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छत्तीसगढ़ी भाषा के उद्विकास

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छत्तीसगढ़ी भाषा के उद्विकास

छत्तीसगढ़ी का विकास भी अन्य आधुनिक भाषाओं की तरह ही प्राचीन आर्य भाषा से ही हुआ है   ।आर्यों की प्राचीन भाषा समय के साथ परिवर्तित हो गई और उससे हिंदी और उसकी उप भाषाओं का विकास हुआ विभिन्न भाषाओं के मिलने से भारत की अनेकानेक बोलियां पनपी। जिनमें से छत्तीसगढ़ी भी एक थी।

भारतीय भाषाओं के विकास क्रम को व्याकरणाचार्य ने तीन भागों में विभाजित किया है 

  1. प्राचीन भारतीय आर्य भाषा काल 1500 से 500 ईसा पूर्व। 
  2.  मध्यकालीन भारतीय आर्य भाषा काल 500 ईसा पूर्व से 1000 ईसा पूर्व।
  3.  आधुनिक भारतीय आर्य भाषा काल – 1000 ईसा पूर्व से अब तक। 

1.प्राचीन भारतीय आर्य भाषा काल

(1500 ईसा पूर्व से 500 ईसा पूर्व तक)

इस युग के भारतीय आर्यों की भाषाओं के उदाहरण हमें प्राचीन ग्रंथ वेदों में मिलते हैं ।प्राचीन युग के अंतर्गत वैदिक और लौकिक दोनों भाग आते हैं ।संस्कृत शिष्ट समाज के परस्पर विचार विनिमय की भाषा थी और वह यह काम कई सदी तक करती रही। संस्कृत का प्रथम शिलालेख 150 ई. रुद्रदामन का गिरनार शिलालेख है ।तब से प्रायः 12 वीं सदी तक इसको राजदरबार उसे विशेष प्रश्रय मिलता रहा।

      बौद्ध धर्म के उदय के साथ ही स्थानीय बोलियों का महत्व मिला। भगवान बुद्ध ने धर्म प्रचार को प्रभावी बनाने के लिए जन बोलियों को चुना ।जिसमें पाली सर्वोपरि थी पाली में जन भाषा और साहित्य भाषा का मिश्रित रूप मिलता है ।

2. मध्यकालीन भारतीय आर्य भाषा काल

(500 ईसा पूर्व से 1000 ई.तक)

मध्यकाल की प्राचीन भाषा का प्रतिनिधि उदाहरण अशोक की धर्म लिपियों और पाली ग्रंथों में मिलता है। धीरे-धीरे मध्यकाल में प्रादेशिक भिन्नता बड़ी जिसे अलग-अलग प्राकृत भाषाओं का विकास हुआ ।संस्कृत ग्रंथों में भी विशेषतः नाटकों में इन प्राकृतो का प्रयोग मिलता है । निम्न वर्ग के व्यक्तियों और सामान्य जनता द्वारा इनका प्रयोग हुआ है । इन प्राकृत भाषाओं में शौरसेनी ,मागधी ,अर्धमागधी ,महाराष्ट्री, पैशाची आदि प्रमुख रहे। साहित्य में प्रयुक्त होने पर व्याकरणाचार्य ने प्राकृतिक भाषाओं को कठिन अस्वभाविक नियमों से बांध दिया। किंतु जिन मूल्यों के आधार पर उनकी रचना हुई व्याकरण के नियमों से नहीं बांधी जा सकी । व्याकरणार्य  ने लोगों की नवीन बोलियों को अर्थात बिगड़ी हुई भाषा दिया।

अपभ्रंश:-

मध्यकालीन भारतीय भाषा का चरण विकास अपभ्रंश से हुआ। आधुनिक आर्य भाषा और हिंदी ,मराठी, पंजाबी , उड़िया आदि भाषा की उत्पत्ति इन ही अपभ्रंश भाषाओं से हुई है।इस प्रकार यह अपभ्रंश भाषा में प्राकृतिक भाषाओं और आधुनिक भाषाओं के बीच की कड़ियां हैं। 

1. मागधी अपभ्रंश भाषा से बिहारी, उड़िया, बंगाली, असमिया इन भाषाओं का उद्भव हुआ है। 
2.अर्धमागधी अपभ्रंश:- से पूर्वी हिंदी, अवधी, बघेली और छत्तीसगढ़ी, आधुनिक भारतीय भाषाओं का विकास हुआ है।

3.शौरसेनी:- से पश्चिमी हिंदी, राजस्थानी, ब्रजभाषा ,खड़ी बोली का विकास हुआ।
4.पैशाची अपभ्रंश से लहंदा पंजाबी भाषा अस्तित्व में आए।
5.ब्राचड़ अपभ्रंश से सिंधी भाषा बना है। 
6.खस अपभ्रंश से पहाड़ी कुमाऊनी भाषा बना है। 
7.महाराष्ट्री अपभ्रंश से मराठी भाषा का विकास हुआ है या मराठी भाषा अस्तित्व में आया है। 

आधुनिक भारतीय आर्य भाषा काल

(1000 ई. से वर्तमान काल तक)

        भारतीय आर्य भाषा के वर्तमान युग का प्रारंभ प्रायः 1000 ई से माना जाता है जिनमें महत्व की दृष्टि से भारतीय आर्य परिवार की भाषाएं सर्वोपरि है ।इनकी बोलने वाले की संख्या भारत में सबसे अधिक है ।बोलने वालों की संख्या की दृष्टि से द्रविड़ परिवार की भाषाएं इसके बाद आती हैं। पैशाची,शौरसेनी महाराष्ट्री, अर्धमागधी आदि अपभ्रंश भाषाओं ने क्रमशः आधुनिक सिंधी, पंजाबी ,हिंदी, राजस्थानी, गुजराती ,मराठी ,पूर्वी हिंदी ,बिहारी ,बांग्ला, उड़िया भाषा का जन्म दिया ।

image छत्तीसगढ़ी भाषा के उद्विकास

       शौरसैनी प्राकृत अपभ्रंश से पश्चिम के पास पश्चिमी शाखा का जन्म हुआ ।इसकी दो प्रधान बोलियां हैं एक ब्रज, और दूसरी खड़ी बोली। 

हिंदी की दूसरी शाखा है पूर्वी हिंदी का विकास अर्धमगधी से हुआ ।इसकी तीन प्रमुख बोलियां हैं अवधी बघेली छत्तीसगढ़ी ।अवधी में साहित्यिक परंपरा रही है तुलसी व जायसी ने इसमें अमर काव्य लिखे हैं। बघेली और छत्तीसगढ़ी में प्राचीन समय में उल्लेखनीय साहित्य सृजन नहीं हुआ ।जिसकी क्षतिपूर्ति अब हो रही है ।छत्तीसगढ़ भाषाएं मराठी बिहारी बिहारी आदि हैं । साथ ही छत्तीसगढ़ में आदिवासी बोलियां बोली जाती है जिनकी वजह से छत्तीसगढ़ी में अनेक विषमताएं उत्पन्न हो गई हैं।

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