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छत्तीसगढ़ में कृषि व सिचाई

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छत्तीसगढ़ में कृषि व सिचाई

छत्तीसगढ़ में कृषि

ब्रिटिश पूर्व काल में मराठों द्वारा कृषि की उन्नति हेतु कोई प्रयास नहीं किये गये. यहाँ कृषि कार्य परम्परागत पद्धति से होता था. प्रदेश की कर व्यवस्था त्रासदकारी थी, जबकि अधिकांश लोगों की जीविका का आधार कृषि था. पैदावार की बिक्री का समुचित प्रबन्ध नहीं था. माल बाहर भेजने में यातायात की कठिनाई थी. कृषकों को साहूकारों से कृषि कार्य हेतु ऊँचे दर पर व्याज लेना होता था. अंग्रेज अपने नियंत्रण काल में ही यहाँ की समस्याओं को समझ चुके थे. पूर्ण सत्ता में आने पर अंग्रेजों ने प्राथमिकता के आधार पर कृषि सुधार आरम्भ कर दिया. प्रांत में कृषि विभाग की स्थापना की गयी जिसका सर्वोच्च अधिकारी कृषि संचालक होता था. उसके अधीनस्थ अनेक सहायक अधिकारी एवं कर्मचारी होते थे. कृषि विभाग उन्नत बीज की व्यवस्था करता था. कृषि शिक्षा को प्रोत्साहित करने हेतु नागपुर में एक कृषि महाविद्यालय की स्थापना की गयी तथा रायपुर में एक कृषि प्रयोगशाला स्थापित की गयी. प्रत्येक जिले में बीज फार्म खोले गए जहाँ से किसानों को उन्नत बीज प्राप्त होने लगा. प्रथम बार बंदोबस्त का कार्य छत्तीसगढ़ में अंग्रेजों के द्वारा ही कराया गया. इसके द्वारा भूमि सुधार, उसकी माप एवं भूमिकर निर्धारण का कार्य सम्पन्न किया गया. बन्दोबस्त की अवधि 20 वर्ष की रखी गयी जिसके द्वारा किसानों के असंतोष को दूर करने का प्रयास किया गया. प्रत्येक 20 वर्ष बाद पुनर्विलोकन होता था. अंग्रेजों द्वारा की गई नवीन भूमि और राजस्व व्यवस्था के कारण कृषि कार्य को नवीन गति मिली. कराधान प्रणाली तर्कसंगत एवं न्यायपूर्ण थी. आपदा या दुर्भिक्ष के अवसर पर प्रशासन जनहित में सक्रिय हो जाता था. लगान माफ कर राहत कार्य सभी
क्षेत्रों में आरम्भ कर दिए जाते थे.

छत्तीसगढ़ में सिंचाई-

ब्रिटिश पूर्व काल में यहाँ सिंचाई की परम्परागत पद्धति प्रचलित थी जिसमें तालाब और कुओं से अल्प मात्रा में सिंचाई हो पाती थी. यहाँ नहरों का प्रबन्ध नहीं था. अंग्रेजी शासनकाल में कृषि एवं आर्थिक विकास की दृष्टि से सिंचाई के साधनों के विकास पर गम्भीरता पूर्वक ध्यान दिया गया एवं इसके लिए पृथक् सिंचाई विभाग की स्थापना की गयी. इस विभाग के द्वारा अनेक नहरों का निर्माण कर सिंचाई सुविधा का विस्तार किया गया. धमतरी में रुद्री शीर्ष नहर (1912-15 ई.) एवं मूरुमसिल्ली (1923-25 ई.) महानदी पर और बालौद में तांदूला और सुखा नदियों के संगम पर दो बाँध बनाकर 1931 ई.) आदमाबाद नहर निकाली गई. बिलासपुर में खुड़िया बाँध मनियारी नदी में एवं खारंग जलाशय छूटाघाट आदि भी इसी काल में बनाये गये. इसके अतिरिक्त तालाबों का विस्तार, नवीन कुओं का निर्माण उसी काल में मरम्मत भी करवायी गयी. इसी प्रकार सिंचाई सुविधा में वृद्धि कर छत्तीसगढ़ की हजारों एकड़ भूमि कृषि योग्य बनाकर कृषि उत्पादन में वृद्धि की गयी. इससे कृषि प्रधान छत्तीसगढ़ का बड़ा लाभ हुआ और किसानों की स्थिति में पूर्वापेक्षया सुधार परिलक्षित हुआ. इस प्रकार ब्रिटिश शासनकाल में यहाँ नवीन कृषि पद्धति और सिंचाई प्रणाली का सूत्रपात हुआ.

छत्तीसगढ़ के कृषि  संसाधन

  • राज्य को  2009-10,2012-13,2013-14 में सर्वाधिक धान उत्पादन के लिए ‘कृषि कर्मण पुरुस्कार’ से तीन बार सम्मानित किया गया है.
  • छत्तीसगढ़ अर्थव्यवस्था  कृषि पर निर्भर है।
  • वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार छत्तीसगढ़ में किसानों की संख्या 34.88 लाख थी, जबकि भूमिहीन कृषि मजदूरों की संख्या 15.52 लाख थी।
  • राज्य में खरीफ , रबी एवं जायद तीनों प्रकार की फसलें उपजाई जाती हैं 

चावल

  • यह राज्य की मुख्य फसल है ।
  • छतीसगढ़ के  कृषि योग्य भूमि के 67 % भाग में चावल की खेती होती है ।
  • राज्य के लगभग 36 लाख हेक्टेयर भूमि पर चावल की खेती होती है
  • छत्तीसगढ़ में चावल के क्षेत्र हैं — दुर्ग , जांजगीर – चाँपा , रायपुर , बिलासपुर , राजनान्दगाँव , कोरबा , सरगुजा ।
  • छत्तीसगढ़  राज्य में चावल का प्रति हेक्टेयर औसत उत्पादन 2 , 160 किग्रा है ।

गेहूं

  • छत्तीसगढ़ में गेहूं के अन्तर्गत कम क्षेत्रफल  1 . 5 %  का मुख्य कारण शीतकाल में सिंचाई की सुविधाओं की कमी है ।
  • कांकेर ,कोयलाबेड़ा , सामरी तहसीलों में गेहूँ के अन्तर्गत कुल भूमि का 1 % या कुछ अधिक है । 

कोदो – कुटकी 

  • धान के पश्चात् कोदो – कुटकी राज्य की दूसरी प्रमुख उपज है । 
  • इसे गरीबों का अनाज कहा जाता है ।

 अरहर

 यह एक प्रमुख दलहन फसल है । इस । फसल को जुलाई – अगस्त में बोया जाता है । तथा मार्च – अप्रैल में काटा जाता है ।

ज्वार

  • ज्वार खरीफ एवं रबी दोनों की फसल है , लेकिन ज्वार का खरीफ क्षेत्र अधिक है । यह जून – जुलाई में बोई जाती है एवं ।

मक्का

  •  सरगुजा , बस्तर , दन्तेवाड़ा , कोरिया , जशपुर , कोरबा , बिलासपुर आदि प्रमुख उत्पादक क्षेत्र हैं ।

कपास

  • दन्तेवाड़ा , बस्तर , सरगुजा । एवं धमतरी जिलों में कम क्षेत्र में इसकी खेती की जा रही है ।
  • केन्द्रीय पोषित सघन कपास विकास कार्यक्रम जगदलपुर , दन्तेवाड़ा और कांकेर जिलों में चलाया जा रहा है ।

गन्ना

  • राजनान्दगाँव , कबीरधाम , दुर्ग , रायपुर तथा इसके आसपास के क्षेत्रों में गन्ने की खेती की जाती है ।
  • सरगुजा , रायगढ़ , बस्तर तथा बिलासपुर जिलों में इसकी खेती होती है । 

उड़द

  • दलहन में चने के बाद उड़द का दूसरा । स्थान है । इसके उत्पादन में अग्रणी जिले रायगढ़ , कोरबा , धमतरी एवं महासमुन्द हैं , जबकि आवश्यकतानुसार यह सभी जिलों में उड़द बोई जाती है ।

सन ( जूट ) तथा मेस्टा

सन तथा मेस्टा का उत्पादन केवल रायगढ़ में होता है , क्योंकि यहाँ इस राज्य की एकमात्र जूट मिल स्थापित हैं।

सनई 

  • इसका उत्पादन केवल रायगढ़ जिले में होता है , जो यहाँ की जूट मिलों के लिए जूट के विकल्प के रूप में विकसित किया जा रहा है ।

सरसों

  • सरसों राज्य की प्रमुख तिलहन  सरसों की भाजी व फल का यहाँ विशेष महत्त्व है ।

अलसी

  • यह राज्य की परम्परागत तिलहन फसल है
  • प्रदेश में यह उत्तरा फसल के रूप  में बोई जाती है ।
  • अलसी सम्पूर्ण प्रदेश की  सर्वाधिक लोकप्रिय तिलहन है ।

चना

  •  चना का प्रमुख उत्पादक क्षेत्र दुर्ग , कबीरधाम , बिलासपुर , राजनान्दगाँव , रायपुर इत्यादि हैं 

मूंगफली

  • यह प्रदेश में रायगढ़ , महासमुन्द , सरगुजा , बिलासपुर , जांजगीर – चाँपा तथा रायपुर जिलों में मुख्यतः बोई जाती है । 

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