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कवर्धा का फणिनाग वंश [ Funinag dynasty of Kawardha]

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कवर्धा का फणिनाग वंश

छत्तीसगढ़ के कवर्धा क्षेत्र में एक और नागवंश राज्य कर रहा था, जो फणिनागवंश के नाम से प्रख्यात था. कवर्धा से लगभग 16 किमी की दूरी पर स्थित मड़वा महल नामक मन्दिर से विक्रम संवत् 1406 अर्थात् 1349 ई. का एक शिलालेख मिला है. इससे ज्ञात होता है कि राजा रामचन्द्र ने यहाँ एक शिव मन्दिर का निर्माण कर उसके लिये कुछ ग्राम दान में दिये थे.

रामचन्द्र का विवाह कलचुरि राजकुमारी अम्बिका देवी से हुआ था. मड़वा महल अभिलेख में फणिनाग वंश परम्परा में अहिराज को नागों का सर्वप्रथम राजा बताया गया है. इसके तथा रामचन्द्र के मध्य राज्य करने वाले लगभग 24 राजाओं के नाम दिये गये हैं. छपरी से प्राप्त एक प्रतिमा लेख में राणक गोपालदेव का नाम तथा संवत् 840 का उल्लेख है. यदि हम इसे चेदि संवत् (कलचुरि संवत्) मान लें, जो ई. 249 से आरम्भ होता है, तो मन्दिर का काल 840 + 249 = 1089 ई. निर्धारित होता है. मड़वा महल अभिलेख में वर्णित छठवें राजा गोपालदेव से इसका तादात्म्य स्थापित किया जाता है.

इस तरह गोपालदेव रतनपुर के राजा जाजल्लदेव प्रथम (1090-1120 ई.) के काल में उसके अधीन शासन कर रहा था. छपरी से ही प्राप्त एक प्रतिमा लेख में राजा लक्ष्मणदेव एवं उसके पुत्र राम का उल्लेख मिलता है, जिसका तादात्म्य 24वें राजा रामचन्द्रदेव (1349 ई.) से स्थापित किया जाता है.

कलचुरियों की रायपुर शाखा के शासक ब्रह्मदेव (1402-14 ई.) ने फणिनांग वंशी राजा मोनिंगदेव को हराया था. इस प्रकार यह स्पष्ट है कि इस वंश ने लम्बे समय तक इस क्षेत्र में राज्य किया एवं चौदहवीं शताब्दी तक यहाँ इनका प्रभुत्व बना रहा. यह वंश कलचुरियों की अधिसत्ता को स्वीकार करता था. यह वंश गढमंडला के राज्य एवं कलचुरियों के मध्य एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में विद्यमान था.

भोरमदेव मन्दिर

‘मड़वा महल’ एवं ‘भोरमदेव’ इस वंश की कला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं.

भोरमदेव सम्भवतः एक आदिवासी देवता है, जिनको समर्पित इस मन्दिर का निर्माण राजा गोपालदेव द्वारा ही 1089 ई. के आस-पास करवाया गया था, जबकि मड़वा महल, जिसे दुल्हादेव भी कहा जाता है, वस्तुतः विवाह मंडप था, का निर्माण राजा रामचन्द्रदेव द्वारा 1349 ई. में करवाया था. भोरमदेव छत्तीसगढ़ को नाग वंशी राजाओं की एक महत्वपूर्ण देन है, जो 9वीं-10वीं शताब्दी में निर्मित खजुराहो के मन्दिरों से प्रेरित चंदेलशैली (नागरशैली) में निर्मित वास्तुकला का उदाहरण है.

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