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जिला बस्तर के पर्यटन स्थल [District Bastar tourist places]

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जिला बस्तर के पर्यटन स्थल [District Bastar tourist places]

जगदलपुर : एक परिचय

राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 43 पर रायपुर से 299 किलोमीटर दूर इन्द्रावती तट पर ‘जगदलपुर’ नगर बसा है, जो बस्तर संभाग का जिला मुख्यालय है. जगदलपुर से निकटतम हवाई एवं रेलवे स्टेशन विशाखापत्तनम् एवं रायपुर है, सड़क मार्ग से यह विशाखापत्तनम्, हैदराबाद, नागपुर तथा रायपुर से जुड़ा है. नगर के महत्वपूर्ण स्थलों में काकतियों का एकमात्र राजमहल, राजमहल परिसर में उनकी आराध्य देवी दन्तेशवरी का मंदिर, दलपत सागर (14वें काकतीय राजा दलपत देव द्वारा अपनी रानी ‘समुद्र देवी’ हेतु निर्मित), एन्थ्रोपोलॉजिकल म्यूजियम, चर्च आदि अन्य स्थल हैं.

जिला बस्तर के पर्यटन स्थल [District Bastar tourist places]
जिला बस्तर के पर्यटन स्थल [District Bastar tourist places]

एन्थ्रोपोलॉजिकल म्यूजियम-

सन् 1972 में स्थापित इस संग्रहालय का मूल उद्देश्य बस्तर तथा सीमा से लगे रायपुर-दुर्ग जिलों सहित, आंध्र प्रदेश, ओडिशा एवं महाराष्ट्र के आदिवासी जनजीवन के आपसी प्रभावों का अध्ययन करना है, संग्रहालय में वस्तर की विभिन्न जाति जनजाति के लोगों के दैनिक जीवन में उपयोगी वस्तुओं सहित संस्कृति, संस्कारों, भावनाओं और मनोरंजन के रूप में काम में आने वाली वस्तुओं को प्रत्यक्ष एवं छायाचित्रों के माध्यम से देखा जा सकता है. इसके अलावा बस्तर की पुरातत्व सम्पदा को संग्रहीत करने के उद्देश्य से प्रदेश शासन के पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने फरवरी 1988 में जिला पुरातत्व संग्रहालय की स्थापना की है. संग्रहालय में मुख्य रूप से प्रतिमाओं सहित शिलालेखों का संग्रह है, जो करुसपाल, केशरपाल, छोटे डोंगर, चित्रकोट आदि स्थानों से संग्रहीत किये गये हैं. इन स्थलों के अलावा जगदलपुर में शहीद पार्क है जो पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण है.

बारसूर (धार्मिक, ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक)

जगदलपुर से लगभग 100 किलोमीटर की दूरी पर स्थित धार्मिक, ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक दृष्टिकोण से बस्तर का महत्वपूर्ण स्थल वारसूर ||वीं शताब्दी ईस्वी के आरम्भ में नागवंश के बस्तर में अभ्युदय पर उनकी राजधानी बना. तत्कालीन अभिलेखों से विदित होता है कि 11वीं शताब्दी में इस क्षेत्र को ‘चक्रकूट’ या ‘भ्रमर कोट्स’ कहा जाता था. बारसूर में नागयुगीय अवशेषों से ऐसा प्रतीत होता है कि इस काल में धर्म, दर्शन तथा स्थापत्यकला की अत्यधिक उन्नति हुई थी. ऐसा मानना है कि केवल बारसूर में ही 147 मंदिर एवं इतने ही तालाव थे, किन्तु आज यहाँ नागयुगीन तीन मंदिर मामा-भांजा मंदिर, बत्तीसा मंदिर, चन्द्रादित्येश्वर मंदिर यथावत् दृष्टि से इन ध्वंस मंदिरों की वास्तु संरचना एवं कला शैली अद्वितीय है. यहाँ एक पुरातत्व संग्रहालय है. जिसमें वारसूर के आसपास खुदाई में प्राप्त प्राचीन पुरावशेष रखे हैं.

कोण्डागाँव (शिल्प ग्राम)

जगदलपुर से रायपुर की ओर राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 43 पर 76 किमी दूर कोण्डागाँव में प्रख्यात बस्तर शिल्प पर आधारित ‘शिल्प ग्राम’ में घड़वा, लोहा, कांसा आदि के धातुशिल्प सहित काष्ठ, पाषाण, टेराकोटा और वाँस की उत्कृष्ट एवं कलात्मक वस्तुयें बनती एवं विक्रय की जाती हैं. यहाँ निर्मित वस्तुयें विदेशों को भेजी जाती हैं.

नारायणपाल (ऐतिहासिक, धार्मिक)-

जगदलपुर से करीब 40 किलोमीटर दूर इन्द्रावती नदी के तट पर ‘नारायणपाल’ एक ग्राम है. नारायणपाल में दो मंदिर स्थित हैं-विष्णु मंदिर तथा भद्रकाली का मंदिर. वर्तमान में जो विष्णु मंदिर है, वस्तुतः शिव मंदिर है, परवर्तीकाल में इसमें विष्णु की प्रतिमा प्रतिष्ठित कराई गई है. बेसरशैली के उच्चशिखर वाले, ऊँची जगती पर बने इस मंदिर का द्वार अलंकृत है. इस मंदिर में लगे दो शिलालेखों से पता चलता है कि विष्णु मंदिर एवं भद्रकाली मंदिर 11वीं शताब्दी के वास्तुशिल्प के उत्कृष्ट उदाहरण हैं,

भोगापाल (ऐतिहासिक, पुरातात्विक)-

कोण्डागाँव से 51 किलोमीटर पर नारायणपुर (तहसील) से 25 किमी दूर ग्राम भोंगापाल स्थित है जहाँ ईंटों से निर्मित एक टीला विद्यमान है, जो सम्भवतः मौर्यकालीन है जिससे बुद्ध की गुप्तकालीन (5-6वीं सदी) आसनस्थ प्रभामण्डल युक्त प्रतिमा प्राप्त हुई है. इसी टीले के समीप नाले के दूसरी तरफ सप्तमातृका प्रतिमा प्राप्त हुई है, जो कुषाणकालीन प्रतीत होती है. संभवतः स्थल पर ‘सिरपुर’ की तरह बौद्ध विहार रहा होगा.

केशकाल (प्राकृतिक)-

‘केशकाल’ की घाटी राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक-43 पर कांकेर से जगदलपुर की ओर बढ़ने पर लगभग 5 किमी की घाटी पड़ती है जिसे बस्तर का प्रवेश द्वार’ कहा जाता है. यह घाटी समुद्र से 728 मीटर की ऊँचाई पर है. इसके नाम के सम्बन्ध में एक तर्क यह है कि जीवन और मृत्यु के मध्य केश (बाल) की दूरी रहने के कारण इस घाटी का नाम ‘केशकाल’ पड़ा होगा. सूर्य की रोशनी में घाटी का विहंगम दृश्य या चाँदनी रात में घाटी पर वाहन द्वारा ऊँची पर्वत श्रेणी और गहराई के मध्य सर्पाकार मार्ग में चढ़ना रोमांचकारी एवं अद्वितीय होता है. घाटी के मध्य में ‘तेलीन माता का मंदिर’ है, जहाँ यात्रियों को रुकना आवश्यक होता है.

गढ़ घनोरा (ऐतिहासिक, धार्मिक)

रायपुर से, राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 43 पर केशकाल से लगभग 12 किमी पश्चिम में ‘गढ़धनोरा’ नामक ग्राम पुरातात्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थल है. गढ़ धनोरा में ऐसे कई मंदिरों का पता चला है जो पूर्णरूपेण भूमिगत थे. उत्खनन पश्चात् ज्ञात हुआ कि यहाँ भूमि में स्थापत्य का अपार भणडार छिपा पड़ा है. बस्तर रियासत के तृतीय प्रशासक रावबहादुर बैजनाथ पण्डा (1908-10) ने यहाँ एक टीले पर मलवा सफाई करवा कर ईंटों का शिव मंदिर प्राप्त किया था. तत्पश्चात् पुरातत्व विभाग ने यहाँ प्राचीन मंदिरों के अनेक समूह मलवा सफाई पर प्राप्त किये जिनमें शिव मंदिर समूह. विष्णु मंदिर समूह, मोबरहीनपारा मंदिर समूह, बंजारिन मंदिर समूह आदि प्रमुख हैं.

‘कांगेर घाटी’ राष्ट्रीय उद्यान (वन्य प्राणी उद्यान)-

छत्तीसगढ़ के 03 राष्ट्रीय उद्यानों में से एक है-कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान जो बस्तर जिले में स्थित है. जगदलपुर से दक्षिण पूर्व में ‘जगदलपुर-कोटा, हैदराबाद’ मार्ग पर 26वें किलोमीटर से राष्ट्रीय उद्यान की सीमा प्रारंभ होती है. समुद्र तल से 38 से 781 मीटर ऊँचाई तक 200 वर्ग किमी भू भाग में गहन वनों से आच्छादित चोटियों, खाइयों, गुफाओं, जल प्रपातों से युक्त राष्ट्रीय उद्यान बाह्य प्रभाव से अछूता है. यहाँ शेर, तेंदुआ, चीतल, सांभर, हिरण, भालू, सिगिंग हिल मैना एवं विविध सरीसृप मिलते हैं. कांगेर घाटी में ही कांगेर-खोलाब के संगम पर ‘भैसादरहा मगर संरक्षण क्षेत्र’ घोपित किया गया है. राष्ट्रीय उद्यान में जाने का सर्वश्रेष्ठ समय फरवरी से मई अंत तक होता है. पर्यटकों के लिए निरीक्षण बिन्दु बनाये गये हैं. भैंसा दरहा के अतिरिक्त खोलाब (शबरी) कांगेर संगम, कोडरी बहरा-कांगेर संगम पर भी मगरों के पाये जाने की सूचना है, उद्यान के प्रमुख पर्यटन बिंदु तीरथगढ़ प्रपात, झुलनादरहा, शिवगंगा जलकुंड, कांगेर करपन गुफा, कोटमसर गुफा, कांगेर धारा झरना, दंडक गुफा, भीमकाय वृक्ष, हाथी पखना, परेवा बाड़ी जलकुंड, देवगिरी गुफा, कैलाश गुफा, कैलाश झील, कोटरी बहार झील, दीवान डोंगरी, मनोरम दृश्य, मैसा दरहा झील, कांगेर खोलाब संगम, खोलाव का विहंगम दृश्य आदि हैं.

‘कांगेर धारा’ (प्राकृतिक)

तीरथगढ़ के पश्चात् कांगेर नदी का जल कांगेर राष्ट्रीय उद्यान के अन्य 8-10 स्थानों पर गिरता है और सुंदर जल प्रपात का रूप धारण करता है इनमें से ही एक प्रपात है ‘कांगेर धारा’. यह खूबसूरत झरने के रूप में आकर्षण का केन्द्र है.

भैंसादरहा (‘मगर संरक्षण स्थल’ प्राकृतिक)

जगदलपुर’ से दक्षिण पूर्वी दिशा में 42 किमी दूर कांगेर वन घाटी में स्थित कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान में ‘भैंसादरहा’ छत्तीसगढ़ में एकमात्र स्थल है जहाँ प्राकृतिक रूप से आवाद मगरों का संरक्षण किया जा रहा है. ‘भैंसादरहा’ तथा उद्यान की सीमा में कांगे के जल में वर्ष 1999 की गणना के अनुसार 100 मगर पाये गये हैं. आरक्षित उद्यान क्षेत्र के कक्ष क्रमांक 326 में स्थित इस अण्डाकार प्राकृतिक झील का जल क्षेत्र लगभग 4 हेक्टेयर में फैला हुआ है. जिसकी अब तक ज्ञात अधिकतम गहराई 18 से 20 मीटर है. इस स्थान पर शांत ठहरे जल की गहराई इतनी अधिक है कि भैंसा जैसा कुशल तैराक पशु भी डूब जाता है. इसी कारण इस स्थल का नाम ‘भैंसादरहा’ पड़ा. कांगेर नदी का जल घाटी में आने से पहले 300 फीट ऊँचे तीरथगढ़ जल प्रपात एवं कुटुम्बसर गुफा’ के निकट कांगेर धारा का निर्माण कर निम्न घाटी में ठहर कर झील की शक्ल ले लेता है. लगभग 5 किमी की इस शांत नदी जल का उपयोग रोमांचकारी ‘जल पर्यटन’ के लिए आसानी से किया जा सकता है.

कुटुम्बसर (प्राकृतिक)-

कुटुम्बसर की गुफा जगदलपुर से दक्षिण दिशा में लगभग 38 किलोमीटर दूर ‘कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान’ में स्थित है. ‘कोटमसर’, ‘कुटुम्बसर, ‘गुपनपाल’ या ‘राहुड’ नाम से प्रसिद्ध गुफा भारत की प्रथम और विश्व की सातवी भूगर्भित गुफा है. गुफा की तुलना विश्व की सर्वाधिक लम्बी भूगर्भित गुफा ‘कार्ल्स बार आबकेव’ से की जा सकती है, जो अमेरिका में है. ‘कुटुम्बसर’ धरातल से 60 से 215 फीट की गहराई तक है. गुफा का प्रथम कंदराशास्त्रीय कार्य करने का श्रेय भूगोलविद् डॉ. शंकर तिवारी को जाता है, जिन्होंने तीन दशक पूर्व इस अज्ञात स्थल को उजागर किया.

गुफा का प्राकृतिक सौंदर्य, गुफा की अंधी मछलियाँ और झिंगुर तथा गुफा के भीतर स्टेलेक्टाइट (गुफा की छत से लटके ‘चूने की विविध आकृतियाँ) एवं स्टेलेग्माइट (धरातल पर बनी चूने की विविध स्तम्भाकृतियाँ) प्रकृति का करिश्मा है. अंधेरी गुफा में अंधत्व के परिणाम में बदली मछलियाँ विश्व की अनूठी प्रजाति हैं. प्राणी जगत् के एक नये प्राणी लम्बी मूछों वाले झिंगुर की प्रजाति को अन्वेषक शंकर के नाम पर ‘केपीओला शंकराई’ नाम दिया गया है. उन्होंने 1958 से 64 के मध्य अवकाश में अपने लगभग 600 दिवस इन गुफाओं में कार्य करते हुए बिताये. अपने छायांकन के माध्यम से प्रोफेसर तिवारी ने गुफा के उन अनाम अज्ञात सौंदर्य स्थलों को दिखाया है जो बार बार गुफा के भीतर जाने के बाद भी आम पर्यटक नहीं देख पाते हैं. प्रो. तिवारी गुफा के भीतर खोजबीन, छायांकन करते 4500 फीट दूर कांगेर नाले के समीप गुफा के दूसरे मुहाने से निकल आये थे. यहाँ गाइड, पेट्रोमैक्स, टार्च आदि साथ रखना आवश्यक होता है. ‘कुटुम्बसर की गुफा’ भ्रमण हेतु नवम्बर से लेकर मई तक खुलती है.

कैलाश गुफा (प्राकृतिक)

देवों सी आकृति का आभास देने वाली यह प्राकृतिक भूमिगत गुफा जगदलपुर से 40 किलोमीटर दूर बन परिक्षेत्र कोलेंग के मिलकुलबाड़ा बीट में लोवर कांगेर नदी के मध्य पहाड़ी की ढाल पर है. गुफा प्रवेश द्वार से लगभग 30 मीटर दूरी पार करने के बाद स्टेलेक्टाइट निर्मित गजमस्तक के दर्शन होते हैं. 2-5 से 5 मीटर तक गहरी इस गुफा अनेक प्राकृतिक शिवलिंग समाहित हैं.

कैलाश गुफा (प्राकृतिक)

जगदलपुर से दक्षिण पूर्व की ओर फैली तुलसी डोंगरी की पहाड़ियों में वन परिक्षेत्र कोलंग के कक्ष क्रमांक 75 मिलकुलवाड़ा स्थित लगभग 250 मीटर लम्बी तथा 35 मीटर गहरी ‘कैलाश गुफा’, कुटुम्बसर गुफा के सदृश्य रहस्य एवं रोमांच से भरी है. गुफा में अनेक स्टेलेग्माइट एवं स्टेलेक्टाइट आकृतियाँ मिलती हैं. 30 मीटर आगे चलकर गुफा के दो खण्ड हो गये हैं, जिसमें एक और ‘संगीत कक्ष’ तथा दूसरी ओर ‘मंदिर स्थल’ आदि हैं. गुफा में जाने हेतु पहाड़ पर चढ़ना होता है. गुफा का प्रवेश द्वार बीच पहाड़ पर एक छोटा खोल है.

चित्रकोट (लघु नियाग्रा)-

जगदलपुर से 40 किलोमीटर की दूरी पर ‘चित्रकोट’ अथवा चितरकोट में बस्तर की जीवनदायिनी ‘इंद्रावती नदी’ का जल लगभग 90 फुट की ऊँचाई से धुआँ सा उत्पन्न करता गर्जना के साथ प्रपात बनकर गिरता है. खुले मौसम में जलकण सूर्य रश्मियों के संयोग से इन्द्रधनुष का निर्माण करते हैं. चित्रकोट प्रपात छत्तीसगढ़ ही नहीं पूरे देश का सबसे चौड़ा प्रपात है. चित्रकोट जल प्रपात के समीप एक भग्न शिव मंदिर 14-15वीं सदी का तथा उमा महेश्वर, हनुमान, स्कन्द माता, महिषासुर मर्दिनी, भैरव, योद्धा आदि प्रतिमाएं लगी हैं, जो 13वीं से लेकर 17वीं सदी के हैं.

तीरथगढ़ जल-प्रपात (प्राकृतिक)

जगदलपुर से 38 किमी दूर ‘तीरथगढ़’ एक सुन्दर जल प्रपात ‘कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान’ में स्थित है. यह छत्तीसगढ़ का सबसे ऊँचा प्रपात है. कांगेर नदी का जल लगभग 300 फुट की ऊँचाई से गिरता है. कांगेर नदी की जल धारा घाटी के मध्य से बहती हुई एक ऊँचे कगार से गिरते हुये कई हिस्सों में विभाजित हो जाती है और धुएँ का निर्माण करती है. ऊपर से गिरता प्रपात मोतियों की श्वेत चादर-सा प्रतीत होता है. इस स्थल पर नदी दो प्रपात बनाती है. प्रथम बार 300 फीट गिरकर यह पुनः गहराई पर गिरती है और गहरी चट्टानों के मध्य आगे निकल जाती है. मुख्य प्रपात तक जाने हेतु सीढ़ियाँ बनी हुई हैं.

सतधारा (प्राकृतिक)

बस्तर में चित्रकोट तीरथगढ़ के अलावा अन्य अनेक ऐसे झरने हैं. इन्द्रावती पर जगदलपुर से 118 किलोमीटर तथा बारसूर से मांडर होकर 22 किलोमीटर दूर ‘सतधारा’ प्रपात स्थित है. यह नदी पर बोध घाटी पहाड़ी से गिरते हुये क्रमशः ‘योधधारा’, ‘कपिलधारा’, ‘पाण्डवधारा’, ‘कृष्णधारा’, “शिवधारा’, ‘बाणधारा’ और ‘शिवचित्रधारा’ आदि सात धारायें बनाती है. इन प्रपातों के चारों ओर घने वन होने से यह क्षेत्र प्राकृतिक रूप से अत्यंत रमणीय एवं पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण है. यह विश्व में एकमात्र उदाहरण है जहाँ नदी कुछ ही अंतराल पर सात जल प्रपात बनाती है. इसके अलावा बस्तर में अन्य अनेक जल धारायें हैं जिनमें मेंदरी धूमर, कांगेर धारा, चित्रधारा या कुकुर धूमर, महादेव धूमर, गुप्तेश्वर झरना, खुरसेल झरना, चरैमरे, हंदावाड़ा प्रपात, मलांज कुण्डम आदि प्रमुख हैं.

हाथी दरहा (प्राकृतिक)

जगदलपुर से लगभग 45 किलोमीटर की दूरी पर जगदलपुर बारसूर मार्ग पर 8वें किलोमीटर पर ग्राम मेंदरी के पश्चिम में गहरी खाई है, जिसे ‘हाथी दरहा’ के नाम से जाना जाता है. खाई लगभग 150-200 फुट गहरी है, जिसका आकार रोमन लिपि के ‘यू’ अक्षर जैसा है, वसंत में छोटे रंग-बिरंगे जंगली फूल खाई को रंगीन कर देते हैं. ‘हाथीदरहा’ का मुख्य आकर्षण यहाँ सौ फुट से अधिक ऊँचाई से ‘मटनार नाले’ का बना ‘प्रपात’ है. मुख्य प्रपात के अलावा गहरी खाई में अनेक स्थानों से पतले पतले प्रपात भी देखे जा सकते हैं, ‘हाथीदरहा’ को भेदरी घूमर’ भी कहा जाता है,

रानी दरहा (प्राकृतिक)

‘जगदलपुर कोटा मार्ग’ पर दंतेवाड़ा जिले के कोंटा तहसील के विकास खण्ड ‘छिंदगढ़’ से 30 किमी दूर ‘ग्राम तालनार’ के समीप यह दरहा है. ‘रानी दरहा’ के आसपास शबरी का जल अत्यधिक गहराई के कारण ठहरा हुआ सा प्रतीत होता है. किंवदंती के अनुसार युद्ध काल में पद्मावती नामक रानी ने पीछा करते हुये दुश्मनों के हाथों में पड़ने के बजाय, इसी स्थान से शबरी में कूद कर प्राणोत्सर्ग कर लिया था. इसलिए इसे ‘रानी दरहा’ कहा जाता है, इसके अतिरिक्त बस्तर में इंद्रावती तट पर ग्राम मेंटावाड़ा के निकट ‘झापी दरहा’ और करंजी के निकट ‘जुगाली दरहा’ भी प्रसिद्ध हैं.

खुरशैल वैली (प्राकृतिक)-

समुद्र सतह से अधिकतम 839 मीटर और न्यूनतम 480 मीटर ऊँचा 2840 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली सागौन, बाँस के मिश्रित प्रजाति के गहन वनों से आच्छादित यह घाटी वनों की दृष्टि से महत्वपूर्ण है. किन्तु वर्तमान में यह नक्सलियों की शरणस्थली बनी हुई है. इस क्षेत्र में नक्सलियों का ‘कोयली बेड़ा दलम’ सक्रिय है. घाटी क्षेत्र में ‘खुरशैल नाला’ तट पर विविध वन्य प्राणी मिलते हैं, ‘नारायणपुर’ तहसील की इसी घाटी क्षेत्र में गुड़ाबेड़ा नामक स्थल से 9 किमी दूर गहन वन क्षेत्र में लगभग 400 फुट ऊँचा कई खण्डों में बँटा झरना स्थित है जिसे खुरशैल झरना कहते हैं. यह वैली एक सुंदर पर्यटन स्थल है. इस क्षेत्र में विपुल जैव विविधता विद्यमान है. यहाँ बाँस की अनेक प्रजातियाँ मिलती हैं, जो छत्तीसगढ़ में अन्यत्र नहीं मिलती हैं, साथ ही प्रदेश का सर्वश्रेष्ठ सागौन यहीं मिलता है,

अबूझमाड़

बस्तर के दक्षिण पश्चिम में अधिकतम 4 हजार एवं न्यूनतम 2 हजार फीट ऊँची पर्वत श्रृंखलाओं का क्षेत्र “अबूझमाड़’ कहलाता है. अंडाकार भू भाग के उत्तरी वृत्त को शेष बस्तर से ‘इंद्रावती’ और माड़िन नदियाँ अलग करती हैं. लगभग 1500 वर्गमील में फैले क्षेत्र में वीजापुर, दंतेवाड़ा और नारायणपुर तहसीलें आती हैं. यहाँ जनसंख्या का घनत्व 10 व्यक्ति प्रति किलोमीटर है. इस क्षेत्र के ‘माड़िया’ जनजाति की जीवन पद्धति’ विश्व प्रसिद्ध है. ‘माड़ क्षेत्र’ जहाँ पहाड़ी ढलान से तराई में झरने नाले नदी अपनी राह बनाते हैं (भाभर जोन) वहीं झोपड़ियाँ बनाकर रहते लगभग पाषाणकालीन जीवन जीते माड़ियाओं का आज भी एक स्वतंत्र जीवन तंत्र है. शासन के प्रयासों से ये धीरे धीरे शिक्षित समाज से जुड़ रहे हैं, किन्तु आज भी यह क्षेत्र छत्तीसगढ़ का सबसे पिछड़ा क्षेत्र है. बेरियर एल्विन ने इस क्षेत्र पर विस्तृत शोध किया है.

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