छत्तीसगढ़ में 1857 क्रान्ति का प्रभाव

छत्तीसगढ़ में 1857 क्रान्ति का प्रभाव

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जब 1854 ई. में छत्तीसगढ़ का क्षेत्र ब्रिटिश साम्राज्य का अंग बन गया तब यहाँ किसी विद्रोह की सूचना नहीं मिली, पर अधिकारियों की गलत नीतियों के कारण यह शान्तिमय क्षेत्र भी आन्दोलित हो उठा. उत्तर भारत में विप्लव फैलने के साथ ही छत्तीसगढ़ में भी विद्रोह की आग की लपटें पहुँची. इस समय राष्ट्रीय थल सेना की तीसरी टुकड़ी का मुख्यालय नागपुर में ही था और उसका शेष भाग बिलासपुर में अरपा नदी के किनारे (आज के विश्वविद्यालय के पीछे बने बैरक में) स्थित था. मई 1857 में मेरठ में हुए विद्रोह का पता छत्तीसगढ़ में स्थित सेना को भी चला, परिणामतः सेना की टुकड़ियों में असंतोष की भावना जागृत हो उटी और शताब्दियों से शान्ति प्रिय अलग-थलग क्षेत्र भी धधक उठा.

देशव्यापी इस अशांति की प्रतिक्रिया छत्तीसगढ़ में भी परिलक्षित होने लगी. सितम्बर 1857 ई. तक यह प्रतिक्रिया यहाँ अपने चरम पर पहुँच गई, फलस्वरूप रायपुर में पदस्थ डिप्टी कमिश्नर ने मुख्यालय नागपुर के कमिश्नर के आग्रह पर त्वरित कार्यवाही हुई. जिसमें नागपुर कमिश्नर ने मद्रास स्थित अंग्रेज अधिकारियों को तार से सूचना प्रेषित कर बहरामपुर से सेना की पाँच टुकड़ियों को तत्काल रायपुर प्रस्थान करने का सन्देश भेजा, ताकि आवश्यकतानुसार यहाँ किसी अप्रिय स्थिति से निपटा जा सके.

अंग्रेजों के इस क्षेत्र में विप्लव सम्बन्धी भय का नागपुर कमिश्नर के द्वारा मेजर जनरल ह्वाइट को 23 जनवरी, 1858 ई. को लिखे पत्र से पता चलता है जिसमें उसने लिखा था-“रायपुर जिले में यदि क्रान्ति भड़क उठी होती तो तत्सम्बन्धी क्षेत्रों के जमींदारों की जमींदारियों में भी, जिसके अन्तर्गत देश के पूर्वी और उत्तरी भाग तथा भण्डारा, चांदा की जमींदारी भी आती है तथा प्रान्त के पश्चिमी भाग को भी यह प्रभावित करती और यदि यह क्रान्ति इतने व्यापक पैमाने पर इतने कठिन और विकराल रूप में विकसित होती, तो एक विशाल सेना की आहूति के बिना इस पर नियन्त्रण स्थापित करनाअसम्भव हो जाता.” कमिश्नर का यहाँ के लिए ऐसा सोचना गलत नहीं था, शीघ्र ही छत्तीसगढ़ में संघर्ष आरम्भ हो गया और यहाँ भी जमींदारों एवं सैनिकों के विद्रोह हुए, जिनका संक्षिप्त विवरण यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है-

सोहागपुर में संघर्ष-

15 अगस्त, 1857 को गुरूरसिंह, रणमंतसिंह और संबलपुर के कुछ अन्य जमींदारों के नेतृत्व में एक विशाल संख्या में विद्रोही एकत्रित हुए तथा उत्तर की ओर एक विशाल संख्या में प्रविष्ट हुए, किन्तु तत्काल बाद ही रायपुर के डिप्टी कमिश्नर ने अपनी स्थानीय सेना के साथ सोहागपुर के पास इन विद्रोहियों पर आक्रमण कर दिया. इन विद्रोहियों का नेता सतारा के राजा का भूतपूर्व वकील रंगाजी बापू थे और सोहागपुर में इन विद्रोहियों की स्थिति मजबूत थी साथ ही उन्होंने रायपुर के जमींदारों को भी अपने झण्डे के नीचे एकत्रित होने का आह्वान किया था. डिप्टी कमिश्नर को यद्यपि पूर्ण सफलता नहीं मिली, पर इस विद्रोह को उसने आगे नहीं बढ़ने दिया.
छत्तीसगढ़ में हुआ विद्रोह संगठित नहीं था, इसी कारण इसका प्रभाव रायपुर शहर तक ही सीमित रहा. दूरस्थ क्षेत्रों तक विद्रोह न फैल सका.

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