान देवगिरि विजय करते हुए वारंगल पर आक्रमण कर दिया. यह वारंगल में प्रथम मुस्लिम आक्रमण था. शक्तिशाली मुस्लिम सेना के समक्ष प्रतापरुद्रदेव विवश थे. अतः उसने अपनी एक सोने की मूर्ति बनवा कर गले में एक सोने की जंजीर डाल कर आत्मसमर्पण स्वरूप काफूर के पास भेजा, साथ ही सौ हाथी, सात सौ घोड़े, अपार धनराशि एवं वार्षिक कर देने के वायदे के साथ अलाउद्दीन की अधीनता स्वीकार कर ली. इस प्रकार वारंगल दिल्ली सल्तनत का करद राज्य बन गया, किन्तु तुगलक वंश की स्थापना के साथ हुए स्व. श्री प्रवीर गयासुद्दीन तुगलक (1320-25 ई.) ने वारंगल पर 1321-23 ई. में आक्रमण कर वारंगल व तेलंगाना को दिल्ली सल्तनत में सम्मिलित कर लिया.

प्रतापरुद्रदेव को विवशता में वहाँ से भागना पड़ा. वह सेना की एक छोटी सी टुकड़ी के साथ भटकते ठोकरें खाते बस्तर पहुँचे. बस्तर में उन दिनों अनेक छोटे-छोटे राज्य थे. उन्हें परास्त कर कुछ समय बस्तर में राज्य करने के उपरान्त वह पुनः वारंगल लौटा, जहाँ उसकी मृत्यु हो गई. चूँकि वारंगल दिल्ली सल्तनत का हिस्सा बन चुका था. अतः काकतीयों के लिये वहाँ कुछ भी शेष न रहा. भाई की मृत्यु के पश्चात् अन्नमदेव वारंगल छोड़कर बीजापुर मार्ग से होते हुये वारसूर पहुँचा और अन्तिम नागवंशी राजा हरिश्चन्द्र को परास्त कर वैशाख शुक्ल 8 सन् 1324 ई. में सिंहासनारूढ़ हुआ. कुछ समय दंतेवाड़ा में रहकर वह चक्रकोट का स्वामी बन गया. अन्नमदेव ने ताराला ग्राम में दंतेश्वरी देवी का मन्दिर बनवाया था. देवी के नाम पर ही इस ग्राम का नाम दंतेवाड़ा हुआ.

बस्तर के काकतीय राजाओं की सूची

अन्नमदेव से लेकर प्रबीरचन्द्रभंजदेव तक बस्तर के काकतीय राजाओं की सूची निम्नानुसार है. इसमें क्रमांक 13 के चंदेलमामा चंदेलवंश के थे-
1. अन्नमदेव 1324-69 ई.

  • दंतेवाड़ा में दंतेश्वरी मंदिर का निर्माण कराया।
  • चक्रकोट से राजधानी मंघोता ले आया।


2. हमीरदेव 1369-1410 ई.
3.भैरवदेव 1410-68 ई.
4. पुरुषोत्तमदेव 1468-1534 ई.

  • मंघोता से राजधानी बस्तर लाया।
  • बस्तर का दशहरा,गोंचा पर्व,बस्तर की रथ यात्रा प्रारंभ करवाया।


5.जयसिंहदेव 1534-58 ई.
6. नरसिंहदेव 1558-1602 ई.
7. प्रतापराजदेव 1602-25 ई.

बस्तर की सेना से गोलकुंडा के कुलिकुतुब शाह पराजित हुआ।


8. जगदीशराजदेव 1625-39 ई.
9. वीरनारायणदेव 1639-54 ई.
10. वीरसिंहदेव 1654-80 ई.

राजपुर का दुर्ग बनवाया


11. दिक्पालदेव 1680-1709 ई.
12. राजपालदेव 1709-21 ई.
13.चंदेलमामा 1721-31 ई,
14. दलपतदेव 1731-74 ई.

  • 1770 राजधानी बस्तर से जगदलपुर परिवर्तन किया ।
  • इसके शासनकाल में रतनपुर भोसलों के अधीन आया।


15. अजमेरसिंह 1774-77 ई.
[क्रांति का मसिंहा ]

भोंसलों के अधीन राजा-

दरियावदेव के समय बस्तर भोंसलों के अधीन 1780 ई. में करद राज्य बन गया था. 1855 तक मराठा भोंसलों की अधीनता में निम्नलिखित काकतीय राजा हुए-
16. दरियावदेव 1777-1800 ई.

  • 1777 के युद्ध में अजमेर सिंह के विरुद्ध षडयंत्र कर मराठो की सहायता की
  • 6 अप्रेल 1778 दरियाव देव ने कोटपाल की संधि की ,परिणामस्वरूप बस्तर नागपुर रियासत के अंतर्गत रतनपुर के अधीन आ गया।
  • बस्तर छत्तीसगढ़ का अंग बना।
  • 1795 में भोपालपट्टनम संघर्ष हुआ।


17. महिपालदेव 1800-42 ई.
18. भूपालदेव 1842-53 ई.

ब्रिटिश शासन के अधीन राजा-

1855 में जब नागपुर राज्य का विलय ब्रिटिश साम्राज्य में हो गया, तो भोंसलों के छत्तीसगढ़ सूबे के साथ-साथ उनके अधीन बस्तर का समस्त राज्य भी ब्रिटिश अधीनता में चला गया, जबकि छत्तीसगढ़ ब्रिटिश साम्राज्य का अंग बन गया. ब्रिटिश अधीनता में काकतीय वंशी राजा निम्न थे-

19. भैरमदेव 1853-91 ई.
20. रुद्रप्रतापदेव 1891-1921 ई.
21. महारानी प्रफुल्लकुमारी देवी 1921-36 ई.
22. प्रवीरचन्द्र भंजदेव 1936-47 ई.

स्वतन्त्रता के बाद काकतीय वंशीय

1948 में बस्तर रियासत का भारत संघ में विलय हो गया. स्वातंत्र्योत्तर काल में निम्नलिखित काकतीय वंशीय उत्तराधिकारी हुए. विलय के बाद भी बस्तर की जनता श्रद्धापूर्वक इन्हें राजा मानती है-
23. प्रवीरचन्द्र भंजदेव 1947-61 ई.
24. विजयचन्द्र भंजदेव 1961-69 ई.
25. भरतचन्द्र भंजदेव 1969-96 ई.
26. कमलचन्द्र भंजदेव 1997 से वर्तमान तक.

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