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छत्तीसगढ़ी साहित्य

छत्तीसगढ़ी साहित्य में भारतीय संस्कृति के तत्व वर्तमान हैं। इस साहित्य में अनेक लोककथाएँ हैं जिनके मूल भाव भारत की अन्य भाषाओं में भी सामान्य रूप से पाए जाते हैं। कहीं कहीं स्थानीय तथा सामयिक ढंग से इन कथाओं की रोचकता बढ़ गई है। छत्तीसगढ़ी साहित्य किसी न किसी कहानी पर आधारित हैं। छत्तीसगढ़ी साहित्य के केंद्रविन्दु बहुधा ऐतिहासिक है। वीरगाथाओं में राजा वीरसिंह की गाथा प्रसिद्ध है। इसमें मध्यकालीन विश्वासों की प्रचुरता है। कुछ गीतों में देवता के पराक्रम का वर्णन है। श्रवणकुमार संबंधी “सरवन” के गीत तथा “सरवन” की गाथा प्रसिद्ध है। छत्तीसगढ़ी में ऋतुगीत, नृत्यगीत, संस्कारगीत, धार्मिक गीत, बालकगीत तथा अन्य प्रकार के विविध गीत पाए जाते हैं। लोकोक्तियों तथा पहेलियों की भी कमी नहीं है।

छत्तीसगढ़ी साहित्य का पद्य साहित्य के उत्कर्ष को नया आयाम दिया – पं. सुन्दरलाल शर्मा, लोचन प्रसाद पांडेय, मुकुटधर पांडेय, नरसिंह दास वैष्णव, बंशीधर पांडेय, शुकलाल पांडेय ने। कुंजबिहारी चौबे, गिरिवरदास वैष्णव ने राष्ट्रीय आंदोलन के दौर में अपनी कवितीओं की अग्नि को साबित कर दिखाया।

छत्तीसगढ़ी साहित्य का गद्य साहित्य भी निरन्तर पुष्ट हो रहा है। इसके प्रमाण में हम हीरू के कहिनी, (पं. वंशीधर शर्मा), दियना के अंजोर (शिवशंकर शुक्ला), चंदा अमरित बगराईस (लखनलाल गुप्त), कुल के मरजाद (केयूर भूषण), छेरछेरा (कृष्णकुमार शर्मा), प्रस्थान (परदेशीराम वर्मा), को प्रस्तुत कर सकते हैं जो उपन्यास कृतियाँ हैं।

छत्तीसगढ़ी साहित्य का इतिहास

छत्तीसगढ़ी साहित्य का इतिहास छत्तीसगढ़ी का जन्म छत्तीसगढ़ में मिले शिलालेखों के आधार पर छत्तीसगढ़ी का जन्म ईसा पूर्व छठवीं शताब्दी से माना जा सकता है उसके कुछ पहले के मागधी प्राकृत के शिलालेख छत्तीसगढ़ के पूर्व
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छत्तीसगढ़ी उपन्यास और उपन्यासकार

इस पोस्ट में आप छत्तीसगढ़ी उपन्यास और उपन्यासकार के बारे में जानकारी प्राप्त करेंगे. यदि कहीं पर आपको त्रुटिपूर्ण लगे तो कृपया पोस्ट के नीचे कमेंट बॉक्स पर लिखकर हमें सूचित करने की कृपा करें. छत्तीसगढ़ी उपन्यास और उपन्यासकार
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