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छत्तीसगढ़ का सांस्कृतिक विरासत : कबरा पहाड़ का चित्रित शैलाश्रय

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  • ‘कबरा’ छत्तीसगढ़ी शब्द है, जिसका मतलब होता है- धब्बेदार (spotted)।
  • वनस्पतियों के हरे-भरे कनवास में जगह-जगह उघड़े बलुआ चट्टानों की वजह से पूरा पहाड़ दूर से धब्बेदार दिखाई देता है।
  • मूल नाम स्थानीय लोग ‘गजमार पहाड़’ बतलाते हैं।
  • इसका उत्तर-पश्चिमी छोर रायगढ़ से ही आरंभ हो जाता है, जहाँ पहाड़ मंदिर (हनुमान मंदिर) नगर का प्रमुख दर्शनीय स्थल है।
  • वहीं, दक्षिण-पूर्वी हिस्सा प्रसिद्ध हीराकुंड बाँध के मुहाने पर बसे घुनघुटापाली (ओडिशा अंतर्गत) में समाप्त होता है, जहाँ कदमघाट में घण्टेश्वरी देवी का मंदिर भी एक महत्वपूर्ण दर्शनीय स्थल है।
  • शैलाश्रय में जंगली जीव, जलीय जीव, सरीसृप और कीट-पतंगों के साथ ही भिन्न-भिन्न आकार-प्रकार की रेखाकृतियों का अंकन है।
  • यहाँ के चित्रों में जटिल रेखांकन जैसे सर्पिल ऊर्ध्वाधर और क्षैतिज रेखाएं, त्रिकोण आकृति, 36 आरियों वाले पहिये (जो अनुष्ठानिक भी हो सकता है), के अलावा जंगली पशु जैसे लकड़बग्घा, हिरण (गर्भिणी भी), साही, नीलगाय और बारहसिंगा; जलीय जीव जैसे कछुवा, मछली, केंचुवा; पक्षी जैसे मोर; सरीसृप जैसे गोह अथवा छिपकली; कीट जैसे तितली और मकड़ी एवं नाचते हुए मानवपंक्ति तथा ताड़ वृक्ष का अंकन उल्लेखनीय हैं।
  • अधिकांश चित्र लाल और कुछेक भूरे रंग के हैं।
  • लाल रंग के चित्र पूरी तरह से भरे हुए हैं, जबकि भूरे रंग वाले चित्रों में रेखांकन की प्रधानता देखी जा सकती है।
  • विविध आकार-प्रकार एवं विषयों के चित्रण के साथ ही यहाँ भिन्न-भिन्न कालों में निर्मित चित्र भी हैं।
  • इन चित्रों के आकार, प्रारूपिकी, संयोजन एवं बनाने की कला के आधार पर विद्वान इस स्थान पर मध्यपाषाण काल से लेकर ऐतिहासिक काल तक मानवीय गतिविधियों के प्रमाण स्वीकार करते हैं।
  • कई स्थानों पर पूर्ववर्ती काल के चित्रों पर ही परवर्ती काल के चित्र आरोपित (superimposed) अथवा अतिव्यापित (overlapped) हैं।
  • कुछ लोगों ने शैलचित्रों पर पेंट, कोयला आदि से नाम लिखकर निंदनीय कार्य किया है, प्राचीन धरोहर को वो क्षति पहुँचाई है, जिसकी भरपाई नहीं की जा सकती।

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