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काकतीय राजवंश का इतिहास

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अन्नमदेव द्वारा बारसूर में काकतीय वंश की स्थापना के पश्चात् 1936 तक इसकी 20 पीढ़ियों ने 613 वर्षों तक राज किया. सन् 1324 ई. से 1780 ई. तक काकतीय राजाओं ने वस्तर में निष्कंटक राज किया. इनमें से एक राजपाल देव की रानी चंदेलिन के भाई अर्थात् दलपत देव के मामा ने 1721 से 1731 ई. तक राज्य किया, जो अन्नमदेव के वंशज नहीं थे. इसने चंदेलिन रानी की बदौलत राज्य किया, क्योंकि वह सौतेली रानी के पुत्र को राजगद्दी पर बैठे नहीं देखना चाहती थी.

इसके बाद 1780 से 1855 ई. तक बस्तर भोंसलों के अधीन करद राज्य के रूप में रहा एवं 1855 के बाद वह अंग्रेजों के अधीन एक रियासत बन गया. पुनः 1936 से प्रवीरचन्द्र भंजदेव, जोकि ओडिशा के भंजदेव कुल के हुये, ने शासन किया.

काकतीय राजवंश का इतिहास

अन्नमदेव (1324-69 ई.)-

अन्नमदेव को दंतेवाड़ा अभिलेख में अन्नमराज’ कहा गया है, जो प्रतापरुद्रदेव का अनुज था एवं 1324 ई. में वारंगल छोड़कर बस्तर पहुंचा था. अन्नमदेव के वारंगल परित्याग के सम्बन्ध में विद्वानों ने अनेक कल्पनाएँ प्रस्तुत की हैं. कतिपय विद्वान् मानते हैं कि मुसलमानों के आक्रमण के समय वह वारंगल से खदेड़ दिया गया था. उसने बस्तर में लघु राज्यों के राजाओं को पराजित किया व समूचे बस्तर का अधिपति बन गया. इस प्रकार अन्नमदेव उत्तर-मध्ययुगीन बस्तर के शासन का विधिवत् संस्थापक था. राजा अन्नमदेव जिस समय सिंहासनाधिरूढ़ हुआ, उस समय उसकी आयु 32 वर्ष की थी. उसकी रानी का नाम सोनकुंवर चन्देलिन (चंदेल राजकुमारी) था. राजा अन्नमदेव एक वर्ष वारसूर में रहकर दंतेवाड़ा में जा बसा.

‘मन्धोता’ अन्नमदेव की राजधानी थी तथा कालान्तर में परवर्ती राजाओं ने ‘बस्तर’ को अपनी राजधानी बनाया. अन्नमदेव ने लगभग 45 वर्षों तक शासन किया. अन्नमदेव के बाद बस्तर के राजा अपने आपको ‘चन्द्रवंशी’ कहने लगे. बस्तर के हलबी भतरी मिश्रित लोकगीतों में अन्नमदेव को ‘चालकी बंस राजा’ कहा गया है. इससे अधिक स्पष्ट हो जाता है कि बस्तर के इस वंश को काकतीय कहना एक भ्रान्ति है.

बस्तर की विभिन्न राजधानियाँ

चक्रकोट के प्रथम काकतीय नरेश अन्नमदेव के समय से ही इनकी राजधानियाँ बदलती रहीं. सर्वप्रथम राजधानी कुछ समय तक बारसूर में थी, वहाँ से दंतेवाड़ा स्थानान्तरित हुई. दंतेवाड़ा से मंधोता गयी और फिर मंधीता से कुरूसपाल, राजपुर, बड़े डोंगर आदि होकर कुछ समय के लिये बस्तर ग्राम में स्थित हो गयी थी. सन् 1703 ई. में दिक्पालदेव के समय में ‘चक्रकोट’ से ‘बस्तर’ में राजधानी स्थानान्तरित हुई थी. दलपदेव तक बस्तर में राजधानी होने के प्रमाण मिलते हैं. वस्तर से राजधानी जगदलपुर लाने का समय सन् 1772 ई.है.


हमीरदेव (1369-1410 ई.)-

अन्नमदेव के उत्तराधिकारी हमीरदेव को हमीरुदेव या एमीराजदेव भी कहा गया है. हमीरदेव 33 वर्ष की अवस्था में सिंहासनाधिरूढ़ हुआ. श्यामकुमारी बघेलिन (बघेल राजकुमारी) इनकी राजमहिषी थी. हमीरदेव के सम्बन्ध में कुछ जानकारी ओडिशा के इतिहास से भी प्राप्त होती है.


भैरवदेव (1410-68 ई.)-

भैरवदेव के अन्य ध्वनिपरिवर्तनयुक्त नाम भयरजदेव तथा भैरवदेव भी मिलते हैं. इसकी दो रानियों में एक ‘मेघई अरिचकेलिन’ अथवा मेघावती आखेट विद्या में निपुण थी, जिसके स्मृति चिह्न मेघी साड़ी, मेघई गोहड़ी प्रभृति (शकटिका) आज भी बस्तर में मिलते हैं.


पुरुषोत्तमदेव (1468-1534 ई.)-

भैरवदेव के पुत्र पुरुषोत्तमदेव ने पच्चीस वर्ष की अवस्था में शासनसूत्र सँभाला था. उसकी रानी का नाम कंचनकुवरि बघेलिन था. कहा जाता है कि पुरुषोत्तमदेव तीर्थयात्रा के लिए जगन्नाथपुरी को रवाना थे तथा पेट के बल सरकते हुए पुरी पहुँचकर उसने जगन्नाथ का दर्शन किया और रत्नाभूषण आदि की भेंट चढ़ाई, पुरी के राजा ने पुरुषोत्तम देव का स्वागत किया और राजा की वापसी के समय सोलह पहियों वाला रथ प्रदान कर उन्हें रथपति की उपाधि प्रदान की. लौटकर उसने बस्तर में रथयात्रा प्रारम्भ की. बस्तर में यह पर्व ‘गोंचा’ के नाम से प्रसिद्ध है. आज भी यह पर्व जगदलपुर में प्रति क्वार मास में मनाया जाता है. पुरुषोत्तमदेव ने ‘मंधोता’ को छोड़कर ‘वस्तर’ में अपनी राजधानी
बनायी थी.

जयसिंहदेव (1534-58 ई.)-

पुरुषोत्तमदेव का पुत्र जयसिंहदेव या जैसिंदेव राजगद्दी पर बैठा. उसकी रानी का नाम चन्द्रकुँवर बघेलिन था. राज्याधिरोहण के अवसर पर उसकी अवस्था चौबीस वर्ष की थी.

नरसिंहदेव (1558-1602 ई.)-

जयसिंहदेव का पुत्र नरसिंहदेव तेईसवें वर्ष की अवस्था में सिंहासन पर आसीन हुआ. उसकी रानी का नाम लक्ष्मीकुँवर बघेलिन था. यह रानी बड़ी ही उदार मनोवृति की थीं तथा उन्होंने अनेक तालाब व बगीचे बनवाए थे.

प्रतापराजदेब (1602-25 ई.) –

नरसिंहदेव के पश्चात् प्रतापदेव अत्यन्त प्रतापी थे. उनके समय में गोलकुण्डा के मुहम्मद कुली कुतुबशाह की सेना ने बस्तर पर आक्रमण किया था. कुतुबशाह की सेना बस्तर की सेना से बुरी तरह से पराजित हुई थी. उसके बाद गोलकुण्डा राज्य द्वारा अहमद नगर के मलिकंबर को उकसा कर बस्तर पर व्यवधान उत्पन्न करने की कोशिश की. उसने जैपुर नरेश की सहायता से जैपुर से लगे बस्तर के कुछ क्षेत्र पर कब्जा कर लिया था.

जगदीशराजदेव (1625-39 ई.) तथा वीरनारायणदेव (1639-54 ई.)-

इनके समय में गोलकुण्डा के अब्दुल्ला कुतुबशाह द्वारा जैपुर ता बस्तर के हिन्दू राज्यों पर मुसलमानों के अनेक धर्मांधतापूर्ण आक्रमण हुए, किन्तु सभी असफल रहे. साथ ही मुगलों के पाँव भी कभी इस क्षेत्र में न जम सके.

वीरसिंहदेव (1654-80 ई.)-

वीरनारायणदेव का पुत्र वीरसिंहदेव बड़ा ही पराक्रमी था. पिता की मृत्यु के पश्चात् बारह वर्ष की अवस्था में वह राजगद्दी पर बैठा. उसकी रानी का नाम बदनकुंवर चंदेलिन था. राजा वीरसिंहदेव बड़ा उदार, धार्मिक, गुणग्राही और प्रजापालक था. उसने अपने शासनकाल में राजपुर का दुर्ग बनवाया था.

दिक्पालदेब (1680-1709 ई.)-

वीरसिंहदेव की मृत्यु के बाद उसका पुत्र दिक्पालदेव अल्पायु में गद्दी पर बैठा. इसके समय की सबसे महत्वपूर्ण घटना सन् 1703 ई. में ‘चक्रकोट’ से ‘बस्तर’ में राजधानी का स्थानान्तरित होना था,

राजपालदेव (1709-21 ई.)-

दिक्पालदेव का पुत्र राजपालदेव भी अल्पायु में सिंहासन पर बैठा. राजपालदेव को राजप्रासादीय पत्रों में रक्षपालदेव भी कहा गया है. राजपालदेव के समय कुछ मुसलमानों ने भी बस्तर पर आक्रमण किया था. रायपुर के महंत घासीदास-समारक संग्रहालय में रखे बस्तर के राजवंश से सम्बद्ध एक महत्वपूर्ण ताम्रपत्र से विदित होता है कि महाराज राजपालदेव ‘प्रौढप्रताप-चक्रवर्ती’ की उपाधि धारण करते थे और माणिकेश्वरी देवी के भक्त थे. ऐसा अनुमान किया जाता है कि दंतेवाड़ा की सुप्रसिद्ध दन्तेश्वरी देवी को माणिकेश्वरी भी कहा जाता था.

चालुक्य-शासन पर चन्देल मामा का अधिकार (1721-31 ई.)-

राजपालदेव की दो पत्नियाँ थीं-एक बघेलिन तथा दूसरी चन्देलिन. बघेलिन रानी के पुत्र दखिनसिंह तथा चंदेलिन रानी के पुत्र दलपतदेव व प्रतापसिंह थे. राजा की मृत्यु के पश्चात् चंदेलिन रानी के भाई अर्थात् राजकुमार के मामा (चंदेल मामा) ने राज सत्ता को अपने कब्जे में कर लिया था. बस्तर के इतिहास में यह प्रथम घटना थी, जबकि बस्तर का शासक एक घुसपैठिए मामा के हाथों में चला गया. यह चन्देलमामा दस
वर्षों तक शासन करता रहा, किन्तु इस बीच दलपतदेव भी चुपचाप नहीं बैठा. दलपतदेव रक्षा बन्धन के शुभ मुहूर्त पर राखी का नेग लेकर चन्देल राजा के दरबार में हाजिर हुआ और उसका वध कर डाला.

दलपतदेव (1731-74 ई.)-

दलपतदेव के शासन काल में सम्पूर्ण पार्श्ववर्ती क्षेत्र भोंसलों के आक्रमण से संत्रस्त थे. पार्श्ववर्ती छत्तीसगढ़ के रतनपुर का शासन भी 1741 ई. में हैहयवंशी राजा रघुनाथसिंह के हाथों से जाता रहा. रतनपुर राजा (छत्तीसगढ़) को अपने अधिकार में लेने के पश्चात् 1770 ई. में मराठा सेना ने नीलू पण्डित या नीलू पंत के अधिनायकत्व में बस्तर पर आक्रमण किया था, किन्तु बस्तर के रणबांकुरों के समक्ष मराठा सेना को घुटने टेकना पड़ा. चालुक्य-आदिवासी सेना ने मराठा सेना को काट डाला. नीलू पण्डित जैपुर की ओर भाग गया.

कालान्तर में मराठा सेना ने संगठित होकर पुनः एक दिन वस्तर पर अचानक आक्रमण कर दिया. उस समय बस्तर की सेना पराजित हुई. अनेक राजाओं ने भोंसलों की अधीनता स्वीकार कर ली थी, किन्तु दलपतदेव ने अपने शासन काल में अनेक विपत्तियों के बाद भी भोंसलों की अधीनता स्वीकार नहीं की थी, दलपतदेव के अनुज ने मराठों से मिलकर उन्हें बस्तर पर आक्रमण करने के लिए उकसाया था. दलपतदेव प्राण बचाकर भाग गये, किन्तु पुनः मराठों से जीत गये थे.

बस्तर से जगदलपुर : राजधानी का स्थानान्तरण-

भोंसला आक्रमण से भयभीत होकर दलपतदेव ने 1770 ई. में बस्तर को छोड़कर जगदलपुर को राजधानी बनाया. इस घटना के तीन वर्ष पश्चात् ही दलपतदेव की मृत्यु हो गयी. बंजारों का बस्तर में व्यापार और नमक-सभ्यता का प्रसार (1770 ई. से)-उत्तर मध्ययुगीन बस्तर अज्ञानान्धकार सेआप्लावित था, किन्तु दलपतदेव के समय से यहाँ बंजारों द्वारा वस्तुविनिमय-व्यापार प्रारम्भ किया गया तथा नमक और गुड़ के प्रति आदिवासियों की रुचि में जैसे ही संवर्धन होने लगा, वैसे ही ये अन्धकार से प्रकाश की ओर बढ़ने लगे.

कैप्टन जे.टी. ब्नंट ने अप्रैल 1795 ई. के अपने यात्रा-वृत्तांत में इस तथ्य का उद्घाटन किया है. इस प्रकार दण्डकारण्य में अगस्त्य केपश्चात् दूसरे यात्री बंजारे हैं, जिन्होंने व्यापार के माध्यम से इस क्षेत्र को सुसंस्कृत बनाने का उपक्रम किया. वस्तुतः इसकेपीछे भोंसला राजा का हाथ था, जो बंजारों के माध्यम से इन्हें सभ्य बनाना चाहता था, ताकि वे उसके राज्य की वस्तुएँ बंजारों के माध्यम से खरीद सकें. वस्तुओं में नमक तथा गुड़ प्रधान वस्तुएँ थीं. बंजारे भी पूर्व सुरक्षा के आश्वासन के बाद अपनी जान जोखिम में डालकर बस्तर में प्रवेश करते थे.

वस्तु विनिमय व्यापार और शोषण का आरम्भ-

बंजारों ने बस्तर के गोंडों का विश्वास प्राप्त कर उन्हें अनेक आरामदेह वस्तुएँ उपलब्ध कराकर उनके मन में इन वस्तुओं के प्रति रुचि उत्पन्न कर दी थी, जिन्हें अब वे सरलता से छोड़ नहीं सकते थे. इन वस्तुओं की प्राप्ति के निमित्त अब इन्हें जंगलों में अधिक परिश्रम करना पड़ता था तथा लाख एवं लौह अयस्क तथा अन्य उपयोगी वन्य उत्पाद आदि को वस्तु विनिमय व्यापार योग्य प्राप्त करने के लिये इन्हें उन वस्तुओं को जंगलों से एकत्रकरना पड़ता था. कालान्तर में इन्होंने बंजारों की रक्षा का दायित्व स्वयं ले लिया. इस व्यापार से उनकी सभ्यता पर आमूलचूल
प्रभाव पड़ा. वस्तर में वस्तु विनिमय का यह व्यापार शोषण का माध्यम बन गया और कालान्तर में यही गोंड़ों के विद्रोहों काकारण बनता रहा. बंजारों के आवागमन ने मराठों और अंग्रेजों का कार्य आसान कर दिया और बस्तर इनकी अधीनता मेंआ गया.


अजमेर सिंह (1774-77 ई.) :

क्रान्ति का पहला मसीहा-दलपतदेव ने युवावस्था में ही पटरनी के पुत्र अजमेरसिंह को डोंगर का अधिकारी बना दिया था. जब दलपतदेव की मृत्यु हुई. उस समय अजमेरसिंह डोंगर में था तथा रानी के पुत्र दरियावदेव ने अनाधिकृत रूप से राजा बनने के विचार से अजमेरसिंह पर चढ़ाई कर दी. दोनों के मध्य भीषण संघर्ष हुआ तथा दरियावदेव पराजित होकर जगदलपुर भाग गया. इस प्रकार 1774 ई. में ही अजमेरसिंह बस्तर राजसिंहासन पर बैठा.

दरियावदेव ने जैपुर जाकर वहाँ के राजा विक्रमदेव (1758-81 ई.) से मित्रता कर ली तथा उसी के माध्यम से नागपुर केभोसले व कम्पनी सरकार के अधिकारी जॉनसन से सम्पर्क किया. कुछ शर्तों के आधार पर तीनों ही ताकतों ने अजमेरसिंह के विरुद्ध दरियावदेव की सहायता करने का वचन दिया तथा तद्नुसार 1777 ई. में कम्पनी सरकार के प्रमुख जॉनसन व जैपुर की सेना ने पूर्व से व भोंसला के अधीन नागपुर की सेना ने उत्तर दिशा से जगदलपुर को घेर लिया. फलस्वरूप अजमेरसिंह परास्त होकर जगदलपुर से भाग कर डोंगर चला गया.

हल्बा विद्रोह (1774-79 ई.) तथा चालुक्य राज का पतन 

बस्तर में मराठाराज (1778-1853 ई.)

दरियावदेव (1777-1800 ई.)

बस्तर के वास्तविक अधिकारी अजमेरसिंह के विरुद्ध उसके भाई दरियावदेव ने जो षड्यन्त्र रचा, उसमें वह सफल हुआ तथा शत्रु सेनाओं के संचालक जैपुर नरेश महाराज विक्रमदेव ने दरियावदेव को वस्तर राज्य के सिंहासन पर अभिषिक्त किया. दरियावदेव ने व्यक्तिगत लोभ के लिये बस्तर राज्य की स्वाधीनता को बेच दिया. इसके शासन में अप्रैल 1795 ई. में भोपालपट्टमन् संघर्ष हुआ.

कोटपाड़ सन्धि (6 अप्रैल, 1778 ई.)

बस्तर में आंग्ल-मराठाराज (1819-53 ई.)

महिपालदेव (1800-42 ई.)

महिपाल दरियावदेव का ज्येष्ठ पुत्र था. सन् 1809 ई. तक बस्तर ने नागपुर के राजा को कोई खास महत्व नहीं दिया था. सन् 1779 ई. में बस्तर राज्य ने मराठा वर्चस्व स्वीकार कर लिया था, किन्तु न तो दरियावदेव और न उसके पुत्र महिपालदेव ने राजा के मामले में हस्तक्षेप करने का उन्हें कोई मौका दिया. इस प्रकार बस्तर भीकाजी गोपाल (1809-17 ई.) की नाराजगी का कारण बना रहा.


दरियावदेव ने यद्यपि भोंसलों की अधीनता स्वीकार कर ली थी, किन्तु सन्धि के अनुसार टकोली देने में सदैव उदासीनता ही बरती थी. इस प्रकार उसका पुत्र महिपालदेव भी भोंसलों से चिढ़ता था तथा भोंसलों से अनेक स्मरणपत्रों व संदेशों के बावजूद उसने टकोली की रकम नहीं थी. उसने अपने आपको स्वतन्त्र घोषित किया तथा रतनपुर के भोंसला शासक नानासाहेब या व्यंकोजी के पास स्पष्ट रूप से यह संदेश भिजवा दिया कि बस्तर लुटेरे भोंसलों की अधीनता स्वीकार नहीं करता.

व्यंकोजी भोंसला ने बस्तर के राजा को दबाने के लिए अपने सर्वाधिक शक्तिशाली मुसाहिब रामचन्द्र बाघ को आदेश दिया. एक दिन कांकेर राज्य पर एकाएक मराठों का आक्रमण हुआ. कांकेर का राजा पराजित हुआ तथा उसे निकट के एक गाँव में शरण लेनी पड़ी.

रामचन्द्र बाघ कांकेर राज्य को रौंदता हुआ बस्तर की राजधानी जगदलपुर पहुँच गया. अकस्मात् आक्रमण के कारण प्रारम्भ में बस्तर की सेना के पैर उखड़ गए तथा जगदलपुर के किले पर भोंसलों का अधिकार हो गया.


किन्तु बस्तर राजा महिपालदेव ने आदिवासियों की सेना को संगठित कर पुनः मराठों पर आक्रमण कर दिया तथा किले को छीन लिया व रामचन्द्र बाघ अपने शेष सेना के साथ जंगल की ओर भाग गया. उसने इस बार रायपर तथा रतनपर से अत्यधिक संख्या में भोंसला सैनिकों को बुलाया तथा अपनी सेना को सुदृढ़ कर लेने के पश्चात् संगठित होकर पुनः जगदलपुर किले पर धावा बोल दिया. इस बार आदिवासियों की सेना पराजित हुई तथा महिपालदेव को पुनः भोंसलों की अधीनता का सत्यनिष्ठ वचन देना पड़ा.

बस्तर के सिहावा परगने पर भोसलों का स्वामित्व-

1809 ई. में भोंसला आक्रमण के पश्चात् महिपालदेव पर अनेक वर्षों का उपहार बकाया था, जो उसे टकोली के रूप में प्रतिवर्ष नागपुर शासन को देना पड़ता था. इस बकाया राशि के बदले 1830 ई. में महिपालदेव ने सिहावा-परगना नागपुर शासन के सुपुर्द कर दिया.

परलकोट विद्रोह

भूपालदेव (1842-53 ई.)-

महिपालदेव के दो पुत्र थे-भूपालदेव तथा दलगंजन सिंह. भूपालदेव पटरानी का पुत्र था तथा उसका सौतेला भाई दलगंजसिंह छोटी रानी की सन्तान था. अतएव महिपालदेव की मृत्यु के पश्चात् भूपालदेव ने छत्तीस वर्ष की अवस्था में 1842 ई. में शासन की बागडोर सम्भाली. भूपालदेव ने बस्तर राजसिंहासन पर अभिषेक के अनंतरदलगंजनसिंह को तारापुर परगने का अधिकारी बना दिया, क्योंकि भूपालदेव की तुलना में दलगंजनसिंह अपने सदाचरण और पराक्रम के कारण बस्तर की आदिवासी जनता में लोकप्रिय था तथा भूपालदेव उससे सदा भयभीत रहता था. कालान्तर में दोनों भाइयों में पारस्परिक संघर्ष होता रहा.


नरबलि के उन्मूलन का प्रयास

ब्लण्ट, एगन्यू तथा जेन्किन्स के यात्रा विवरण व प्रतिवेदनों के आधार पर तधुगीन मराठा शासन में यह बात कुख्यत हो चली थी कि शंखिनी तथा इंकिनी नामक नदियों के संगम पर स्थित दन्तेवाड़ा के दन्तेश्वरी मन्दिर में नरबलि की एक क्रूर प्रथा विद्यमान थी. इस प्रकार की नरबलि का अन्त ओडिशा के गुमसर तथा कालाहांडी क्षेत्रों में अंग्रेज शासन ने 1842 ई.से पूर्व करा दिया था.

अंग्रेजों ने मराठा शासन को आदेश देकर उसके अधीनस्थ बस्तर राज्य में प्रचलित नरबलि को बन्द करवाने हेतु 1842 ई. में मन्दिर के चारों ओर भोंसला सुरक्षा सैनिकों की एक टोली नियुक्त करा दी. इस प्रकार की नरबलि के कुप्रचलन के सम्बन्ध में मराठा शासन ने जब भूपालदेव पर अभियोग लगाया था, तो उसनेअनभिज्ञता प्रदर्शित की थी तथा यह वचन दिया था कि यदि ऐसी कुरीति विद्यमान है, तो उसे शीघ्र ही समाप्त कर दिया जाएगा. टकोली लेने के अतिरिक्त यह प्रथम अवसर था जब 1842 ई. में मराठों ने बस्तर पर हस्तक्षेप किया था.

मैकफर्सन’को ब्रिटिश शासन ने उन क्षेत्रों में प्रचलित नरबलि की जाँच के लिए नियुक्त किया था, जो बस्तर से संलग्न थे, इस सम्बन्धमें मैकफर्सन ने जो प्रतिवेदन प्रस्तुत किया था. उसके अनुसार ‘ताड़ी पेन्नु’ या ‘माटीदेव’ की पूजा में प्रमुख संस्कार नरबलिका है. इसे यहाँ की जनजातियाँ एक सार्वजनिक उत्सव के रूप में आयोजित करती थीं तथा इसका आयोजन विशेष अवधिमें होता था. अपवाद स्वरूप यदा कदा लोगों में अत्यधिक रोगाक्रान्त होने से जब अकाल, मृत्यु से मरने वालों की संख्या बढ़जाती थी या जनजातिक मुखिया के परिवार में कोई अप्रत्याशित आपदा आ पड़ती थी, उस समय इसका आयोजन निरवधिकहोता है. नरबलि के निमित्त वध्य लोगों को मेरिआ’ कहा जाता है. खोंड जनजाति में नरबलि के निमित्त वध्यजनों की पूर्तिका कार्य पावों एवं गहिंगा जनजातियों द्वारा किया जाता था.

तारापुर विद्रोह (1842-54 ई.)

मेरिया विद्रोह (1842-63 ई.)

बस्तर में ब्रिटिश राज (1854-1947 ई.)

भैरमदेव (1853-91 ई.)-

भूपालदेव के पुत्र भैरमदेव का जन्म 1839 ई. में हुआ था तथा वे तेरह वर्ष की अवस्था में 1853 ई. में राजसिंहासन पर बैठे. भैरमदेव के राजसिंहासनाधिरूढ़ होते ही बस्तर ब्रिटिश साम्राज्य में चला गया. ब्रिटिश शासन ने भैरमदेव को शासन का अधिकार दे दिया.

रानी चोरिस (1878-86 ई.) : छत्तीसगढ़ की प्रथम विद्रोहिणी-

पटरानी जुगराज कुंअर ने 1878 में अपने पति राजा भैरमदेव के विरुद्ध सशक्त विरोध प्रारम्भ किया था. इस विचित्र किस्म के विद्रोह से बस्तर के आदिवासी दो खेमों में बँट गए थे. यह विद्रोह आठ वर्षों तक चला और बस्तर के लोग आज भी इसे ‘रानी चोरिस’ के रूप में जानते हैं. यह विद्रोह आदिवासियों से सम्बद्ध नहीं था. यह एक सफल विद्रोह था और विद्रोहिणी महिला अन्त में विजयिनी होकर उभरी. अंग्रेजों ने अपने प्रतिवेदनों में इसे विद्रोह की संज्ञा दी है,

रुद्रप्रतापदेव (1891-1921 ई.)-

भैरवदेव की 28 जुलाई, 1891 में मृत्यु के समय रुद्रप्रतापदेव 6 वर्ष के थे. उनका जन्म 1885 ई. में हुआ था. ब्रिटिश शासन ने यद्यपि रुद्रप्रतापदेव को उत्तराधिकारी स्वीकार कर लिया था, तथापि उनकी अल्पवयस्कता में पहली नवम्बर 1891 से 1908 तक बस्तर का शासन अंग्रेज प्रशासकों के ही अधिकार में था. रुद्रप्रतापदेव की शिक्षा-दीक्षा रायपुर के राजकुमार कालेज में हुई थी, भैरवदेव की मृत्यु के समय बस्तर में दीवान पद पर आलमचन्द्र कार्यरत था तथा उसके पश्चात् उत्कल ब्राह्मण रामचन्द्रराव मिश्र दीवान होकर आया. इसके पश्चात् 1896 ई. से आठ वर्ष दो यूरोपीय अधिकारी फैगन तथा गेयर क्रमशः प्रशासन के पद पर कार्य करते रहे,

रुद्रप्रतापदेव का राज्याभिषेक-

तेईस वर्ष की अवस्था में सन् 1908 ई. में रुद्रप्रतापदेव को बस्तर के करद राजा के रूप में अभिषिक्त किया गया था. रुद्रप्रतापदेव का कोई पुत्र नहीं था. उनकी मृत्यु 16 नवम्बर, 1921 के बाद प्रथम रानी चन्द्रकुमारीदेवी से उत्पन्न महारानी प्रफुल्लकुमारी देवी (1921-1936 ई.) को उत्तराधिकारिणी स्वीकार किया गया. प्रफल्लकुमारी का मयूरभंज के गुजारेदार प्रफुल्लचन्द्र भंजदेव से जनवरी 1925 में विवाह हुआ, इसी के साथ बस्तर के चालुक्य वंश का अवसान हो गया, क्योंकि महारानी के पुत्र को मूलतः ‘भंज वंश’ के हुए.

राजा रुद्रप्रतापदेव के समय बस्तर में कई निर्माण कार्य हुए. राजा रुद्रप्रतापदेव पुस्तकालय बनी, जगदलपुर की टाउन प्लानिंग के अनुसार ‘चौराहों का शहर’ बनाया गया. कई मन्दिर बनवाने का कार्य रुद्रप्रतापदेव के काल में हुआ, आवागमन के लिए सड़कें बनीं. सन् 1900 में वन्दोबस्त हुआ. तत्कालीन रायबहादुर पण्डा बैजनाथ ने वनों को आरक्षित किया. बस्तर रियासत में अनिवार्य शिक्षा लागू कर दी गयी. इन सभी कार्यों का श्रेय ब्रिटिश प्रशासकों फैगन (1896-1903 ई.) एवं गेयर (1899-1903 ई.) को है, जिन्होंने आठ वर्षों में बस्तर राज्य की विशेष उन्नति की.

रुद्रप्रतापदेव को ‘सेंट ऑफ जेरुसलम’ की उपाधि

महाराज रुद्रप्रतापदेव दया, धर्म, सत्यता, महानशीलता, वाकपटुता और परोपकारिता के अवतार थे. यूरोपीय महायुद्ध में उन्होंने ब्रिटिश शासन की अत्यधिक सहायता की थी. इससे भारत शासन ने उन्हें ‘सेंट आफ जेरुसलम’ जेरुसलम का सन्त (ईसा मसीह) की उपाधि दी थी.

राजा रुद्रप्रतापदेव की मृत्यु 16 नवम्बर, 1921 में हुई. प्रजा के विशेष आग्रह पर अंग्रेजों ने उनकी पुत्री राजकन्या प्रफुल्लकुमारी देवी, जो 12 वर्ष की नाबालिग थीं, को राजसत्ता का अधिकार दिया. 28 फरवरी, सन् 1936 में उनकी मृत्यु होने पर उनके पुत्र प्रवीरचन्द्र भंजदेव ने राजगद्दी संभाली. सन् 1947 में देश स्वतन्त्र होने के पश्चात् बस्तर रियासत का भी भारतीय संघ में 1948 को विलय हो गया,

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