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छत्तीसगढ़ में वाणिज्य एवं उद्योग

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छत्तीसगढ़ में वाणिज्य एवं उद्योग

तत्कालीन समय में भारत एक कृषि प्रधान देश था, जबकि इंगलैण्ड मूलतः व्यापार प्रधान. अपने व्यापार के बल पर ही उसने दुनिया के एक विस्तृत भू भाग में अपने उपनिवेश स्थापित कर लिए थे. भारत भी आलोच्य काल में इंगलैण्ड का उपनिवेश ही था. अंग्रेजों की आर्थिक नीति उसके साम्राज्यवादी नीति का ही एक अंग थी. भारत में उसका उद्देश्य धनार्जन ही रहा है.

व्यापार तथा उद्योग के माध्यम से इस क्षेत्र में अंग्रेजों ने ‘खुला छोड़ दो’ की नीति अपनाई तथा भारतीय कुटीर उद्योगों को पूर्णतः नष्ट कर दिया एवं आरम्भ से अन्त तक देश का आर्थिक शोषण ही किया. अपने उद्योगों के विकास के लिए उसने भारतीय व्यापार को नष्ट कर दिया. यहाँ से सोना, चाँदी एवं कच्चा लोहा इंगलैण्ड भेजा जाने लगा.

इसके बावजूद अंग्रेजों की वाणिज्यिक प्रवृत्ति और औद्योगिक नीति के कारण देश में धीरे-धीरे नवीन उद्योगों और व्यवसायिक क्षेत्रों के अवसर उत्पन्न हुए जिसमें भारतीयों का प्रवेश आरम्भ हुआ. छत्तीसगढ़ अंचल में सर्वप्रथम उद्योग राजनांदगाँव में सी. पी. मिल्स के नाम से स्थापित हुआ. कपड़े का उत्पादन 1894 ई. में आरम्भ हुआ. मिल के निर्माता मुम्बई के मि. जे. बी. मिल्स के नाम से स्थापित हुआ. कपड़े का उत्पादन 1894 ई में आरम्भ हुआ. मिल के निर्माता मुम्बई के मि. जे. बी. मैकवेय थे. 1897 ई. में मिल ‘मेसर्स शावालीस कम्पनी’ कोलकाता को बेच दी गयी जिसने उसका नाम बदलकर ‘बंगाल नागपुर काटन मिल्स’ रखा जो नागपुर और कोलकाता के मध्य स्थित था.

रायगढ़ की ‘मोहन जूट मिल’ (1935 ई.) दूसरी महत्वपूर्ण इकाई स्थापित हुई जो आज भी अंचल की एक मात्र जूट मिल है. इसके कारण यहाँ के लोगों को कृषि के अतिरिक्त जीविका का नया साधन प्राप्त हुआ. छत्तीसगढ़ एक नवीन औद्योगिक संस्कृति के परिवेश में प्रविष्ट हुआ. अब लोग कृषि के साथ नौकरी पेशा हेतु भी तैयार होने लगे. क्षेत्र के आर्थिक और सामाजिक विकास का नया मार्ग प्रशस्त हुआ. छोटे उद्योगों की स्थापना के साथ शहरी आबादी में वृद्धि हुई.

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