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छत्तीसगढ़ में वन संसाधन

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छत्तीसगढ़ में वन

मराठा काल में वनों का कोई व्यवस्थित प्रबन्ध नहीं किया जाता था. वनोपज आवश्यकतानुसार जमींदारों के माध्यम से प्राप्त किया जाता था. साथ ही वनोपज का व्यापार विकसित नहीं था. अंग्रेजी शासनकाल में पृथक् वन विभाग की स्थापना की गयी जिसका सर्वोच्च अधिकारी डिविजनल फॉरेस्ट आफिसर होता था जिसका मुख्यालय रायपुर था. छत्तीसगढ़ आरम्भ से ही वन सम्पदा हेतु विख्यात रहा है.

वनाधिक्य और विविध वनोपज एवं वन्य प्राणी यहाँ की विशेषता रही है. ये वन राजस्व वृद्धि के स्रोत रहे हैं. अतः सरकार ने इसके विकास में विशेष ध्यान दिया. इसके लिए वन महकमे में अनेक अधिकारियों एवं कर्मचारियों की नियुक्ति की गयी.

सन् 1878 ई. में वन अधिकारियों को वन शिक्षा एवं प्रशिक्षण देने हेतु देहरादून में एक विद्यालय की स्थापना की गयी. सन् 1894 ई. में ‘लाई एल्गिन द्वितीय’ के काल में प्रथम भारतीय वन नीति का निर्माण किया गया. विभाग द्वारा वन संरक्षण, वनवर्धन, इनके सीमांकन एवं व्यवस्थित विदोहन का कार्य प्रथम बार आरम्भ किया गया.

वन क्षेत्रों के प्रमाणिक मानचित्र का निर्माण भी किया गया. व्यवस्थित प्रबन्ध हेतु व्यवस्थित कार्य योजना बनाई जाती थी, जो निर्धारित समय सीमा के बाद पुनरीक्षित की जाती थी. वन भूमि व्यवस्थापन का कार्य भी आरम्भ किया गया. आज के व्यवस्थित वन प्रबन्ध का स्वरूप अंग्रेजों की ही देन है.

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