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छत्तीसगढ़ का स्वर्ण युग [Golden Age of Chhattisgarh]

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छत्तीसगढ़ का स्वर्ण युग

सोमवंश के शासक, महाशिवगुप्त बालार्जुन का लगभग तेरह सौ साल पुराना इतिहास छत्तीसगढ़ का स्वर्ण युग माना जाता है. इस मान्यता पर मुहर तब लगी. जब सिरपुर से इस शासक के 27 ताम्रपत्रों (9 सेट) की निधि एक साथ मिली. किसी एक ही शासक के इतने प्राचीन ताम्रलेख इस तादाद में अब तक कहीं प्राप्त नहीं हुए हैं (महाशिवगुप्त की जानकारी के अनुसार इस निधि में ताम्रपत्रों की संख्या इससे भी अधिक थी). यह प्राप्ति केवल संख्या की दृष्टि से ही उल्लेखनीय नहीं है, बल्कि यह तत्कालीन छत्तीसगढ़ के स्वर्ण युग की गौरव गाथा का अमूल्य अभिलेख है.

का प्राचीन इतिहास Ancient History of Chhattisgarh छत्तीसगढ़ का स्वर्ण युग [Golden Age of Chhattisgarh]
छत्तीसगढ़ का प्राचीन इतिहास

महाशिवगुप्त बालार्जुन

महाशिवगुप्त बालार्जुन, सोमवंश में उत्पन्न हुआ और वंशानुगत वैष्णव धर्म से भिन्न शैव धर्म के सोम सम्प्रदाय का अनुयायी बनकर, अपने पूर्वजों के विपरीत स्वयं को परम भागवत के बदले परम माहेश्वर कहने लगा, किन्तु उसके राजत्व काल में माता वासटा द्वारा बनवाया गया विष्णु मन्दिर, जो अब सिरपुर के लक्ष्मण मन्दिर के नाम से जाना जाता है और बौद्ध आचार्यों को उसके द्वारा दिये गये दान से, उसकी धार्मिक सहिष्णुता का परिचय मिलता है.

वासटा के सिरपुर शिलालेख की प्रशस्ति, अतिशयोक्ति पूर्ण होगी, किन्तु उससे इस महान शासक के सदगुणों, क्षमता और शक्ति का साफ अनुमान जरूर होता है. महाशिवगुप्त बालार्जुन के सिरपुर ताम्रपत्र निधि के अलावा बरदुला, बोंडा, लोधिया से एक एक तथा मल्हार से तीन तामलेख, सेनकपाट और मल्हार शिलालेख के साथ-साथ सिरपुर से विभिन्न शिलालेख प्राप्त हुए हैं. मल्हार (वस्तुतः जुनवानी) से प्राप्त अब तक ज्ञात उसके अन्तिम 57वें राज्यवर्ष के ताम्रलेख में महत्वपूर्ण ऐतिहासिक सूचनाओं सहित, अत्यन्त रोचक विवरण आता है, जिसमें भूमिदान, हाथ के माप के पैमाने से दिया गया है.

सिरपुर ताम्रपत्र निधि से मिलने वाली ऐतिहासिक जानकारी के साथ ही तत्कालीन राजधानी श्रीपुर में राज परिवार के सदस्यों द्वारा दिये गये दान का जिक्र है और यहाँ शैव सम्प्रदाय की अत्यन्त महत्वपूर्ण शाखा का पता चलता है. निःसंदेह महाशिवगुप्त वालार्जुन इन्हीं शैव सोम सम्प्रदाय के आचार्यों से दीक्षित होकर ‘परम् महेश्वर’ की उपाधि का धारक बना होगा.

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