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सरगुजा के रामगढ़ की ऐतिहासिकता

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रामगढ़ (ऐतिहासिक स्थल )

संभागीय मुख्यालय बिलासपुर से 205 किलोमीटर की दूरी तथा जिला मुख्यालय अम्बिकापुर से 45 किलोमीटर की दूरी पर यह ऐतिहासिक स्थल स्थित है.

रामगढ़ की ऐतिहासिकता

उपलब्ध साक्ष्यों से पता लगता है कि यह ऐतिहासिक दृष्टि से छत्तीसगढ़ का प्राचीनतम् स्थल है. यहाँ उपलब्ध चिह्न इस बात के प्रमाण हैं कि यहाँ कभी बहुत ही शिक्षित, सभ्य एवं कला प्रेमी लोग रहा करते थे, इसे रामगिरी भी कहते हैं. इस स्थल का वर्णन ब्रिटिशकालीन ‘स्टेटिस्टिकल एकाउंट ऑफ बंगाल’ (भाग-17) तथा ‘छत्तीसगढ़ प्यूडेटरी गजेटियर’ और कनिंघम के आर्कयोलॉजिकल सर्वे रिपोर्ट भाग 13 में मिलता है. प्रचलित कथाओं के अनुसार श्री रामचन्द्र वनवास की अवधि में यहाँ रुके थे. रामगढ़ की पहाड़ी पर स्थित अनेक मंदिर, खण्डहर, गुफाएं तथा अनेक मूर्तियाँ हैं. सबसे अधिक महत्वपूर्ण पहाड़ी के शिखर पर स्थित मौर्यकालीन सीता बंगरा, जोमीमारा गुफा, लक्ष्मण (गुफा) बंगरा विशिष्ट गुफा आदि हैं. इन गुफाओं की खोज शिकार के दौरान कर्नल आउस्ले (1848) ने की थी तथा जर्मन डॉ. ब्लाश (1904) ने इसे आर्कयोलॉजिकल सर्वे की रिपोर्ट में प्रकाशित कराया.

रामगढ़ का किला एवं वशिष्ट गुफा (ऐतिहासिक, पुरातात्विक)

वर्तमान में यह किला जीर्ण अवस्था में है तुर्रा स्थान से एक किलोमीटर दूर समतल सतह पर चलने के बाद पर्वत की खड़ी चढ़ाई कर ऊपर पहुंचने पर प्राचीन काल का कलापूर्ण फाटक मिलता है जहाँ पर देवन गुरु की खंडित मूर्ति शिवलिंग को प्रणाम करती हुई मिलती है. किले में कवि चौरा नामक स्थान है, जो योगी धरमदास का स्थल है. आगे वशिष्ट गुफा मिलती है, जहाँ मुनि वशिष्ट ने तपस्या की थी. किले के ऊपरी हिस्से में तीन मंदिरों के अवशेष मिलते हैं जहाँ सरस्वती और झागरा खांडदेवी का पवित्र स्थल है तथा एक विष्णु मंदिर है जिसका कलात्मक सौंदर्य अद्वितीय है. मंदिर में सर्वप्रथम भगवान् विष्णु की प्रतिमा जिसके पार्श्व में ब्रह्माणी, नारायणी, दाहिनी ओर वरुण देव, नीचे पंचदेवों की मूर्तियाँ तथा अन्य मूर्तियाँ-ब्रह्मचारणी देवी, भगवान् लक्ष्मण अर्थात् शेषशायी की, राम-सीता की, जिनके चरणों पर हनुमानजी भक्त रूप में प्रकट हैं, आदि हैं. इसी पर्वत शिखर पर एक प्राचीन तालाब है जिसका जल दैनिक जीवन में उपयोग में लाया जाता है. वहाँ एक अन्य स्थान चंदन माटी के नाम से प्रसिद्ध है, जोकि प्रमागि नदी का उद्गम स्थल है. इसके अलावा रामगढ़ पर्वत में झपिबेंगरा, फूलसुंदरी बेंगरा एवं दरबार गुफा आदि स्थल हैं जहाँ कभी तपस्वी तपस्या करते थे

रामगढ़ इतिहासकारों के विभिन्न मत

रामगढ़ का इतिहास घने वनों के बीच में यातायात की सुविधा न होने के कारण सिमटकर रह गया है. पुरातत्ववेत्ताओं ने विशेष ध्यान देते हुये रामगढ़ के इतिहास को निम्नलिखित रूपों में प्रतिपादित किया 1. महाकवि कालिदास कृत मेघदूत में वर्णित रामगिरी पर्वत को रामगढ़ से सम्बध किया गया. 2. वनवास काल में रामचन्द्र इसी रास्ते से गुजरे थे और कुछ दिनों तक उन्होंने रामगढ़ पर्वत पर निवास किया था, जिसके प्रमाण सीता बंगरा और लक्ष्मण गुफा है. 3. देवदासी ‘सुतनुका’ के प्रेम-प्रसंग को रूपदत्त ‘देवदीन’ से सम्बद्ध कर इस गुफा में उनकी स्मृतियों की रचना होना बताया गया है. 4. कुछ विद्वानों ने इसे मौर्य तथा बौद्धकालीन माना है. इस स्थान को नाट्यशाला या रंगमंच के नाम से सम्बोधित किया है. रामगढ़ के प्रत्येक शिलालेख को अलग-अलग स्वरूपों से देखा जाये, तो उसमें रामायण. बौद्ध और महावीरकालीन इतिहास परिलक्षित होता है. ऐसी मान्यता है कि मौर्य और बौद्धकालीन घटनाक्रमों के कारण ही रामकाल में निर्मित यह गुफा उपेक्षित रही और भग्नावस्था को पहुँच गई. रामगढ़ पर्वत स्थानीय जन-भावना में धार्मिक स्थान के रूप में आदिकाल से पूज्य बना हुआ है.

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