Sahity.in से जुड़ें @WhatsApp @Telegram @ Facebook @ Twitter

छत्तीसगढ़ में शिक्षा व्यवस्था

Get real time updates directly on you device, subscribe now.

छत्तीसगढ़ में शिक्षा व्यवस्था

मराठा काल में छत्तीसगढ़ में शिक्षा व्यवस्था का कोई संगठित प्रबन्ध नहीं था. इस क्षेत्र में शिक्षा का प्रसार अल्प था. अंग्रेजी सत्ता की स्थापना के बाद इस दिशा में एक व्यवस्थित प्रयास आरम्भ हुआ. हिन्दी के साथ अंग्रेजी को भी शिक्षा का माध्यम बनाया गया. अंग्रेजों द्वारा सामुदायिक शिक्षा आरम्भ की गयी. इसके लिए विद्यालयों की स्थापना की गयी. साथ ही शासन द्वारा कन्याशालाओं की पृथक् स्थापना की गयी. 1864 ई. में रायपुर जिले में स्कूलों की संख्या 58 थी, जो 1897 ई. में बढ़कर 98 हो गयी. स्थानीय शासन एवं निजी संस्थाओं जैसे मिशन आदि द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में सराहनीय कार्य किए गए.

डलहौजी और कर्जन के कालों के मध्य शिक्षा में उल्लेखनीय प्रयास हुए जिसका प्रभाव छत्तीसगढ़ में भी पड़ा. इस अंचल में उच्च शिक्षा का आरम्भ अपेक्षाकृत विलम्ब से हुआ. इसके पूर्व माध्यमिक शिक्षा के अन्तर्गत काफी कार्य हुआ. 20वीं शताब्दी के आरम्भ में राष्ट्रीय शिक्षा की नीति पर बल दिया गया.

1910 ई. में स्वतंत्र शिक्षा विभाग की स्थापना हुई और इसे प्रांतीय शासन के अधीन किया गया. प्राथमिक शिक्षा का दायित्व जिला परिषद् व नगर पालिकाओं को सौंपा गया. रायपुर इस समय अंचल में शिक्षा का प्रमुख केन्द्र बन गया. रायपुर में राजकुमार कॉलेज की स्थापना 1893 ई. में हुयी जहाँ रियासतों, जमींदारों एवं धनाड्य वर्ग के छात्र अध्ययन करते थे. 1907 ई. में सालेम् कन्याशाला अंग्रेजी माध्यम में आरम्भ हुयी. 1911 ई. में सेंटपाल स्कूल खुला. 1913 ई. में लॉरी स्कूल आरम्भ किया गया तथा 1925 ई. में कालीबाड़ी संस्था की नींव डाली गयी. अमेरिकन मेनोनाइट मिशन द्वारा रायपुर और धमतरी में शिक्षण संस्थाएँ आरम्भ की गयीं.

असहयोग आन्दोलन के दौरान रायपुर में राष्ट्रीय विद्यालय की स्थापना की गई. इसके लिए भवन सेठ गोपीकिशन, बालकिशन एवं रामकिशन ने दिया. इसका संचालन बामन राव लाखे ने किया. यह विद्यालय आज भी कार्यरत् है. 1937 ई. में प्रथम निर्वाचित प्रांतीय सरकार मध्यप्रांत में स्थापित हुई, जिसमें प्रथम मुख्यमंत्री श्री एन. जी. खरे हुए तथा शिक्षा मंत्री पं. रविशंकर शुक्ल बनाए गए. इस पद पर रहकर उन्होंने ‘विद्यामंदिर योजना’ आरम्भ की, जिसमें प्राथमिक शिक्षा को स्वावलंबी बनाने की व्यवस्था की गई. यह गाँधीजी के वर्धा शिक्षा योजना से मिलती जुलती थी जिसमें गाँधीजी ने व्यवहारिक शिक्षा पर बल दिया था. उच्च शिक्षा सम्बन्धी गतिविधियाँ छत्तीसगढ़ में अत्यन्त विलंब से आरम्भ हुई.

मध्यप्रांत में सर्वप्रथम नागपुर विश्वविद्यालय की स्थापना 1923 ई. में हुई तब यहाँ के छात्रों को नागपुर जाकर उच्च शिक्षा प्राप्त करने का अवसर
प्राप्त हुआ, जबकि प्रांत में दूसरा सागर विश्वविद्यालय 1946 ई. में स्थापित हुआ. काफी संघर्ष के पश्चात् 1937 ई. में ‘छत्तीसगढ़ शिक्षण समिति’ की स्थापना रायपुर में ठाकुर प्यारेलाल सिंह की अध्यक्षता में की गयी. अंचल में प्रथम बार उच्च शिक्षा की दिशा में ऐतिहासिक प्रयास वर्ष 1938 ई. में रायपुर में छत्तीसगढ़ महाविद्यालय’ की स्थापना के साथ हुआ, जो स्व. ज. योगानंदम् के द्वारा स्थापित की गई. 16 जुलाई, 1938 ई. में स्थापित इस संस्था के प्रथम प्राचार्य योगानंदम् जी स्वयं बने.

नागपुर विश्वविद्यालय से इसकी स्वीकृति हेतु छत्तीसगढ़ शिक्षण समिति ने महत्वपूर्ण कार्य किया. अंचल की प्रतिभाओं को उच्च शिक्षा का अवसर रायपुर में ही प्राप्त होने लगा. इसके पूर्व कुछ साधन सम्पन्न विद्यार्थी ही नागपुर, इलाहाबाद और बनारस आदि स्थानों में उच्च शिक्षा हेतु जा पाते थे. यह महाविद्यालय सम्पूर्ण अंचल के लिए एक वरदान साबित हुआ.

इस समय बिलासपुर जिले में जिला परिषद् द्वारा लगभग 200 शालाएँ संचालित होती थीं तथा कुछ नगर पालिकाओं द्वारा चलाई जाती थीं. वर्तमान शास्त्री स्कूल, गवर्नमेन्ट स्कूल, देवकीनंदन कन्या शाला एवं मिशन द्वारा चलाए जाने वाले नार्मन स्कूल एवं बर्जेश स्कूल (1885 ई. में चिंतन गृह के नाम से प्रारम्भ) आदि इस काल में स्थापित महत्वपूर्ण शिक्षण संस्थाएँ हैं.


असहयोग आन्दोलन के समय कार्यक्रम के अन्तर्गत छात्रों ने सरकारी स्कूलों का त्याग कर दिया अतः छात्रों के अध्ययन हेतु राष्ट्रीय विद्यालय बद्रीनाथ साव के मकान में खोला गया जिसका संचालन पं. शिवदुलारे मिश्र करते थे तथा बाबू यदुनंदन प्रसाद श्रीवास्तव यहाँ अध्यापन करते थे. उच्च शिक्षा के क्षेत्र में एस. बी. आर. (शिव भगवान रामेश्वर लाल) महाविद्यालय ने बिलासपुर में उल्लेखनीय कार्य किया जिसकी स्थापना ‘महाकोशल शिक्षण समिति’ द्वारा 1944 ई. में की गयी थी.

दुर्ग जिले में भी शिक्षा का कार्य व्यवस्थित रूप से होने लगा. धमतरी में असहयोग आन्दोलन के दौरान बाबू छोटेलाल श्रीवास्तव ने 1921 ई. में अपने स्वयं के मकान में राष्ट्रीय विद्यालय स्वयं के व्यय पर खोल दिया. इस समय समाज में शिक्षकों को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त था.

अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार के कारण यहाँ ब्रिटिश संस्कृति का प्रसार होने लगा जिससे मूल्यों में परिवर्तन हुए एवं जन जागृति के साथ यहाँ राष्ट्रीय आन्दोलन ने जोर पकड़ा. छत्तीसगढ़ में नव जागरण उत्पन्न करने का श्रेय अंग्रेजी शिक्षा को जाता है. इससे क्षेत्रीय लोगों में प्रगतिशीलता उत्पन्न हुई. जीवन के प्रति एक नवीन दृष्टिकोण ने जन्म लिया, परम्परावाद, अन्धविश्वास एवं भाग्यवाद के संकुचित दायरे से आगे निकल कर यहाँ के लोग शेष भारत की तरह समानता प्रगतिवाद, तर्क एवं विज्ञानवाद की ओर आकृष्ट हुए. भाग्य पर अत्यधिक भरोसा, कर्म से पलायन की प्रवृत्ति अब समाप्त होने लगी एवं क्रियाशीलता के गुणों का प्रादुर्भाव होने लगा.

इसे भी पढ़ें : छत्तीसगढ़ में सार्वजनिक कल्याण व स्थानीय संस्थाएँ 

Get real time updates directly on you device, subscribe now.

Leave a comment