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छत्तीसगढ़ की गोंड जनजाति

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छत्तीसगढ़ की गोंड जनजाति

गोंड जनजाति भारत की एक प्रमुख जनजाति है. भारत के कटि प्रदेश – विंध्यपर्वत, सतपुड़ा पठार, छत्तीसगढ़ मैदान में दक्षिण तथा दक्षिण-पश्चिम – में गोदावरी नदी तक फैले हुए पहाड़ों और जंगलों में रहनेवाली आस्ट्रोलायड नस्ल तथा द्रविड़ परिवार की एक जनजाति, जो संभवत: पाँचवीं-छठी शताब्दी में दक्षिण से गोदावरी के तट को पकड़कर मध्य भारत के पहाड़ों में फैल गई. गोंडों की भाषा गोंडी है जो द्रविड़ परिवार की है.

गोंड देवी- देवता और धर्म –

  1. बड़ादेव (सृजन करने वाली शक्ति), दुल्हा दुल्ही देव (शादी विवाह सूत्र में बाँधने वाला देव), पंडा पंडिन (रोग दोष का निवारण करने वाला देव), बूड़ादेव (बूढाल पेन) कुलदेवता या पुरखा, जिसमे उनके माता पिता को भी सम्मिलित किया जाता है, नारायण देव (सूर्य) और भीवासू गोंडों के मुख्य देवता हैं.
  2. इनके अतिरिक्त ग्रामों में ग्राम देवता के रूप में खेरमाई (ग्राम की माता), ठाकुर देव, खीला मुठ्वा, नारसेन (ग्राम की सीमा पर पहरा देने वाला देव), ग्राम के लोगों की सुरक्षा, फसलों की सुरक्षा, पशुओं की सुरक्षा, शिकार, बीमारियों और वर्षा आदि के भिन्न भिन्न देवी देवता हैं.
  3. इन देवताओं को बकरे और मुर्गे आदि की बलि देकर प्रसन्न किया जाता है.
  4. गोंडों का भूत प्रेत और जादू टोने में अत्यधिक विश्वास है और इनके जीवन में जादू टोने की भरमार है.
  5. अनेक गोंड लंबे समय से हिंदू धर्म तथा संस्कृति के प्रभाव में हैं और कितनी ही जातियों तथा कबीलों ने बहुत से हिंदू विश्वासों, देवी देवताओं, रीति रिवाजों तथा वेशभूषा को अपना लिया है.
  6. पुरानी प्रथा के अनुसार मृतकों को दक्षिण दिशा की ओर सिर रखकर दफनाया जाता है. मृतक संस्कार में गोंड तीसरे दिन कोज्जी मनाते हैं तथा दसवें दिन कुण्डा मिलान संस्कार होता है.
  7. गोंडों के प्रमुख पर्व नवाखानी, बिदरी, बकपंथी, जवारा, मड़ई, छेरता, लारूकाज आदि हैं.
  8. गोंडों के प्रमुख नृत्य करमा, सैला, भड़ौनी, बिरहा, कहरवा, सजनी, सुआ, दीवानी, गेंडी आदि हैं.

विवाह संबंध –

  1. आस्ट्रोलायड नस्ल की जनजातियों की भाँति विवाह संबंध के लिये गोंड भी सर्वत्र दो या अधिक बड़े समूहों में बंटे रहते हैं. एक समूह के अंदर की सभी शांखाओं के लोग ‘भाई बंद’ कहलाते हैं और सब शाखाएँ मिलकर एक बहिर्विवाही समूह बनाती हैं.
  2. विवाह के लिये लड़के द्वारा लड़की को भगाए जाने की प्रथा है. विवाह पूरे ग्राम समुदाय व्दारा संपन्न होता है. ऐसे अवसर पर कई दिन तक सामूहिक भोज और सामूहिक नृत्यगान चलता है. वधूमूल्य की प्रथा है और इसके लिए बैल तथा कपड़े दिए जाते हैं.
  3. ममेरे-फुफेरे भाई-बहनों में विवाह मान्य है जिसे दूध लौटाना कहते हैं.

खेती –

  1. गोंड खेतिहर हैं और परंपरा से दहिया खेती करते हैं जो जंगल को जलाकर उसकी राख में की जाती है और जब एक स्थान की उर्वरता तथा जंगल समाप्त हो जाते हैं तब वहाँ से हटकर दूसरे स्थान को चुन लेते हैं. किंतु सरकारी निषेध के कारण यह प्रथा बहुत कम हो गई है.
  2. समस्त गाँव की भूमि समुदाय की संपत्ति होती है और खेती के लिये व्यक्तिगत परिवारों को आवश्यकतानुसार दी जाती है.

इतिहास

  1. 15वीं से 17वीं शताब्दी के बीच गोंडवाना में अनेक गोंड राजवंशों का दृढ़ और सफल शासन स्थापित था.
  2. इन शासकों ने बहुत से दृढ़ दुर्ग, तालाब तथा स्मारक बनवाए और सफल शासकीय नीति तथा दक्षता का परिचय दिया.
  3. इनके शासन की परिधि मध्य भारत से पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार तक पहुँचती थी.
  4. 15 वीं शताब्दी में चार महत्वपूर्ण गोंड साम्राज्य थे, जिसमें खेरला, गढ मंडला, देवगढ और चाँदागढ प्रमुख थे.
  5. गोंड राजा बख्त बुलंद शाह ने नागपुर शहर की स्थापना कर अपनी राजधानी देवगढ से नागपुर स्थानांतरित किया था.
  6. गोंडवाना की प्रसिध्द रानी दुर्गावती गोंड राजवंश की रानी थी. रानी दुर्गावती के शौर्य गाथाओं को आज भी गोंडी, हल्बी व भतरी लोकगीतों में बड़े गर्व के साथ गया जाता है.
  7. राजा संग्राम शाह गोंड साम्राज्य के पराक्रमी राजाओं में से एक थे, जिन्होंने अपने पराक्रम के बल पर राज्य का विस्तार व नए-नए किलों का निर्माण किया. 1541 में राजा संग्राम की मृत्यु पश्चात् कुंवर दल्पतशाह ने पूर्वजों के अनुरूप राज्य की विशाल सेना में इजाफा करने के साथ-साथ राज्य का सुनियोजित रूप से विस्तार व विकास किया.
  8. गोंड धर्मं की स्थापना पारी कुपार लिंगो ने शम्भूशेक के युग में की थी. गोंडी धर्मं कथाकारों के अनुसार शम्भूशेक अर्थात महादेवजी का युग देश में आर्यों के आगमन से पहले हुआ था. महादेवों की 88 पीढ़ियों का उल्लेख गोंडी गीत (पाटा), कहानी, किस्से में मौखिक रूप से मिलते हैं. महादेवों की 88 पीढ़ी में प्रथम पीढ़ी शंभू-मूला मध्य पीढ़ी में शंभू-गौरा एवं अंतिम पीढ़ी में शंभू-पार्वती का नाम आता है. प्रमुखतः शंभू-मूला, शंभू-गोंदा, शंभू-सय्या, शंभू-रमला, शंभू-बीरो, शंभू-रय्या, शंभू-अनेदी, शंभू-ठम्मा, शंभू-गवरा, शंभू-बेला, शंभू-तुलसा, शंभू-आमा, शंभू-गिरजा, शंभू-सति आदि तथा अंत में शंभू-पार्वती की जोड़ी का उल्लेख मिलता है. इन महादेवों की पीढ़ी के साथ अनेक लिंगों (धर्म गुरुओं) की गाथाएं भी मिलती है.

गोंडी भाषा

  1. गोंडी धर्मं दर्शन के अनुसार गोंडी भाषा का निर्माण आराध्य देव शम्भू शेक के डमरू से हुआ है, जिसे गोएन्दाणी वाणी या गोंडवाणी कहा जाता है.
  2. अति प्राचीन भाषा होने की वजह से गोंडी भाषा अपने आप में पूरी तरह से पूर्ण है.
  3. गोंडी भाषा की अपनी लिपि है, व्याकरण है जिसे समय-समय पर गोंडी साहित्यकारों ने पुस्तकों के माध्यम से प्रकाशित किया है.

छत्तीसगढ़ में गोंड जनजाति

जनसंख्या की दृष्टि से ये राज्य की सबसे बड़ी जनजाति है. ये बस्तर, दंतेवाड़ा, नारायणपुर, कोंडागांव, कांकेर, सुकमा,जांजगीर-चंपा और दुर्ग जिले में पाये जाते हैं. गोंड तथा उसकी उपजातियां स्वयं की पहचान ‘कोया’ या ‘कोयतोर शब्दों से करती है जिसका अर्थ ‘ मनुष्य’ या ‘पर्वतवासी मनुष्य’ है. आजादी के पूर्व छत्तीसगढ़ राज्य के अंतर्गत आने वाली 14 रियासतों में 4 रियासत क्रमशः कवर्धा, रायगढ़, सारंगढ एवं शक्ति गोंड रियासत थीं.

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