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कलचुरिकाल में शिक्षा व साहित्य [Education and literature in Kalchurikal ]

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कलचुरिकाल में शिक्षा व साहित्य

शिक्षा, साहित्य एवं भाषा साहित्यिक दृष्टि से भी कलचुरिकाल में छत्तीसगढ़ अत्यन्त समृद्ध था. नारायण, अल्हण, कीर्तिधर, वत्सराज, धर्मराज, मागे, सुरगण, रत्नसिंह, कुमारपाल, त्रिभुवन पाल, देवपणि, नरसिंह और दामोदर मिश्र जैसे कवियों के नाम हमें कलचुरि लेखों में प्राप्त होते हैं.

संस्कृत के साथ प्राकृत भाषा के कवियों को कलचुरि दरबार में राजाश्रय प्राप्त था. यहाँ विद्या का भी बहुत प्रसार था. पाठशालाओं और महाविद्यालयों को राजकीय अनुदान प्राप्त था. गुरु-आश्रम की परम्परा विद्यमान थी.

कलचुरि कालीन साहित्य की प्रामाणिकता बाबू रेवा राम लिखित ग्रन्थ-‘तवारीख ए हैह्यवंशीय राजाओं की’ के द्वारा होती है. इसके अलावा पं. शिवदत्त शास्त्री ने ‘रतनपुर आख्यान’ लिखा है, जिसमें छत्तीसगढ़ के जमींदारों का इतिहास है.

इन्होंने ‘इतिहास-समुच्चय’ पुस्तक की रचना भी की है, जिसमें रतनपुर के इतिहास के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त होती है. इस काल में साहित्यकारों की अपेक्षा प्रशस्तिकार कवि अधिक थे, जो ब्राह्मण व कायस्थ थे. प्रकृति विज्ञान व आयुर्विज्ञान की दृष्टि से भी यह क्षेत्र विकसित था. वैसे जन-सामान्य में यहाँ छत्तीसगढ़ी बोली का प्रचार-प्रसार था, किन्तु राजकार्य संस्कृत भाषा में होता था. यहाँ का साहित्यिक इतिहास एक प्रकार से अंधकारमय है. ऐसा नहीं कि इस काल में साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य नहीं हुए. जैसाकि ऊपर कहा गया है, कलचुरि कालीन छत्तीसगढ़ साहित्यिक दृष्टि से अत्यन्त समृद्ध था, किन्तु तत्कालीन कृतियाँ या तो नष्ट कर दी गई या व्यक्तिगत रूप से रख ली गई, जो कालान्तर में यहाँ से बाहर चली गई.

रेवाराम बाबू (1850-1930 ई.)

रेवाराम बाबू (1850-1930 ई.) यद्यपि ब्रिटिश काल के थे, तथापि उनकी कृति में कलचुरिकालीन पूर्ण प्रभाव है. उन्होंने लगभग तेरह ग्रन्थों की रचना की, जिनमें प्रमुख रामावण दीपिका, विक्रम-विलास (सिंहासन बत्तीसी का पद्यानुवाद), गंगालहरी, ब्राह्मण स्रोत, गीतामाधव (महाकाव्य), नर्मदा कंटन, दोहावली, रत्नपरीक्षा, माता के भजन, कृष्णलीला के भजन, लोक लावण्य वृत्तांत, रतनपुर का इतिहास, रामाश्रमेघ आदि हैं. रेवाराम हिन्दी, संस्कृत, उर्दू के विद्वान् थे, जबकि छत्तीसगढ़ी में से पारंगत थे. छत्तीसगढ़ी भाषा में भी उनकी एक कृति है, किन्तु वर्तमान में अनुपलब्ध है.

प्रसिद्ध कवि गोपालचन्द्र मिश्र

इस काल के प्रसिद्ध कवि गोपालचन्द्र मिश्र उल्लेखनीय हैं. हिन्दी काव्य परम्परा की दृष्टि से इनका नाम विख्यात था. इनका जन्म 1660-1661 ई, निर्धारित किया गया है. उन्हें रतनपुर राज्य में राजसिंह देव (1689-1712 ई.) के दरबार में राजाश्रय प्राप्त था. इनके ग्रन्थों में प्रमुख खूब तमाशा, जैमिनी, अश्वमेध, सुदामा चरित, चितामणि (कृष्ण प्रबन्ध काव्य). रामप्रताप (राम प्रबन्ध काव्य) आदि हैं. उनके अनेक ग्रन्थ अप्रकाशित हैं. अतः इन कृतियों का मूल्यांकन नहीं हो सका है. उनके कृतित्व की उत्कृष्टता देखते हुए उन्हें महाकवि की संज्ञा दी जानी चाहिए.

‘खूब तमाशा’ इनके पांडित्य का एक अनूठा उदाहरण है, इसकी रचना उन्होंने 1746 ई. में की थी, जिसमें उन्होंने इस अंचल को ‘छत्तीसगढ़ सम्बोधित किया है, जो उपलब्ध साक्ष्यों के मध्य छत्तीसगढ़ शब्द का प्रथम प्रयोग अधिकांशतः माना जाता है. मूलतः कलचुरि साहित्य प्रेमी थे.

इनकी मूल शाखा त्रिपुरी में राजशेखर एवं शशिधर जैसे विधानों को संरक्षण प्राप्त था. राजपूत कालीन राजशेखर ने युवराजदेव प्रथम ‘केयूरवर्ष’ (900 ई. के आस-पास) के राजदरवार में रहते हुए ही अपने दो प्रसिद्ध ग्रन्थों ‘काव्यमीमांसा’ एवं ‘विद्धसालभंजिका’ की रचना की. काव्य और तर्कशास्त्र के विद्वान् पं. शशिधर को भी कलचुरियों का संरक्षण प्राप्त था.

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