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छत्तीसगढ़ लोकनृत्य

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छत्तीसगढ़ लोकनृत्य

 पण्डवानी नृत्य

  • एकल लोक नृत्य
  • प्रस्तुतीकरण समवेत स्वरों में
  • आंगिक क्रियाओं के साथ-साथ गायन भी एक ही व्यक्ति द्वारा
  • एकतारा लेकर नर्तक
  • पाण्डवों की कथा
  • प्रमुख कलाकारों में झाडूराम देवांगन, तीजनबाई तथा ऋतु वर्मा

सरहुल नृत्य

  • सरगुजा, जशपुर और धरमजयगढ़ तहसील में
  • उरांव जाति का जातीय नृत्य
  • चैत्र मास की पूर्णिमा को रात के समय
  • प्रकृति की पूजा का आदिम स्वरूप
  • नृत्य का आयोजन महादेव और देव पितरों को प्रसन्न करके सुख शांति की कामना के लिए
  •  साल वृक्षों के समूह में, जिसे यहाँ ‘सरना’ कहा जाता है, उसमे महादेव निवास करते हैं।
  • आदिवासियों का बैगा सरना वृक्ष की पूजा करता है।

कर्मा नृत्य

  •  भादों मास की एकादशी को
  • उपवास के पश्चात करमवृक्ष की शाखा को घर के आंगन या चौगान में रोपित
  • दूसरे दिन कुल देवता को नवान्न समर्पित करने के बाद ही उसका उपभोग शुरू
  • कर्मा नृत्य नई फ़सल आने की खुशी में किया जाता है।
  • कर्मा नृत्य, सतपुड़ा और विंध्य की पर्वत श्रेणियों के बीच सुदूर ग्रामों में भी प्रचलित
  • शहडोल, मंडला के गोंड और बैगा तथा बालाघाट और सिवनी के कोरकू और परधान जातियाँ कर्मा के ही कई रूपों को नाचती हैं।
  • बैगा कर्मा, गोंड़ कर्मा और भुंइयाँ कर्मा आदिजातीय नृत्य माना जाता है।
  • छत्तीसगढ़ के एक लोक नृत्य में ‘करमसेनी देवी’ का अवतार गोंड के घर में माना गया है, दूसरे गीत में घसिया के घर माना गया है।
  • छत्तीसगढ़ में पाँच शैलियाँ प्रचलित हैं, जिसमें झूमर, लंगड़ा, ठाढ़ा, लहकी और खेमटा हैं।
  • जो नृत्य झूम-झूम कर नाचा जाता है, उसे ‘झूमर’ कहते हैं।
  • एक पैर झुकाकर गाया जाने वाल नृत्य ‘लंगड़ा’ है।
  • लहराते हुए करने वाले नृत्य को ‘लहकी’ और खड़े होकर किया जाने वाला नृत्य ‘ठाढ़ा’ कहलाता है।
  • आगे-पीछे पैर रखकर, कमर लचकाकर किया जाने वाला नृत्य ‘खेमटा’ है।
  • यह वर्षा ऋतु को छोड़कर सभी ऋतुओं में नाचा जाता है।
  • सरगुजा के सीतापुर के तहसील, रायगढ़ के जशपुर और धरमजयगढ़ के आदिवासी इस नृत्य को साल में सिर्फ़ चार दिन नाचते हैं।
  • एकादशी कर्मा नृत्य नवाखाई के उपलक्ष्य में पुत्र की प्राप्ति, पुत्र के लिए मंगल कामना;
  • अठई नामक कर्मा नृत्य क्वांर में भाई-बहन के प्रेम संबंध;
  • दशई नामक कर्मा नृत्य और
  • दीपावली के दिन कर्मा नृत्य युवक-युवतियों के प्रेम से सराबोर होता है
  • वस्त्र तथा वाद्ययंत्र
  • कर्मा नृत्य में मांदर और झांझ-मंजीरा प्रमुख वाद्ययंत्र हैं।
  • इसके अलावा टिमकी ढोल, मोहरी आदि का भी प्रयोग होता है।
  • कर्मा नर्तक मयूर पंख का झाल पहनता है, पगड़ी में मयूर पंख के कांड़ी का झालदार कलगी खोंसता है।
  • रुपया, सुताइल, बहुंटा ओर करधनी जैसे आभूषण पहनता है।
  • कलई में चूरा, और बाँह में बहुटा पहने हुए युवक की कलाइयों और कोहनियों का झूल नृत्य की लय में बड़ा सुन्दर लगता है।

 गैड़ी नृत्य

  • छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र के मारिया गौड़ आदिवासी अपने नृत्यों के लिए बहुत जाने जाते हैं।
  • नर्तकों के शारीरिक संतुलन को दर्शाता है।
  • यह नृत्य लकड़ी के डंडों के ऊपर शारीरिक संतुलन बनाये रखकर पद संचालन के साथ किया जाता है।
  • प्राय: गैड़ी नृत्य जून से अगस्त माह में होता है।
  • नृत्य करने वाले नर्तकों की कमर में कौड़ी से जड़ी पेटी बंधी होती है।
  • इस नृत्य के वाद्यों में मांदर, शहनाई, चटकुला, डफ, टिमकी तथा सिंह बाजा प्रमुख हैं।

डोमकच नृत्य

  •  प्राय: यह नृत्य विवाह आदि के शुभ अवसर पर किया जाता है।
  • ‘विवाह नृत्य’ के नाम से भी जाना जाता है।
  • डोमकच नृत्य अगहन से आषाढ़ माह तक रात भर किया जाता है।
  • अधिकाशत: यह नृत्य वृत्ताकार रूप में नाचते हुए किया जाता है।
  • नृत्य के प्रमुख वाद्ययंत्रों में मांदर, झांझ ओर टिमकी आदि प्रमुख हैं।
  • डोमकच नृत्य के गीतों में ‘सदरी बोली’ का प्रयोग अधिक किया जाता है।

डंडा नृत्य

  • इस नृत्य को ‘सैला नृत्य’ भी कहा जाता है।
  • यह पुरुषों का सर्वाधिक कलात्मक और समूह वाला नृत्य है।
  • डंडों की मार से ताल उत्पन्न होता है।
  • इस नृत्य को मैदानी भाग में ‘डंडा नृत्य’ और पर्वती भाग में ‘सैला नृत्य’ कहा जाता है। ‘सैला’ शैल का बदला हुआ रूप है, जिसका अर्थ ‘पर्वतीय प्रदेश’ से किया जाता है।
  • वस्त्र विन्यास:
  • डंडा नृत्य करने वाले समूह में 46 से लेकर 50 या फिर 60 तक सम संख्या में नर्तक होते हैं।
  • ये नर्तक घुटने से उपर तक धोती-कुर्ता और जेकेट पहनते हैं।
  • इसके साथ ही ये लोग गोंदा की माला से लिपटी हुई पगड़ी भी सिर पर बाँधकर धारण करते हैं।
  • इसमें मोर के पंख की कडियों का झूल होता है।
  • इनमें से कई नर्तकों के द्वारा ‘रूपिया’, सुताइल, बहुंटा, चूरा, और पाँव में घुंघरू आदि पहने जाते हैं।
  • आँख में काजल, माथे पर तिलक और पान से रंगे हुए ओंठ होते हैं।
  • नृत्य पद्धति: एक कुहकी देने वाला, जिससे नृत्य की गति और ताल बदलता है, एक मांदर बजाने वाला और दो-तीन झांझ-मंजीरा बजाने वाले भी होते हैं। बाकी बचे हुए नर्तक इनके चारों ओर वृत्ताकार रूप में नाचते हैं।
  • नर्तकों के हाथ में एक या दो डंडे होते हैं। नृत्य के प्रथम चरण में ताल मिलाया जाता है। दूसरा चरण में कुहका देने पर नृत्य चालन और उसी के साथ गायन होता है।
  • नृत्य के आरंभ में ठाकुर देव की वंदना फिर माँ सरस्वती, गणेश और राम-कृष्ण के उपर गीत गाए जाते हैं।
  • ‘पहिली डंडा ठोकबो रे भाई, काकर लेबो नाम रे ज़ोर, गावे गउंटिया ठाकुर देवता, जेकर लेबो नाम रे ज़ोर। आगे सुमिरो गुरु आपन ला, दूजे सुमिरों राम ज़ोर, माता-पिता अब आपन सुमिरों गुरु के सुमिरों नाम रे ज़ोर।’
  • डंडा नृत्य कार्तिक माह से फाल्गुन माह तक होता है।
  • पौष पूर्णिमा यानी की छेरछेरा के दिन मैदानी भाग में इसका समापन होता है।
  • सुप्रसिद्ध साहित्यकार पंडित मुकुटधर पाण्डेय ने इस नृत्य को छत्तीसगढ का रास कहकर सम्बोधित किया है।

सुआ नृत्य

  • स्त्रियों का समूह में  मन की भावना, उनके सुख-दुख की अभिव्यक्ति और उनके अंगों का लावण्य ‘सुवा नृत्य’ या ‘सुवना’ में देखने को मिलता है।
  • ‘सुआ नृत्य’ का आरंभ दीपावली के दिन से  अगहन मास तक चलता है।
  • नृत्य पद्धति वृत्ताकार रूप में किया जाने वाला यह नृत्य
  • एक लड़की, जो ‘सुग्गी’ कहलाती है, धान से भरी टोकरी में मिट्टी का सुग्गा रखती है। कहीं-कहीं पर एक तथा कहीं-कहीं पर दो रखे जाते हैं।
  • ये भगवान शिव और पार्वती के प्रतीक होते हैं।
  • इन स्त्रियों के दो दल होते हैं।पहला दल जब खड़े होकर ताली बजाते हुए गीत गाता है, तब दूसरा दल अर्द्धवृत्त में झूककर ऐड़ी और अंगूठे की पारी उठाती और अगल-बगल तालियाँ बजाकर नाचतीं और गाती हैं

ककसार नृत्य

ककसार नृत्य छत्तीसगढ़ राज्य के बस्तर ज़िले की अभुजमरिया जनजाति द्वारा किया जाने वाला एक सुप्रसिद्ध नृत्य है।यह नृत्य फ़सल और वर्षा के देवता ‘ककसार’ की पूजा के उपरान्त किया जाता है। ककसार नृत्य के साथ संगीत और घुँघरुओं की मधुर ध्वनि से एक रोमांचक वातावरण उत्पन्न होता है।इस नृत्य के माध्यम से युवक और युवतियों को अपना जीवनसाथी ढूँढने का अवसर प्राप्त होता है।

पंथी नृत्य

  • गुरु घासीदास के पंथ के लिए
  • माघ माह की पूर्णिमा अपने गुरु की जन्म तिथि के अवसर पर
  • ‘जैतखाम’ की स्थापना कर ‘पंथी नृत्य’ में मग्न
  •  द्रुत गति का नृत्य है, जिसमें नर्तक अपना शारीरिक कौशल और चपलता प्रदर्शित करते हैं।
  • सफ़ेद रंग की धोती, कमरबन्द तथा घुंघरू पहने नर्तक मृदंग एवं झांझ की लय पर आंगिक चेष्टाएँ करते हुए मंत्र-मुग्ध प्रतीत होते हैं।
  • मुख्य नर्तक पहले गीत की कड़ी उठाता है, जिसे अन्य नर्तक दोहराते हुए नाचना शुरू करते हैं।
  • मानव मीनारों की रचना और हैरतअंगेज कारनामें भी दिखाए जाते हैं।
  • प्रमुख नर्तक बीच-बीच में ‘अहा, अहा…’ शब्द का उच्चारण करते हुए नर्तकों का उत्साहवर्धन करता है।
  • गुरु घासीदास बाबा का जयकारा भी लगाया जाता है।
  • पंथी नर्तकों की वेशभूषा सादी होती है। सादा बनियान, घुटने तक साधारण धोती, गले में हार, सिर पर सादा फेटा और माथे पर सादा तिलक।
  • अब रंगीन कमीज और जैकेट भी पहन लिये जाते हैं।
  • मांदर एवं झाँझ पंथी के प्रमुख वाद्ययंत्र होते हैं।
  • अब बेंजो, ढोलक, तबला और केसियो का भी प्रयोग होने लगा है।

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