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मध्यकालीन छत्तीसगढ़ का इतिहास

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भारत के इतिहास में कलचुरि राजवंश का स्थान महत्वपूर्ण है. सन् 550 से लेकर 1740 तक लगभग 1200 वर्षों की अवधि में कलचुरि नरेश उत्तर अथवा दक्षिण भारत के किसी-न-किसी प्रदेश पर राज्य करते रहे. शायद ही किसी राजवंश ने इतने लम्बे समय तक राज्य किया हो.

वैसे हैहयवंश का पूरा वृत्तांत पुराणों में मिलता है. प्रश्न उठता है कि कलचुरि कौन थे ? कहाँ से आये थे और उनका मूल वंश क्या था ? डॉ. मिराशी के अनुसार कलचुरि नरेश अपने को सहस्त्रार्जुन कहे जाने में गौरव का अनुभव करते थे. प्राचीन समय में कलचुरियों को ‘कटच्युरि’, प्रतिद्वंद्वी चालुक्यों द्वारा ‘कलत्सूरि’ तथा शिलालेख में ‘कलचुरि’ या ‘कालाचुरि’ कहा गया है. कुछ विद्वान्, विशेषकर डॉ. देवदत्तपंत भण्डारकर चंदवरदाई के ‘पृथ्वीराज रासो’ के आधार पर इन्हें विदेशी मानते हैं, किन्तु डॉ. मिराशी ने इसका खण्डन किया है. कलचुरि कौन थे? इसका निराकरण अभी तक नहीं हो पाया है, लेकिन कलचुरि और हैहयवंशी एक ही थे. विद्वानों ने इन्हें चन्द्रवंशी क्षत्रिय माना है. कालंजर, प्रयाग, त्रिपुरी, काशी, तुम्माण, रतनपुर, खल्लारी, रायपुर में कलचुरि नरेशों ने अपनी राजधानी स्थापित की.

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मध्यकालीन छत्तीसगढ़ का इतिहास

मध्यकालीन छत्तीसगढ़ का इतिहास

छत्तीसगढ़ के मध्यकालीन इतिहास में  कुल 5 वंशो ने राज किये।

1.कल्चुरी वंश ( रतनपुर और रायपुर )👈[क्लिक करें]

2.फणिनाग वंश ( कवर्धा )👈[क्लिक करें]

3.सोम वंश ( कांकेर )👈[क्लिक करें]

4.छिन्दक नागवंश ( बस्तर )👈[क्लिक करें]

5.काकतीय वंश ( बस्तर ) 👈[क्लिक करें]

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